रमेश कुमार सोनी
नीलकंठ-पत्तियाँ
रमेश कुमार सोनी
कविता -

चिड़िया की दुनिया……
चिड़िया दिखा देती है अपने चूजे को -
नीले आकाश की असीम रहस्मयी विस्तार ,
झील , नदी , पर्वत , जंगल के किस्से
सागर की अतल ख़ामोशी
इंसानी करतूतों की दुनिया |
एक दिन उड़ जाता है चूजा -
घोंसला और सिखाने वाले को छोड़कर ;
मैंने परिंदों की दुनिया में कभी नहीं
देखा कि –
चिड़िया ने कभी कोई नियम तोड़ा हो |
हाँ चिड़िया फिक्रमंद जरुर है
तभी तो वह चूजे को पूर्ण शिक्षा देती
है
वह डरती है कि कहीं –
कोई चूजा बंदूक ना उठा ले !!
कही वह बेरोजगार ना हो जाये ,
कहीं वह भीड़ में खो ना जाये !
चिड़िया चूजे को नदी बनाकर
अंतर्ध्यान हो जाती है |
पहाड़ अब भी वहीँ खड़े हैं
लोग वृद्धाश्रमों में
यह कहानी सुन – सुना रहे थे ;
चिड़िया हर हालत में चूजे को सिखाती
है कि –
जिंदगी के सभी लफड़े – झगड़े से दूर
सबका चारा समभाव से चुगना और
भोर - साँझ में भजन करना
आदमी चिड़िया से सीखता क्यों नहीं ....
?
................ ........................
पेड़ और आदमी ..कविता
पेड़ और आदमी ....
सुकून की पनाह देते हैं
भूख
और विपरीत हालातों के बाद भी ;
यही
बातें आसमान को अखरती है
इसलिए
वह गाज गिराकर
ले
लेता है उन सबकी जान और
बना
रहना चाहता है
इस
अखिल विश्व का शहंशाह |
पेड़
अंत तक साथ निभाते हैं
मुर्दे
को अपनी गोद में लिटाकर
उसकी
ठंडी हुई देह को
गर्म
करते हुए पुनः जिन्दा करने की
नाकाम
कोशिश तक ;
पेड़
सबके लिए खड़े हैं
चाहे
घोंसला बना लें
चाहे
पत्थर मारकर पेट भर लें ..... |
पेड़
कभी नहीं चाहती कि
वह
बेजान होकर फर्नीचर हो जाए
कोई
उस पर कील ठोंके
कोई
उसके दिल को आरी से चीर दे
पेड़
भी डरते हैं इन सबसे ;
पेड़ों
को कागज़ होने में मज़ा आता है क्योंकि
इस
पर वह जिन्दा रखती है –
लोगों
के अपराधों का कच्चा चिट्ठा ,
अपने
अधिकारों का लिखित दस्तावेज ,
प्रशंसा
के कठिनतम शब्द और .....
वन
उजाड़ने वालों का काला इतिहास |
पेड़
नहीं चाहते कि कोई आदमी
उसके
जैसा बनकर खड़ा हो जाए चौराहों में
और
नाटक का हिस्सा बनाकर चीखे कि –
यह बिलकुल ऐसा ही है
जैसा
मोमबत्ती लिए हुए लोग
आए
दिनों मौन विरोध का जुलूस निकालते हैं
पेड़
अपनी मस्ती में झूमना चाहते हैं
कहीं
कोई तो है जो नहीं चाहता कि –
पेड़
उसके सामने किसी का मसीहा बने |
.....
..... .....
अच्छा आदमी - तीन कविता
अच्छा आदमी - तीन कविता
1
अच्छा
आदमी समझ के छोड़ रहा हूँ तुम्हें
दुबारा
इधर मत दिखायी देना
काला फीता
बाँधे , तख्तियाँ
लटकाए ,
गुस्ताखी
माफ नहीं होती साहब ,
लटका दूँगा
पता नहीं चलेगा , सड़ जाओगे
कौआ , चील नोच खाएँगे
वो अच्छा
आदमी सहम कर
दो कदम
पीछे हट गया क्योंकि
घर पर कोई
उसका इंतज़ार कर रहा था
सबने
चेताया था उसे कि -
मत पड़ो
किसी के पचड़े में
किसी की
फटी में उंगली मत डालो
किसी से
उलझना मत .....
अच्छा
आदमी उदास मन से घर लौट
रहा है ।।
-----//-----
2
अच्छे
आदमी को मना होता है
रोना , हँसना , उदास होना ..... ,
अच्छे
आदमी तलाश लेते हैं
हर बुरे
वक्त में भी अच्छाई की सुगंध
वह किसी
का , कभी भी
बुरा नहीं चाहता
वह
जन्मजात अच्छा होता है
अच्छाई
ओढ़ने वालों को वह
रंगे सियार के जैसे पहचान लेता है
यही अच्छा
आदमी घिघियाते खड़ा है
ऑफिस में
बाबू , साहब के
सामने
अपने
अच्छे काम को कर देने की अपील लिए
उसे
रिश्वत देना भी नहीं आता
अच्छा
आदमी क्या सिर्फ किताबों में मिलते हैं ?
अच्छा
आदमी बनने से पहले आप क्या थे ?
----------//--------
3
अच्छा आदमी है वो
उसे
परेशान मत किया करो
यही वो
लोग हैं जिन्होंने
दुनिया
थाम रखी है शेषनाग की तरह
इनकी वजह से ही बचे हैं लोग
बस , ट्रेन दुर्घटना से ,
आतंकी
घटनाओं से ,
प्रकृति
की प्रकोप से
इन्ही से
बची है
ईमानदारी , सच्चाई , कर्तव्यनिष्ठा .....
वो हरिश्चंद्र के खानदान से है
छोड़ दो
इसे , जाने दो , जिंदा रहने दो
कभी
बच्चों को दिखाने के काम आएगा ।।
----------//------
कविता - देखो -झाँको कौन है ?
कविता - सेल्फी
हिंदी कविता - रंग इन्द्रधनुष
-
हाइकु के इंद्रधनुषी रंग-अक्षरलीला चिरकाल से अनश्वर परमपिता परमेश्वर की दिव्य लीला साहित्यकारों का वर्ण्य-विषय रही है। वेदों...
-
हिन्दी में मेरा तीसरा हाइकु संग्रह- 'अक्षरलीला' प्रकाशित हुआ। आप सभी पढ़िएगा। भूमिका- श्री रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु...
-
आप सभी की मंगलकामनाओं एवं सम्बल के साथ मेरे सभी सुधि पाठकों के लिए अब प्रस्तुत है एक बहुप्रतीक्षित छत्तीसगढ़ी हाइकु संग्रह-...
