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हाइकु-समीक्षा


      व्यापक जीवन अनुभवों की 'अक्षर लीला'

                       

         समीक्षक-डॉ. शिवजी श्रीवास्तव 

 


      'अक्षर लीला' श्री रमेश कुमार सोनी का नवीन हाइकु-संग्रह है, इसके पूर्व उनके दो हाइकु- संग्रह- 'रोली अक्षत' और 'पेड़ बुलाते मेघ' प्रकाश में आ चुके हैं। श्री सोनी हिंदी साहित्य की अनेक विधाओं में सृजनरत तो हैं ही साथ ही वे पर्यावरणविद भी हैं,पर्यावरण संरक्षण हेतु किए गए कार्यो के लिए उन्हें राज्य स्तर पर कई बार सम्मानित भी किया गया है। कवि स्वभावतः संवेदनशील होते हैं, प्रकृति के प्रति अनुराग भी व्यक्ति की संवेदना को सघन करता है,स्वाभाविक ही है कि श्री सोनी जी के हृदय में संवेदना एवं भावाकुलता  अत्यंत सघन है। भावों की यह सघनता उनकी रचनाओं में अनेक रूपों में देखी जा सकती है। उनके समस्त रचना-संसार में उनकी यह प्रवृत्ति  ही विविध रूपों में प्रतिबिम्बित  देखी जा सकती है, उनका यह नवीन हाइकु -संग्रह उसी भावाकुल प्रवृत्ति की एक कड़ी है। इस संग्रह के प्रारम्भ में प्रसिद्ध साहित्यकार श्री रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' जी द्वारा 'रमेश कुमार सोनी का अनुभव संसार' शीर्षक से लिखा हुआ परिचयात्मक आलेख संग्रह की विशिष्टता को सिद्ध करता है।

       'अक्षर लीला' के समस्त हाइकुओं को कवि ने चौदह शीर्षकों में विभाजित किया है। इनमें प्रकृति है, घर -परिवार हैं, तीज-त्यौहार हैं, समसामयिक समस्याएँ हैं और जीवन -जगत के दार्शनिक प्रश्न हैं।  प्रकृति के प्रति स्वाभाविक अनुराग संग्रह के  हाइकुओं में सहज रूप में अभिव्यक्त हुआ है।हाइकु अपनी प्रकृति से ही  प्रकृति की  कविता है अतः सोनी जी के हाइकुओं में उनके प्रकृति प्रेम को स्वाभाविक रूप से अभिव्यक्ति के अनेक अवसर मिले हैं।'अक्षर लीला' में प्रकृति अपने विविध रूपों के साथ उपस्थित है। हिंदी कविता में प्रकृति चित्रण के जितने रूप मिलते हैं सोनी जी के हाइकुओं में भी प्रकृति के लगभग समस्त रूप चित्रित हैं, उनमें प्रकृति का यथातथ्य चित्रण हैं, उसके अलंकारिक, उपदेशक और मानवीकरण-रूप भी विद्यमान हैं। रमेश सोनी जी प्रकृति के जिस रूप का चयन करते हैं,उसका अत्यंत सहज  बिम्ब उपस्थित करते हैं। उदाहरण के लिए नदी तट पर पेड़ के नीचे पानी पीते हुई एक चीते का एक स्वाभाविक चित्र दृष्टव्य है -

नदी का तट / पानी पी रहा चीता / पेड़ की छाँव।

       ठीक इसी प्रकार एक और सहज चित्र देखा जा सकता है -

झूमे सैलानी / बर्फबारी जो हुई /बाज़ार गर्म।

       यद्यपि प्रकृति के सहज और स्वाभाविक सौंदर्य को को कवि ने अनेक हाइकुओं में अत्यंत सहज रूप में चित्रित किया है, पर उसमें साथ-साथ वे आलंकारिकता और कलात्मकता का स्पर्श भी देते चले हैं। वर्षा का एक बिम्ब है, जब वर्षा की प्रथम फुहार धरा को भिगोती है तो मिट्टी से जो सोंधी महक उठती है उसे कवि ने विलक्षण उपमा प्रदान की है -

पहली वर्षा / खुली इत्र की शीशी / महकी मिट्टी।

     वर्षा होने पर इत्र की शीशी खुलने की उपमा सर्वथा अनूठी और मौलिक है, ऐसे और भी अनेक बिम्ब हैं जहाँ कवि ने प्रकृति के उपादानों को नवीन उपमाओं से सुसज्जित किया है, यथा -

तीखी है मिर्च / कौन सौतन तेरी?/ जलन बड़ी।

भोर का मौन/ पाखी ने मंत्र पढ़ा / दुनिया जागी।

सन्यासी वृक्ष/ पतझड़ की ऋतु / केश लुंचन। 

    तीखी मिर्च की सौतन ढूँढना, भोर में पक्षियों का मंत्र उच्चारण करना और पतझड़ की केश लुंचन से तुलनाएँ सर्वथा नवीन हैं । इस प्रकार की नवीन उपमाओ के लिए वे लोक जीवन में व्याप्त प्रतीकों को चुनते हैं जैसे पृथ्वी द्वारा मेघ -पत्रों को बाँचना और धुंध द्वारा धूप से नेग माँगना, ये लोक जीवन के प्रचलित उदाहरण हैं किन्तु इन्होने हाइकुओं में एक अद्भुत सौंदर्य की सृष्टि कर दी है।                     

मेघों का पत्र/ बाँचती रही पृथ्वी/हरित भाषा।

धूप के द्वारे/धुंध हठीली खड़ी/  नेग माँगती।

    प्रकृति के माध्यम से विविध मानवीय मनोभावों की अभिव्यक्ति भी सोनी जी के हाइकुओं में अत्यंत स्वाभाविक रूप में व्यक्त हुई हैं। यथा-

धूप ने चूमे /टमाटर के गाल/गुस्से में लाल।

 लू महारानी/ गश्त पर निकली / सन्नाटा फैला।

     विषयों की भाँति रमेश सोनी जी के हाइकुओं की भाषा में भी विविधता है,भाषा में व्यंजना है, प्रतीकात्मकता है आलंकारिकता है, इसके साथ ही लोक जीवन में प्रचलित अंग्रेजी शब्दों के प्रयोग हैं। इस वैविध्य ने संग्रह के हाइकुओं को जीवंत बनाते हुई लोक मन के निकट स्थित कर दिया है। मुहावरों और लोकोक्तियों के सार्थक प्रयोग भी उनकी भाषा में विद्यमान है। कुछ हाइकु दृष्टव्य हैं -

शेखी बघारे/काँटों बीच गुलाब/जेड प्लस में। 

पेड़ों के पंछी / ऑर्केस्ट्रा सुनाते हैं / भोर -साँझ में 

बेटी विदाई/साथ ले जाती घर /मकान बाकी।

धर्म जो लड़े /जातियाँ उग आयीं/सत्ता की भाषा।

मेघों का स्कूल/ बूंदो की पूरी छुट्टी/सावन हँसे।

गाँव के मेले/पीपल पंखा झेले/ खुश बटोही।

       कवि एक पर्यावरणविद भी है अतः स्वाभाविक रूप से पर्यावरण की चिंता भी उनके हाइकुओं में विद्यमान है। संग्रह के चौदह भागों में 'प्रदूषण का दर्द' शीर्षक से एक भाग है जिसमें पर्यावरण संबंधी हाइकु ही हैं। इसमें विकास के नाम पर कटते जंगल , बढ़ते पॉलीथिन के प्रयोग, पराली का जलना, पटाखों के प्रयोग इत्यादि से बढ़ते प्रदूषण की पीड़ा और चिंता साफ देखी जा सकती है-

वन जो कटे  / ग्लेशियर भी टूटे /धरा उबली।

वन डरते / विकास की कुल्हाड़ी / गर्दन काटे।

प्लास्टिक-कूड़ा / हरियाली निगले / धरा कूकर।

खतरे बड़े / पॉलीथिन कचरा /कभी न सड़े।

विकास पथ /यात्री को छाँव कहाँ /ठूँठ बाकी हैं।

    इन सब चिंताओं के मध्य कवि निराश नहीं है उसे नई पीढ़ी से उम्मीद है, उसे उम्मीद है कि बच्चे ही प्रकृति को बचाएँगे-

 धरती खुश/ बच्चे पौधा रोपते/उम्मीद जिन्दा। 

    पर्यावरण की चिंता के साथ ही अनेक सामाजिक /सांस्कृतिक चिंताओं से भी कवि मन व्याकुल है। वर्तमान में झूठ का साम्राज्य फल-फूल रहा है, सत्य एकाकी एवं उपेक्षित सा है इस तथ्य को कवि ने हाइकुओं में अत्यंत गंभीरता से चित्रित किया है 

सच संत सा / झूठ रंगीला बड़ा / चले तनके।

झूठ का मेला / सच, बचके लौटा / एंटीक पीस।

       युद्धों की विभीषिका भी वर्तमान का बड़ा अभिशाप है।युद्ध का परिणाम सदैव विनाशक ही होता है,युद्ध स्वयं में गूंगा-बहरा होता है वह किसी प्रश्न के उत्तर नहीं देता। आश्चर्य तो यह है कि युद्धों की आवश्यकता का कारण लोग शांति की स्थापना बताया करते हैं। मानवता के आधार स्तंभ विद्यालय, अस्पताल भी जब युद्ध में नष्ट होते हैं तो गम्भीर संकट उपस्थित होता है, इसके दुष्परिणामों को कोई नहीं बताता,ऐसी अनेक  चिंताओं के हाइकु भी संग्रह में विद्यमान हैं-

कसूर पूछे / स्कूल अस्पताल भी /युद्ध गूंगा है। 

लाशों के ढेर / शांति वार्ता बेमानी / जिंदगी हारी।

       इन सबके साथ ही घर -परिवार, रिश्ते नाते, मेले बाज़ार, सभी उनके हाइकु के विषय हैं। उदाहरण के लिए पिता और माँ के इन हाइकुओं में सहजता, आत्मीयता और परिवार के स्नेह के अत्यंत स्वाभाविक चरित्र को देखा जा सकता है।

 बच्चों की जिद / घोड़ा बनते पिता / घर चहके।

 माँ परोसती / भोजन संग प्यार / ढाबे में 'बिल'।

         प्रकृति से लेकर जीवन -जगत और घर -परिवार तक की दुनिया के जितने हाइकु 'अक्षर लीला' में संकलित है वे कोरी कल्पना की उपज नहीं है वे सभी हाइकु कवि के जीवन अनुभवो से निःसृत हैं, उनमें कल्पना उतनी ही है जितनी काव्य सौंदर्य हेतु अनिवार्य है। अतः यह कहना समीचीन होगा कि यह संग्रह कवि के अनुभव संसार की 'अक्षर लीला' है।

डॉ. शिवजी श्रीवास्तव-गौतम बुद्ध नगर, उ.प्र.

Email-   shivji.sri@gmail.com

Mobile-   9557518552

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हाइकु-संग्रह ‘अक्षर लीला’-रमेश कुमार सोनी 

भूमिका-रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

अयन प्रकाशन दिल्ली, संस्करण - प्रथम, 2025

पृष्ठ-112,मूल्य-340/-₹

ISBN: 978-93-6423-264-7

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प्रकृति के गूँजते शब्द


प्रकृति के गूँजते शब्द 


     कविता किसी कवि के परिवेश की अनुभूति से उपजी संवेदनाओं का शब्दांकन है। कविता कभी छोटी या बड़ी नहीं होकर उस संवेदित घटना की तीव्रता पर निर्भर करती है। यदि इसका प्रभाव गहरा है तो कविता में ज्यादा शब्दों की आवश्यकता होती है। कई बार ज्यादा शब्दों पर अनुभव और शब्दशक्ति भारी होती है मुझे इस संग्रह में ऐसा ही अहसास हुआ। 

     वर्तमान समय से जूझती हुई कविताओं का दौर जल्द सिमट जाता है क्योंकि वक्त उसी तीव्रता से करवटें लेता है। प्रकृति वाद की कविताओं को स्थायित्व मिलता है ये हर दौर की पसंद होती हैं। किसी व्यक्ति की साहित्यिक चेतना की तीव्रता उसकी कविताओं में दृष्टिगोचर होती है। 

     सुदर्शन रत्नाकर की कृति ‘प्रकृति के स्वर’ को बाँचते हुए मुझे लगा कि इनमें आज के दौर की कविता जैसा प्रकृति का सौंदर्य है, संदेश देने से बचती हुई एवं शब्द चयन में वरिष्ठता झलकती है। इनमें आशावाद और मानवीकरण का समन्वय भी है। आइए इस संग्रह की 102 कविताओं को परिवेश में झाँकने का प्रयास करें। 

     ‘अलबेला चाँद’ कविता में जीवन की लंबाई के बनिस्बत उसकी गुणों की महत्ता रेखांकित है। जिस तरह चाँद यहाँ कम समय के लिए ही उपस्थित होकर सबको मोह लेता है वैसे ही जीवन से अपेक्षा है-

प्रहरी बन देता है पहरा 

उजाला फैलाकर 

अलबेला यह चाँद 

जीवन है छोटा-सा 

फिर भी, मधु से भर देता 

अवनि और अम्बर।

     ‘वह सूरज’ कविता संभावनाओं की अभिव्यक्ति है साथ ही यह हमें प्यार में झुककर ही प्राप्त करने को दर्शाता है। यहाँ आशावादी प्रवृत्ति की सुंदर झलक भी है। 

कल फिर आएगा 

कल फिर बिखेरेगा 

किरणें 

मेरे घर की मुँडेर पर 

वह सूरज जो रोज़ आता है 

चिड़ियाँ चहचहाएँगी 

स्वागत में 

मंगल गीत गाएँगी 

सूरजमुखी खिलेगा 

वशीभूत हो प्यार में 

सिर झुकाएगा।

     ‘अरुणोदय’ कविता में भोर की सुंदरता का मानवीकरण है, हमारे जीवन में ऊर्जा का संचरण भी करता है। कर्म का संदेश इसमें निहित है कि जीवन है तो उगना और अस्त होना लगा ही रहेगा। 

हो रहा हैं अरुणोदय 

भोर ने आँचल समेटा 

पाँवों में लगा महावर 

उषा दुल्हन बन आई है 

माथे पर सूरज टीका 

किरणों ने चूड़ियाँ छनकाई हैं 

रथ पर होकर सवार 

दिनकर बाहर आए हैं 

आलस्य छोड़, पक्षियों ने 

मंगल गीत गाए हैं।

     ‘जल परियाँ’ कविता बारिश के सौंदर्य का मानवीकरण है। इस दृश्य को कवि की कल्पना का आलम्बन मिला है, अनुभूति यहाँ प्रकट हुई है। 

उतर रहीं आसमान से 

पहन पैंजनिया 

सखियों संग मिल 

तीज गातीं 

छपक-छपककर 

झूम-झूमकर धरती को नहलातीं 

पेड़ों से छनकर, 

उतर रहीं

जल बूँदें, मनभावन बूँदें।

     ‘साँझ की वर्षा’ में बूँदों का संगीत के साथ ही विरहिणी की सिसकी से तपस्वी को अंतर्ज्ञान प्राप्ति का अभिलेख है। ‘लहरों के रंग’ में लहरों को आपने सहेलियाँ की स्पर्धा और उनकी क्रीड़ा का अद्भुत वर्णन किया है। ‘भोर की समीर’ कविता में भोर का साहित्यिक दृश्य है। वायु का शिशुरुप और प्रभात योगिनी का ध्यानमग्न होना हम सबके मन को आनंदित करने के लिए पर्याप्त है। 

प्रभात की वह योगिनी लगती, 

ध्यानमग्न हो मंद समाए 

कस्तूरी-सी छुअन लिये वह, 

हर कोना महकाने आए।

सांसों में रच जाए चुपचाप, 

कुछ कहे न, बस मन हुलसाए।

     ‘रंगों की दुल्हन’ में ऋतुराज बसंत की छटाएँ बिखरी हुई हैं जिसका प्रकृति के साथ हम सबको प्रतीक्षा होती है। फूलों के महकने से लेकर भौरों के इतराने तक मदनोत्सव सबको अपने रंग में सराबोर कर लेता है। 

आई रंगों की दुल्हन !

झूम उठे बाग-बगीचे 

हर शाख है लहराई 

बजी प्रेम की बांसुरी 

मन में मस्ती है छाई।

भीनी-भीनी-सी मादकता 

हर दिल को है भायी 

देख सौन्दर्य धरा मुस्काई 

ऋतु वसंत है आई।

     ऐसे ही भाव लिए कविता ‘प्रकृति का रंगोत्सव’ का प्रेम पाश मधु रस लुटाने आया है। पहाड़ भी इस उत्सव में शामिल होने से अपने आपको नहीं रोक पाए। 

पर्वत के उत्तंग शिखर पर 

सूर्य ने किरणों का 

जाल फैलाया है 

रंगरेज ने 

बांध लिया प्रेम पाश में 

चहूँ ओर सोना बिखराया है 

पहन पीताम्बर 

पर्वत भी इठलाया है।

     ‘सर्दी की धूप’ सबको सुहाती है इसकी तुलना नई दुल्हन से हुआ है जो गपशप करती हुई पेड़ों की फुनगी पर जाकर साँझ को दस्तक देती है। 

सर्दी की धूप 

छुई मुई-सी थोड़ी देर बैठी 

मुँडेर पर, फिर 

उतरी धीरे-धीरे, लजाती हुई।

छुए धरा के पाँव 

थपथपाया, दुलार से तपाया 

ढकी छाँव-धूप ने आँचल से।

     ‘आशावादी’ और जीवन के पहलुओं को रेखांकित करती हुई कविता ‘संहार और सर्जन’ में कवि ने संहार को सर्जन की जन्मदात्री कहा है। 

वृक्षों ने पीले वस्त्र उतार दिए हैं 

नई कोंपलों ने किया है 

उसका स्वागत।

पक्षी चहचहाने लगे हैं, 

पीली दूब ने सिर उठाना शुरु 

कर दिया है

कह रही हों जैसे-

हर चुनौती को स्वीकार करो 

संहार है तो सर्जन भी है 

मिटने के बाद ही कुछ 

प्रतिलिपित होता है!

     ‘प्रकृति के स्वर’ से शब्दों की यह यात्रा इसके दृश्यों को पाठकों तक पहुँचाने में सफल रही है। क्लिष्टता एवं बनावटीपन से दूर विशुद्ध प्राकृतिक सकारात्मक बिम्बयुक्त कविताएँ सबको पढ़नी चाहिए। इस संग्रह की कविताओं  में सहजता देखी जा सकती है। ये कविताएँ किसी प्रकार का कोई उपदेश नहीं देती, भाषा सहज और सरल है। 


रमेश कुमार सोनी

रायपुर, छत्तीसगढ़

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प्रकृति के स्वर, कविता संग्रह- सुदर्शन रत्नाकर 

ISBN: 978-93-6423-538-9

अयन प्रकाशन-नई दिल्ली, 2025

मूल्य-340/-₹, पृष्ठ-116

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अक्षरलीला


मेरा अक्षय तृतीया-
         'अक्षरलीला' हिंदी हाइकु में मेरा यह तीसरा संग्रह है जो अतिशीघ्र आपके पास होगा। 
         अयन प्रकाशन-दिल्ली से यह प्रकाशित हो रहा है। 

मेरा पहला हिंदी हाइकु-संग्रह 'रोली अक्षत'-2004 है जो छत्तीसगढ़ का पहला हिंदी हाइकु-संग्रह है। 'गुरतुर मया' मेरा छत्तीसगढ़ी का हाइकु-संग्रह है। 

रमेश कुमार सोनी
रायपुर


गॉफ के साये में


हाइकु का घनेरा साया

           हिंदी हाइकु देश की सीमाओं को लाँघते हुए वैश्विक स्तर पर अपनी लोकप्रियता का डंका पीट रहा है। कई देशों से हिंदी हाइकु के एकल संग्रहों का प्रकाशन इसका प्रमाण है। हाइकु के वामन विस्तार से हम सभी गौरवान्वित हैं। ऐसा सब सम्भव हुआ है सोशल मीडिया के प्रचार-प्रसार से, ‘हिंदी हाइकु’ इसका सशक्त पटल है। इसने कइयों को हाइकु लेखन के प्रति आकर्षित किया और उन्हें निखारा। विगत दशकों से एकल और साझा संग्रह,अनुवाद, विशेषांक एवं समीक्षा ग्रंथ से होते हुए हाइकु ने विश्वविद्यालयों के शोध एवं पाठ्यक्रम में अपना दखल सुनिश्चित किया है। हिंदी हाइकु अपने निर्धारित फ्रेम-5,7,5 यानि 17 वर्ण में तीन पंक्तियों की पूर्ण कविता है। यह क्षण मात्र की अनुभूतियों को सृजित करने की मुश्किल विधा है जिसमें भाव एवं विचारों की अभिव्यक्ति होती है। इस जापानी विधा का पूर्णतः हिन्दीकरण हो चुका है अतः अब यह अपनी विषय सीमाओं को लाँघकर मानवीय संवेदनाओं पर भी केंद्रित हो रही है। 

      समीक्षित कृति ‘ग़ाफ़ के साये में’ -डॉ. नितीन उपाध्ये (UAE) का सद्यः प्रकाशित हाइकु संग्रह है। आप पेशे से मेकेनिकल इंजीनियर हैं आप लिखते हैं- 

जमा रहा हूँ/पीपल जैसी जड़ें/परदेस में। 

दूर करता/एक-एक डॉलर/मातृभूमि से। 

आप पर कई साहित्यिक विद्वानों की संगत का प्रभाव पड़ा जिसने आपकी आनुभूतिक चक्षुओं को प्रखर किया। भूमिका में डॉ. जगदीश व्योम लिखते हैं कि- ‘कविता लिखने के लिए शब्दों का जोड़-तोड़ ही नहीं, कुछ और भी जरूरी है। यद्धपि 'कुछ और' को परिभाषित कर पाना सबसे कठिन है। …..'कुछ और' की पूँजी जिस रचनाकार के पास जितनी अधिक होगी, कविता का फलक भी उतना ही विस्तृत होता चला जाएगा। 'कुछ और' में- लोक जीवन से जुड़ाव, प्रकृति के प्रति सहचार्य का भाव, वस्तुओं को देखने की सूक्ष्म और वैज्ञानिक दृष्टि, मनोविज्ञान की समझ आदि-आदि न जाने कितना कुछ समाया हुआ है।’ 

      बढ़ती हुई दुनिया में सिमटते परिवारों की व्यथा किसी से छिपी नहीं है। अपेक्षाओं के बोझ तले सिसकते रिश्तों की आवाज़ दूर तक सुनाई देती है। खून के रिश्तों की गर्माहट को कम आँकते हुए बढ़ते वृद्धाश्रम एवं अनाथालय काफ़ी कुछ कहते हैं। सोशल मीडिया के इस बुरे दौर में रिश्तों के पास अपनों के लिए समय नहीं है यह घोर चिंताजनक है। आपके ज्यादातर हाइकु माँ और पिताजी की स्मृतियों तथा संघर्ष पर केंद्रित हैं। 

घर दफ़्तर/यही पिता की यात्रा/चार धाम की। 

उठा है बच्चा/अब वक़्त कटेगा/दादा-दादी का।

खुली खिड़की/आने लगी घर में/दुनिया सारी। 

द्वारे रंगोली/तुलसी पर दीया/घर में है माँ। 

     इन दिनों बढ़ते व्यभिचार से तमाम लोग हलाकान हैं व्यवस्था की पोल खोलते हुए अपराध और नैतिकता को अपने ठेंगे पर रखे अपराधियों पर ये हाइकु कड़ी चोट करते हुए प्रस्तुत हुए हैं- 

काली निगाहें/कपड़ों के भीतर/रेंगती रही। 

हजारों गिद्ध/लाखों चमगादड़/एक चिड़िया। 

     हमारी प्रकृति हम सब की पालनहार है इसका सौंदर्य प्रत्येक ऋतु में निखरते रहता है। इन ऋतुओं के अपने अलग त्यौहार हैं जो उमंग फैलाते हुए जीवन को नयी आशावादी दृष्टिकोण से ऊर्जान्वित करते हैं। प्रत्येक मौसम की अपनी कहानी है जिसमें ख़ुशी की चहलकदमी है। इन हाइकु में मानवीयकरण के साथ बिम्ब और प्रतीकों का सुंदर तालमेल है-हिंडोला झूला रही पंछियों को हवा, पंछियों की पूरी छुट्टी होने,गंगा नहाके तैयार नाव एवं वसुधा का स्वर्ण लेपन करती रश्मियों की छटा निराली है-

गोदती हवा/आकाश के तन पर/मेघों के टैटू। 

छुट्टी की घंटी/चहचहाते पंक्षी/फुर्र से उड़ें। 

जलाभिषेक/करते धरा पर/मेघ-कलश। 

स्वर्ण लेपती/गंगा के तन पर/रवि रश्मियाँ। 

भोर होते ही/तैयार हुईं नावें/गंगा नहा के। 

    वैश्विक आधुनिकता की आँधी के कारण वसुधा की अकूत संपदा और सौदर्य ने इंसानों को लोभी और भोगी बनाया है। पहले हम इसके संरक्षक होते थे, हमारे बदले आहार से हमारे विचार पहले प्रदूषित हुए और फिर प्रदूषणों की सुरसा का मुँह खुल गया।  आज हमारे पास इन समस्याओं का कोई समाधान नहीं हैं- ग्लोबल वार्मिंग, ग्रीनहाउस प्रभाव, अम्लीय वर्षा, सूखा-बाढ़, प्लास्टिक, भूस्खलन, कटते वन,घटते वन्यजीव और सिसकती मृदा। पर्यटकों के बोझ से थके पहाड़, तेज़ाब की वर्षा, नदी की लाश, प्रकृति रक्षा के पैम्पलेट का कूड़ा में पाया जाना जैसे दृश्य अब विचलित करते हैं। आम जनजागरण हेतु ये हाइकु मशाल लिए निकले हैं-

आया शिकारी/जाल में फँसे छौने/चीखा जंगल। 

झुलसा गई/तेज़ाबी बरसात/कोख धरा की। 

बहती रही/शहर में आकर/नदी की लाश। 

प्रकृति रक्षा/कल छपे पोस्टर/आज कूड़े में। 

     आज के युग में मानवीय मूल्यों के ह्रास को हर अख़बारी पन्ने पर पढ़ा जा सकता है। इसकी चिंता सबको है लेकिन समाधान सिर्फ कहने-सलाह देने तक ही सीमित है। तमाम समस्याओं के साथ सत्ता की जुगलबंदी से निकले आश्वासन अपना भरोसा खो चुके हैं। बाजार की सत्ता घरों से होते हुए जेब पर डाका डालने बैठी है और लोग हैं कि किसी भी कीमत पर बिकने को तैयार हैं ऐसे ही हाइकु के अंदाज़ देखिए-

खाली बगीचे/भरे चिकित्सालय/खाली मैदान। 

हम सामान/हम ख़रीददार/हमीं बाजार।

     आपके हाइकु में भाव एवं विचारों की स्पष्टता है। शिल्प का पालन किया गया और संवेदनाओं को पिरोया गया है। प्रेम, ईश्वर की सबसे बड़ी देन है जिसपर ये दुनिया टिकी हुई है। प्रेम जब किसी को होता है तो उसके अलावा सारी दुनिया को पहले पता चल जाता है। प्रेम-प्यार का गुड़ और तिल-तिल ज़िन्दगी मीठी ही मीठी लगती है, चाय की चुस्कियाँ अधूरी हैं तथा इसमें दो ज़िस्म एक जान होकर एकाकार हो जाते हैं-ये है इस दुनिया की बात। भारत की भक्ति परंपरा में त्याग और समर्पण को उच्च स्थान प्राप्त है जिसमें पाना यानि मोक्ष की कामना है, देह नहीं। इस प्रेम पर जितना लिखा जाए कम ही है फिर भी प्रेम के ये लिफ़ाफे खोलिए जिसे लौटाने की बात इस हाइकु में है, शायद वो आपके लिए हों-

दमक उठा/मन का कोना-कोना/तेरे जिक्र से। 

मैं,मैं न रहा/तुम-तुम न रहे/एक हो गए। 

लौटा आया हूँ/भेंट के लिफ़ाफ़े में/ उसके ख़त। 

हर सुबह/चाय की दो प्यालियाँ/तुम और मैं। 

    इस संग्रह में कुल 501 हाइकु विविध विषयों में यत्र-तत्र बिखरे हुए हैं जिनमें उपविषयों के अनुसार अलग नहीं रखा गया है जिससे पाठकों की दृष्टि बार-बार बदलते रहती है, पढ़ने की एकाग्रता टूट जाती है। ग़ाफ़ का वृक्ष UAE का राष्ट्रीय पेड़ है जिसे भारत में खेजड़ी के नाम से जाना जाता है। रचनात्मकता पूर्णतः ग्रहणशीलता पर आश्रित होती है। प्रत्येक हाइकुकार की अपनी सृजन भूमि होती है, पृथक शब्दावलियों की बगिया होती है जहाँ से उस अनुभूत दृश्य को शब्दों में पिरोने हर बार वह स्वयं को व्यक्त करता है। आपने जो कुछ विदेश में अनुभूत किया उसका सुंदर मानवीयकरण इन हाइकु में दृष्टव्य है। आप लिखते हैं- प्यासी हवाएँ मिलों ढूँढती हैं पानी, हवा को काटते उड़ते हैं रेत के कण, गॉफ के वृक्ष का भागते हुए मेघ को देखना…

गर्म रेत पे/भटके नंगे पाँव/अकेला दिन। 

नदी के बिना/समंदर कुँवारा/खाड़ी देश में। 

पके खजूर/महक दूर-दूर/दौड़ी चीटियाँ। 

     इस जीवन में सर्वत्र विसंगतियाँ ही विसंगतियाँ हैं यदि आपकी दृष्टि ही वैसी हो लेकिन ऐसा मानकर चुप भी बैठा नहीं रहा जा सकता। साहित्य को चाहिए कि वह समाज को आईना दिखाए इन हाइकु में आपने वही किया है-विद्या मंदिर की भब्यता देखकर माता शारदा का डरना जैसी टिप्पणी हमारी खोखली होती शिक्षा व्यवस्था पर करारी चोट है-

जब भी जली/राजनीति की भट्टी/भुनी जनता। 

पर्दे पे पर्दा/चेहरे पे चेहरा/सबको पता। 

राजा ने ओढ़ी/रेशम पे खद्दर/रँगा सियार। 

     चार दिन की इस ज़िन्दगी में शिकवा-शिकायत से हमें फुर्सत निकालकर इसे सँवारने में लगाना चाहिए क्योंकि ज़िन्दगी शतरंज की बाज़ी सी होती जा रही है इसमें हमें मोहरों की तरह चुनना होगा आँसू या मुस्कान। हमें अपना गिरेबाँ अपना मूल्यांकन और अपने व्यवहार कभी नहीं दिखते ऐसे ही भावों को मानवता बनाए रखने के लिए आप लिख रहे हैं-

एक अकेला/जोड़कर निन्नावे/बन जाता सौ। 

कब देखोगे/खुद का व्यवहार/मेरी दृष्टि से। 

कहते हैं जो/अपना नहीं कोई/वो किसके हैं। 

मेरी आपकी हाइकु लेखन की संभावनाओं को शुभकामनाएँ और इस संग्रह के लिए हार्दिक बधाई। 


रमेश कुमार सोनी

रायपुर, छत्तीसगढ़

मो.-7049355476

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ग़ाफ़ के साये में-हाइकु संग्रह, डॉ. नितीन उपाध्ये

सृजन बिम्ब प्रकाशन-नागपुर 2024

ISBN:978-93-91817-54-1

मूल्य-200/-₹, पृष्ठ- 128

भूमिका-डॉ. जगदीश व्योम एवं कमलेश भट्ट कमल

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