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हाइकु-समीक्षा


      व्यापक जीवन अनुभवों की 'अक्षर लीला'

                       

         समीक्षक-डॉ. शिवजी श्रीवास्तव 

 


      'अक्षर लीला' श्री रमेश कुमार सोनी का नवीन हाइकु-संग्रह है, इसके पूर्व उनके दो हाइकु- संग्रह- 'रोली अक्षत' और 'पेड़ बुलाते मेघ' प्रकाश में आ चुके हैं। श्री सोनी हिंदी साहित्य की अनेक विधाओं में सृजनरत तो हैं ही साथ ही वे पर्यावरणविद भी हैं,पर्यावरण संरक्षण हेतु किए गए कार्यो के लिए उन्हें राज्य स्तर पर कई बार सम्मानित भी किया गया है। कवि स्वभावतः संवेदनशील होते हैं, प्रकृति के प्रति अनुराग भी व्यक्ति की संवेदना को सघन करता है,स्वाभाविक ही है कि श्री सोनी जी के हृदय में संवेदना एवं भावाकुलता  अत्यंत सघन है। भावों की यह सघनता उनकी रचनाओं में अनेक रूपों में देखी जा सकती है। उनके समस्त रचना-संसार में उनकी यह प्रवृत्ति  ही विविध रूपों में प्रतिबिम्बित  देखी जा सकती है, उनका यह नवीन हाइकु -संग्रह उसी भावाकुल प्रवृत्ति की एक कड़ी है। इस संग्रह के प्रारम्भ में प्रसिद्ध साहित्यकार श्री रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' जी द्वारा 'रमेश कुमार सोनी का अनुभव संसार' शीर्षक से लिखा हुआ परिचयात्मक आलेख संग्रह की विशिष्टता को सिद्ध करता है।

       'अक्षर लीला' के समस्त हाइकुओं को कवि ने चौदह शीर्षकों में विभाजित किया है। इनमें प्रकृति है, घर -परिवार हैं, तीज-त्यौहार हैं, समसामयिक समस्याएँ हैं और जीवन -जगत के दार्शनिक प्रश्न हैं।  प्रकृति के प्रति स्वाभाविक अनुराग संग्रह के  हाइकुओं में सहज रूप में अभिव्यक्त हुआ है।हाइकु अपनी प्रकृति से ही  प्रकृति की  कविता है अतः सोनी जी के हाइकुओं में उनके प्रकृति प्रेम को स्वाभाविक रूप से अभिव्यक्ति के अनेक अवसर मिले हैं।'अक्षर लीला' में प्रकृति अपने विविध रूपों के साथ उपस्थित है। हिंदी कविता में प्रकृति चित्रण के जितने रूप मिलते हैं सोनी जी के हाइकुओं में भी प्रकृति के लगभग समस्त रूप चित्रित हैं, उनमें प्रकृति का यथातथ्य चित्रण हैं, उसके अलंकारिक, उपदेशक और मानवीकरण-रूप भी विद्यमान हैं। रमेश सोनी जी प्रकृति के जिस रूप का चयन करते हैं,उसका अत्यंत सहज  बिम्ब उपस्थित करते हैं। उदाहरण के लिए नदी तट पर पेड़ के नीचे पानी पीते हुई एक चीते का एक स्वाभाविक चित्र दृष्टव्य है -

नदी का तट / पानी पी रहा चीता / पेड़ की छाँव।

       ठीक इसी प्रकार एक और सहज चित्र देखा जा सकता है -

झूमे सैलानी / बर्फबारी जो हुई /बाज़ार गर्म।

       यद्यपि प्रकृति के सहज और स्वाभाविक सौंदर्य को को कवि ने अनेक हाइकुओं में अत्यंत सहज रूप में चित्रित किया है, पर उसमें साथ-साथ वे आलंकारिकता और कलात्मकता का स्पर्श भी देते चले हैं। वर्षा का एक बिम्ब है, जब वर्षा की प्रथम फुहार धरा को भिगोती है तो मिट्टी से जो सोंधी महक उठती है उसे कवि ने विलक्षण उपमा प्रदान की है -

पहली वर्षा / खुली इत्र की शीशी / महकी मिट्टी।

     वर्षा होने पर इत्र की शीशी खुलने की उपमा सर्वथा अनूठी और मौलिक है, ऐसे और भी अनेक बिम्ब हैं जहाँ कवि ने प्रकृति के उपादानों को नवीन उपमाओं से सुसज्जित किया है, यथा -

तीखी है मिर्च / कौन सौतन तेरी?/ जलन बड़ी।

भोर का मौन/ पाखी ने मंत्र पढ़ा / दुनिया जागी।

सन्यासी वृक्ष/ पतझड़ की ऋतु / केश लुंचन। 

    तीखी मिर्च की सौतन ढूँढना, भोर में पक्षियों का मंत्र उच्चारण करना और पतझड़ की केश लुंचन से तुलनाएँ सर्वथा नवीन हैं । इस प्रकार की नवीन उपमाओ के लिए वे लोक जीवन में व्याप्त प्रतीकों को चुनते हैं जैसे पृथ्वी द्वारा मेघ -पत्रों को बाँचना और धुंध द्वारा धूप से नेग माँगना, ये लोक जीवन के प्रचलित उदाहरण हैं किन्तु इन्होने हाइकुओं में एक अद्भुत सौंदर्य की सृष्टि कर दी है।                     

मेघों का पत्र/ बाँचती रही पृथ्वी/हरित भाषा।

धूप के द्वारे/धुंध हठीली खड़ी/  नेग माँगती।

    प्रकृति के माध्यम से विविध मानवीय मनोभावों की अभिव्यक्ति भी सोनी जी के हाइकुओं में अत्यंत स्वाभाविक रूप में व्यक्त हुई हैं। यथा-

धूप ने चूमे /टमाटर के गाल/गुस्से में लाल।

 लू महारानी/ गश्त पर निकली / सन्नाटा फैला।

     विषयों की भाँति रमेश सोनी जी के हाइकुओं की भाषा में भी विविधता है,भाषा में व्यंजना है, प्रतीकात्मकता है आलंकारिकता है, इसके साथ ही लोक जीवन में प्रचलित अंग्रेजी शब्दों के प्रयोग हैं। इस वैविध्य ने संग्रह के हाइकुओं को जीवंत बनाते हुई लोक मन के निकट स्थित कर दिया है। मुहावरों और लोकोक्तियों के सार्थक प्रयोग भी उनकी भाषा में विद्यमान है। कुछ हाइकु दृष्टव्य हैं -

शेखी बघारे/काँटों बीच गुलाब/जेड प्लस में। 

पेड़ों के पंछी / ऑर्केस्ट्रा सुनाते हैं / भोर -साँझ में 

बेटी विदाई/साथ ले जाती घर /मकान बाकी।

धर्म जो लड़े /जातियाँ उग आयीं/सत्ता की भाषा।

मेघों का स्कूल/ बूंदो की पूरी छुट्टी/सावन हँसे।

गाँव के मेले/पीपल पंखा झेले/ खुश बटोही।

       कवि एक पर्यावरणविद भी है अतः स्वाभाविक रूप से पर्यावरण की चिंता भी उनके हाइकुओं में विद्यमान है। संग्रह के चौदह भागों में 'प्रदूषण का दर्द' शीर्षक से एक भाग है जिसमें पर्यावरण संबंधी हाइकु ही हैं। इसमें विकास के नाम पर कटते जंगल , बढ़ते पॉलीथिन के प्रयोग, पराली का जलना, पटाखों के प्रयोग इत्यादि से बढ़ते प्रदूषण की पीड़ा और चिंता साफ देखी जा सकती है-

वन जो कटे  / ग्लेशियर भी टूटे /धरा उबली।

वन डरते / विकास की कुल्हाड़ी / गर्दन काटे।

प्लास्टिक-कूड़ा / हरियाली निगले / धरा कूकर।

खतरे बड़े / पॉलीथिन कचरा /कभी न सड़े।

विकास पथ /यात्री को छाँव कहाँ /ठूँठ बाकी हैं।

    इन सब चिंताओं के मध्य कवि निराश नहीं है उसे नई पीढ़ी से उम्मीद है, उसे उम्मीद है कि बच्चे ही प्रकृति को बचाएँगे-

 धरती खुश/ बच्चे पौधा रोपते/उम्मीद जिन्दा। 

    पर्यावरण की चिंता के साथ ही अनेक सामाजिक /सांस्कृतिक चिंताओं से भी कवि मन व्याकुल है। वर्तमान में झूठ का साम्राज्य फल-फूल रहा है, सत्य एकाकी एवं उपेक्षित सा है इस तथ्य को कवि ने हाइकुओं में अत्यंत गंभीरता से चित्रित किया है 

सच संत सा / झूठ रंगीला बड़ा / चले तनके।

झूठ का मेला / सच, बचके लौटा / एंटीक पीस।

       युद्धों की विभीषिका भी वर्तमान का बड़ा अभिशाप है।युद्ध का परिणाम सदैव विनाशक ही होता है,युद्ध स्वयं में गूंगा-बहरा होता है वह किसी प्रश्न के उत्तर नहीं देता। आश्चर्य तो यह है कि युद्धों की आवश्यकता का कारण लोग शांति की स्थापना बताया करते हैं। मानवता के आधार स्तंभ विद्यालय, अस्पताल भी जब युद्ध में नष्ट होते हैं तो गम्भीर संकट उपस्थित होता है, इसके दुष्परिणामों को कोई नहीं बताता,ऐसी अनेक  चिंताओं के हाइकु भी संग्रह में विद्यमान हैं-

कसूर पूछे / स्कूल अस्पताल भी /युद्ध गूंगा है। 

लाशों के ढेर / शांति वार्ता बेमानी / जिंदगी हारी।

       इन सबके साथ ही घर -परिवार, रिश्ते नाते, मेले बाज़ार, सभी उनके हाइकु के विषय हैं। उदाहरण के लिए पिता और माँ के इन हाइकुओं में सहजता, आत्मीयता और परिवार के स्नेह के अत्यंत स्वाभाविक चरित्र को देखा जा सकता है।

 बच्चों की जिद / घोड़ा बनते पिता / घर चहके।

 माँ परोसती / भोजन संग प्यार / ढाबे में 'बिल'।

         प्रकृति से लेकर जीवन -जगत और घर -परिवार तक की दुनिया के जितने हाइकु 'अक्षर लीला' में संकलित है वे कोरी कल्पना की उपज नहीं है वे सभी हाइकु कवि के जीवन अनुभवो से निःसृत हैं, उनमें कल्पना उतनी ही है जितनी काव्य सौंदर्य हेतु अनिवार्य है। अतः यह कहना समीचीन होगा कि यह संग्रह कवि के अनुभव संसार की 'अक्षर लीला' है।

डॉ. शिवजी श्रीवास्तव-गौतम बुद्ध नगर, उ.प्र.

Email-   shivji.sri@gmail.com

Mobile-   9557518552

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हाइकु-संग्रह ‘अक्षर लीला’-रमेश कुमार सोनी 

भूमिका-रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

अयन प्रकाशन दिल्ली, संस्करण - प्रथम, 2025

पृष्ठ-112,मूल्य-340/-₹

ISBN: 978-93-6423-264-7

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हाइकु बचपन के


1

समुद्र लीले

नन्हे घरौंदे डरे

माँ से लिपटे। 

2

पोता जो आया

बूढ़ा आँगन हँसा

मासूम बातें। 

3

बच्चों की भाषा

बर्तन भी खिलौना 

माता तू धन्य। 

4

खेल पुकारे

बेफ़िक्री के मैदान

किल्लोल मचा। 

5

क्रेयॉन रंग

कैनवास बच्चों का 

हँसी दीवार। 

6

झूला ना थका

बच्चे झुलाते हुए

माँ सा है मन। 

7

खट्टी इमली 

बचपन बुलाती

मासूम बातें। 

8

बच्चों के प्रश्न 

माता ही सुलझाती

विज्ञानी फेल। 

9

कच्ची अमिया

बच्चे बीनने दौड़े

आँधी के बाद।

10

चोंच में तृण

बड़ा सपना थामे

युवा पखेरु।

11

आज जो लड़े

कल साथ खेलते

बच्चों का खेल। 

12

बच्चों की भूख 

मनुहार थकता

माता ना थकी। 

13

बच्चों की ज़िद 

पिता पूरी करते

डाँट के बाद। 

14

भरा टिफ़िन 

माँ बिन कैसे खाता

स्कूल से लौटा। 

15

छुट्टियाँ ख़त्म

लौटा खिलौने वाला

घर अपने। 

16

नन्ही मुस्कान

गुल्लक सी खनके

छुट्टी में घर। 

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रमेश कुमार सोनी

रायपुर, छत्तीसगढ़



गॉफ के साये में


हाइकु का घनेरा साया

           हिंदी हाइकु देश की सीमाओं को लाँघते हुए वैश्विक स्तर पर अपनी लोकप्रियता का डंका पीट रहा है। कई देशों से हिंदी हाइकु के एकल संग्रहों का प्रकाशन इसका प्रमाण है। हाइकु के वामन विस्तार से हम सभी गौरवान्वित हैं। ऐसा सब सम्भव हुआ है सोशल मीडिया के प्रचार-प्रसार से, ‘हिंदी हाइकु’ इसका सशक्त पटल है। इसने कइयों को हाइकु लेखन के प्रति आकर्षित किया और उन्हें निखारा। विगत दशकों से एकल और साझा संग्रह,अनुवाद, विशेषांक एवं समीक्षा ग्रंथ से होते हुए हाइकु ने विश्वविद्यालयों के शोध एवं पाठ्यक्रम में अपना दखल सुनिश्चित किया है। हिंदी हाइकु अपने निर्धारित फ्रेम-5,7,5 यानि 17 वर्ण में तीन पंक्तियों की पूर्ण कविता है। यह क्षण मात्र की अनुभूतियों को सृजित करने की मुश्किल विधा है जिसमें भाव एवं विचारों की अभिव्यक्ति होती है। इस जापानी विधा का पूर्णतः हिन्दीकरण हो चुका है अतः अब यह अपनी विषय सीमाओं को लाँघकर मानवीय संवेदनाओं पर भी केंद्रित हो रही है। 

      समीक्षित कृति ‘ग़ाफ़ के साये में’ -डॉ. नितीन उपाध्ये (UAE) का सद्यः प्रकाशित हाइकु संग्रह है। आप पेशे से मेकेनिकल इंजीनियर हैं आप लिखते हैं- 

जमा रहा हूँ/पीपल जैसी जड़ें/परदेस में। 

दूर करता/एक-एक डॉलर/मातृभूमि से। 

आप पर कई साहित्यिक विद्वानों की संगत का प्रभाव पड़ा जिसने आपकी आनुभूतिक चक्षुओं को प्रखर किया। भूमिका में डॉ. जगदीश व्योम लिखते हैं कि- ‘कविता लिखने के लिए शब्दों का जोड़-तोड़ ही नहीं, कुछ और भी जरूरी है। यद्धपि 'कुछ और' को परिभाषित कर पाना सबसे कठिन है। …..'कुछ और' की पूँजी जिस रचनाकार के पास जितनी अधिक होगी, कविता का फलक भी उतना ही विस्तृत होता चला जाएगा। 'कुछ और' में- लोक जीवन से जुड़ाव, प्रकृति के प्रति सहचार्य का भाव, वस्तुओं को देखने की सूक्ष्म और वैज्ञानिक दृष्टि, मनोविज्ञान की समझ आदि-आदि न जाने कितना कुछ समाया हुआ है।’ 

      बढ़ती हुई दुनिया में सिमटते परिवारों की व्यथा किसी से छिपी नहीं है। अपेक्षाओं के बोझ तले सिसकते रिश्तों की आवाज़ दूर तक सुनाई देती है। खून के रिश्तों की गर्माहट को कम आँकते हुए बढ़ते वृद्धाश्रम एवं अनाथालय काफ़ी कुछ कहते हैं। सोशल मीडिया के इस बुरे दौर में रिश्तों के पास अपनों के लिए समय नहीं है यह घोर चिंताजनक है। आपके ज्यादातर हाइकु माँ और पिताजी की स्मृतियों तथा संघर्ष पर केंद्रित हैं। 

घर दफ़्तर/यही पिता की यात्रा/चार धाम की। 

उठा है बच्चा/अब वक़्त कटेगा/दादा-दादी का।

खुली खिड़की/आने लगी घर में/दुनिया सारी। 

द्वारे रंगोली/तुलसी पर दीया/घर में है माँ। 

     इन दिनों बढ़ते व्यभिचार से तमाम लोग हलाकान हैं व्यवस्था की पोल खोलते हुए अपराध और नैतिकता को अपने ठेंगे पर रखे अपराधियों पर ये हाइकु कड़ी चोट करते हुए प्रस्तुत हुए हैं- 

काली निगाहें/कपड़ों के भीतर/रेंगती रही। 

हजारों गिद्ध/लाखों चमगादड़/एक चिड़िया। 

     हमारी प्रकृति हम सब की पालनहार है इसका सौंदर्य प्रत्येक ऋतु में निखरते रहता है। इन ऋतुओं के अपने अलग त्यौहार हैं जो उमंग फैलाते हुए जीवन को नयी आशावादी दृष्टिकोण से ऊर्जान्वित करते हैं। प्रत्येक मौसम की अपनी कहानी है जिसमें ख़ुशी की चहलकदमी है। इन हाइकु में मानवीयकरण के साथ बिम्ब और प्रतीकों का सुंदर तालमेल है-हिंडोला झूला रही पंछियों को हवा, पंछियों की पूरी छुट्टी होने,गंगा नहाके तैयार नाव एवं वसुधा का स्वर्ण लेपन करती रश्मियों की छटा निराली है-

गोदती हवा/आकाश के तन पर/मेघों के टैटू। 

छुट्टी की घंटी/चहचहाते पंक्षी/फुर्र से उड़ें। 

जलाभिषेक/करते धरा पर/मेघ-कलश। 

स्वर्ण लेपती/गंगा के तन पर/रवि रश्मियाँ। 

भोर होते ही/तैयार हुईं नावें/गंगा नहा के। 

    वैश्विक आधुनिकता की आँधी के कारण वसुधा की अकूत संपदा और सौदर्य ने इंसानों को लोभी और भोगी बनाया है। पहले हम इसके संरक्षक होते थे, हमारे बदले आहार से हमारे विचार पहले प्रदूषित हुए और फिर प्रदूषणों की सुरसा का मुँह खुल गया।  आज हमारे पास इन समस्याओं का कोई समाधान नहीं हैं- ग्लोबल वार्मिंग, ग्रीनहाउस प्रभाव, अम्लीय वर्षा, सूखा-बाढ़, प्लास्टिक, भूस्खलन, कटते वन,घटते वन्यजीव और सिसकती मृदा। पर्यटकों के बोझ से थके पहाड़, तेज़ाब की वर्षा, नदी की लाश, प्रकृति रक्षा के पैम्पलेट का कूड़ा में पाया जाना जैसे दृश्य अब विचलित करते हैं। आम जनजागरण हेतु ये हाइकु मशाल लिए निकले हैं-

आया शिकारी/जाल में फँसे छौने/चीखा जंगल। 

झुलसा गई/तेज़ाबी बरसात/कोख धरा की। 

बहती रही/शहर में आकर/नदी की लाश। 

प्रकृति रक्षा/कल छपे पोस्टर/आज कूड़े में। 

     आज के युग में मानवीय मूल्यों के ह्रास को हर अख़बारी पन्ने पर पढ़ा जा सकता है। इसकी चिंता सबको है लेकिन समाधान सिर्फ कहने-सलाह देने तक ही सीमित है। तमाम समस्याओं के साथ सत्ता की जुगलबंदी से निकले आश्वासन अपना भरोसा खो चुके हैं। बाजार की सत्ता घरों से होते हुए जेब पर डाका डालने बैठी है और लोग हैं कि किसी भी कीमत पर बिकने को तैयार हैं ऐसे ही हाइकु के अंदाज़ देखिए-

खाली बगीचे/भरे चिकित्सालय/खाली मैदान। 

हम सामान/हम ख़रीददार/हमीं बाजार।

     आपके हाइकु में भाव एवं विचारों की स्पष्टता है। शिल्प का पालन किया गया और संवेदनाओं को पिरोया गया है। प्रेम, ईश्वर की सबसे बड़ी देन है जिसपर ये दुनिया टिकी हुई है। प्रेम जब किसी को होता है तो उसके अलावा सारी दुनिया को पहले पता चल जाता है। प्रेम-प्यार का गुड़ और तिल-तिल ज़िन्दगी मीठी ही मीठी लगती है, चाय की चुस्कियाँ अधूरी हैं तथा इसमें दो ज़िस्म एक जान होकर एकाकार हो जाते हैं-ये है इस दुनिया की बात। भारत की भक्ति परंपरा में त्याग और समर्पण को उच्च स्थान प्राप्त है जिसमें पाना यानि मोक्ष की कामना है, देह नहीं। इस प्रेम पर जितना लिखा जाए कम ही है फिर भी प्रेम के ये लिफ़ाफे खोलिए जिसे लौटाने की बात इस हाइकु में है, शायद वो आपके लिए हों-

दमक उठा/मन का कोना-कोना/तेरे जिक्र से। 

मैं,मैं न रहा/तुम-तुम न रहे/एक हो गए। 

लौटा आया हूँ/भेंट के लिफ़ाफ़े में/ उसके ख़त। 

हर सुबह/चाय की दो प्यालियाँ/तुम और मैं। 

    इस संग्रह में कुल 501 हाइकु विविध विषयों में यत्र-तत्र बिखरे हुए हैं जिनमें उपविषयों के अनुसार अलग नहीं रखा गया है जिससे पाठकों की दृष्टि बार-बार बदलते रहती है, पढ़ने की एकाग्रता टूट जाती है। ग़ाफ़ का वृक्ष UAE का राष्ट्रीय पेड़ है जिसे भारत में खेजड़ी के नाम से जाना जाता है। रचनात्मकता पूर्णतः ग्रहणशीलता पर आश्रित होती है। प्रत्येक हाइकुकार की अपनी सृजन भूमि होती है, पृथक शब्दावलियों की बगिया होती है जहाँ से उस अनुभूत दृश्य को शब्दों में पिरोने हर बार वह स्वयं को व्यक्त करता है। आपने जो कुछ विदेश में अनुभूत किया उसका सुंदर मानवीयकरण इन हाइकु में दृष्टव्य है। आप लिखते हैं- प्यासी हवाएँ मिलों ढूँढती हैं पानी, हवा को काटते उड़ते हैं रेत के कण, गॉफ के वृक्ष का भागते हुए मेघ को देखना…

गर्म रेत पे/भटके नंगे पाँव/अकेला दिन। 

नदी के बिना/समंदर कुँवारा/खाड़ी देश में। 

पके खजूर/महक दूर-दूर/दौड़ी चीटियाँ। 

     इस जीवन में सर्वत्र विसंगतियाँ ही विसंगतियाँ हैं यदि आपकी दृष्टि ही वैसी हो लेकिन ऐसा मानकर चुप भी बैठा नहीं रहा जा सकता। साहित्य को चाहिए कि वह समाज को आईना दिखाए इन हाइकु में आपने वही किया है-विद्या मंदिर की भब्यता देखकर माता शारदा का डरना जैसी टिप्पणी हमारी खोखली होती शिक्षा व्यवस्था पर करारी चोट है-

जब भी जली/राजनीति की भट्टी/भुनी जनता। 

पर्दे पे पर्दा/चेहरे पे चेहरा/सबको पता। 

राजा ने ओढ़ी/रेशम पे खद्दर/रँगा सियार। 

     चार दिन की इस ज़िन्दगी में शिकवा-शिकायत से हमें फुर्सत निकालकर इसे सँवारने में लगाना चाहिए क्योंकि ज़िन्दगी शतरंज की बाज़ी सी होती जा रही है इसमें हमें मोहरों की तरह चुनना होगा आँसू या मुस्कान। हमें अपना गिरेबाँ अपना मूल्यांकन और अपने व्यवहार कभी नहीं दिखते ऐसे ही भावों को मानवता बनाए रखने के लिए आप लिख रहे हैं-

एक अकेला/जोड़कर निन्नावे/बन जाता सौ। 

कब देखोगे/खुद का व्यवहार/मेरी दृष्टि से। 

कहते हैं जो/अपना नहीं कोई/वो किसके हैं। 

मेरी आपकी हाइकु लेखन की संभावनाओं को शुभकामनाएँ और इस संग्रह के लिए हार्दिक बधाई। 


रमेश कुमार सोनी

रायपुर, छत्तीसगढ़

मो.-7049355476

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ग़ाफ़ के साये में-हाइकु संग्रह, डॉ. नितीन उपाध्ये

सृजन बिम्ब प्रकाशन-नागपुर 2024

ISBN:978-93-91817-54-1

मूल्य-200/-₹, पृष्ठ- 128

भूमिका-डॉ. जगदीश व्योम एवं कमलेश भट्ट कमल

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हिंदी दिवस


हिंदी की चुनौतियाँ

        विश्व की सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं में से एक हिंदी है जिस पर प्रत्येक भारतीय को सदैव से गर्व रहा है। इसके द्वारा ही हमारे सांस्कृतिक संस्कारों एवं जीवन मूल्यों का उचित संप्रेषण होता है। हिंदी बहुत ही समृद्ध एवं सरल होने के कारण हमारी राजभाषा है जिसमें अन्य बोली, भाषाओं के शब्दों को समाहित करने की अकूत क्षमता है। 

       वर्तमान में हिंदी भारत के 11 राज्यों एवं तीन संघ शासित क्षेत्रों की प्रमुख राजभाषा होने के साथ ही आठवीं अनुसूची में उल्लेखित 21 भाषाओं में से इसका भी एक स्थान है। 14 सितंबर 1949 में हिंदी को राजभाषा के रूप में स्वीकार किया गया था तथा 14 सितंबर 1953 से प्रतिवर्ष हिंदी दिवस मनाया जा रहा है।         

यूनेस्को की 7 भाषाओं में हिंदी को भी मान्यता मिली हुई है। विदेश मंत्रालय द्वारा विश्व हिंदी सम्मेलनों का आयोजन किया जाता रहा है। हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा बनाने के लिए 'विश्व हिंदी सचिवालय' कार्यरत है। आज विश्व के विविध देशों में 175 से अधिक विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ाई जाती है। 

        हिंदी बोलने, लिखने-पढ़ने में हमें गर्व महसूस करना चाहिए क्योंकि यही हमारे मौलिक विचारों एवं संवाद की भाषा है। भाषा का विकास उसे स्वीकारने,बोलने और उसके साहित्य रचने तथा पढ़ने-पढ़ाने पर निर्भर करता है वरना वह धीरे-धीरे विलुप्त हो जाती है। आज के इस दौर में हिंदी को बढ़ावा देने में हिंदी साहित्य की स्वर्णिम परंपरा के साथ-साथ बॉलीवुड और सोशल मीडिया के प्लेटफार्म की भी प्रशंसा करनी होगी लेकिन इन दिनों संक्षेप में लिखी जाने वाली सांकेतिक भाषा के बढ़ते प्रचलन (इमोजी) से हिंदी को खतरा है । यह हमें सांकेतिक भाषा की ओर खींच ले जाने की प्राथमिक अवस्था है। देवनागरी लिपि के स्थान पर रोमन लिपि का उपयोग भी चिंता उत्पन्न करता है। तकनीकी रूप से समृद्ध हमारी हिंदी के खतरे इन दिनों अंग्रेजी माध्यम विद्यालयों में उगने लगे हैं जहाँ भविष्य के लिए अंग्रेजी की फसल तैयार हो रही है;  हिंदी विद्यालयों को बंद किया जा रहा है । आम जनमानस अंग्रेजी संस्कृति की बाढ़ में हाथ पर हाथ धरे बैठा है यह कहते हुए कि-'जमाना बदल गया है इसी के अनुसार चलना पड़ेगा'। 


      हिंदी लेखकों एवं पत्र-पत्रिकाओं की आत्ममुग्धता ने इसके विकास की गति पर अंकुश लगाया हुआ है; हिंदी पाठकों की कमी पर विचार करना होगा। एक वह दौर भी था जब हिंदी हमारी स्वातंत्र आंदोलन की प्रमुख भाषा थी जिससे हमारी राष्ट्रभक्ति की भावना प्रबल होती थी। आज के इस दौर में हम सबका यह दायित्व है कि हिंदी को कमजोर बनाने वाली तमाम कोशिशों को नाकाम करें। हम सबको चाहिए कि- हिंदी की वैश्विक यात्रा को सुगम बनाने के लिए इसे गूगल और इंटरनेट की भी भाषा बनाएँ ; ज्यादा से ज्यादा लोगों को जोड़ें ताकि हमारी वसुधैव कुटुंबकम की वैश्विक भावना सुदृढ़ हो सके। हिंदी हमारे आत्मसम्मान की भी प्रतीक है इसे अपनाने के लिए रूढ़िवादी सोच से ऊपर उठकर हमें आधुनिक सोच बनानी होगी ताकि हमारी भाषिक विशेषताओं की पूर्णता वाली यह भाषा हमारी अस्मिता और गौरव की भाषा के रूप में और निखर सके।

         हिंदी दिवस पर हम सब की प्रतिज्ञा होनी चाहिए की विरासत में मिली हमारी इस हिंदी भाषा को हम और समृद्ध बना सकें। हिंदी दिवस के अवसर पर हम सभी को कुछ न कुछ आयोजन करते हुए लोगों को जोड़ने का उपक्रम करना चाहिए। 

जय हिंदी-जय देवनागरी। 

……

रमेश कुमार सोनी 

रायपुर, छत्तीसगढ़