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अक्षरलीला-समीक्षा

हाइकु के इंद्रधनुषी रंग-अक्षरलीला


     चिरकाल से अनश्वर परमपिता परमेश्वर की दिव्य लीला साहित्यकारों का वर्ण्य-विषय रही है। वेदों से लौकिक साहित्य तक मनोरम प्रकृति ने कवियों ,साहित्यकारों के मन को आकर्षित किया और हरे-भरे वन, वृक्ष, लताएं, पुष्प, पर्वत, नदी-नद, सागर, खेत-खलिहान कविताओं, लेखों में आ विराजे। मानवीय प्रकृति की प्रेम, दया, करुणा आदि संवेदनाओं ने भी साहित्य में प्रचुर रस-वर्षण किया है। ऐसी ही परम्परा का निर्वहन करते हुए इस अक्षरलीला को अपनी काव्य-कृति 'अक्षरलीला' में अपनी हाइकु रचनाओं के माध्यम से प्रसिद्ध हाइकुकार श्री रमेश कुमार सोनी जी ने उपस्थित किया है। 'रोली अक्षत' ,और 'पेड़ बुलाते मेघ' के उपरान्त हिन्दी में यह कवि का तीसरा हाइकु-संग्रह है। छत्तीसगढ़ी में 'गुरतुर मया' हाइकु-संग्रह' भी प्रकाशित हो चुका है ।

     प्रकृति हाइकु की प्राण है। अनेक वर्षों से हाइकु-साधना में रत कवि का वर्ण्य-संसार व्यापक है। यदि विवेच्य 'अक्षरलीला' की बात करें तो विषयवार-14 उपशीर्षकों में विभक्त पुस्तक में कवि ने 'पाखी का सरगम' सुनाते-सुनाते भोर, साँझ, सूरज, हिम से ढकी पर्वत शृँखलायें, नदी, झील आदि के बहुत सुन्दर दृश्य उकेरे हैं। ग्राम्य-जीवन को तो जैसे साकार ही कर दिया है। कुछ उदाहरण द्रष्टव्य हैं- 

भोर-साँझ में /रश्मियाँ फाग खेलें/ नभ रँगते।पृ.17

खेत गा उठे/ बैलों की घंटी-संग/ किसान राग।पृ.17

भोर में घाट/ घर-घर के किस्से/ बड़े बातूनी।।पृ.19

     ठंडी झील से डरा बाल सूरज है। हिमकिरीट पर हीरे जड़ती रश्मियाँ, उजालों का प्रहरी दीप, खड़फड़ी बजाती बरदी, चाँद को देखता चाँद अपने अनुपम सौन्दर्य के साथ उपस्थित हैं। इनसे भी परे कविमन की राष्ट्रभक्ति धारा में हमारा राष्ट्रीय ध्वज कुछ ऐसे दिखाई पड़ता है- 

भोर केसरी / नदी की श्वेत धारा/ हरी वसुधा।पृ.18

      सचमुच माँ भारती की इस छटा पर मन बलिहार। नदी, झील, गुलाब, भ्रमर, तितली, पुरवा, भित्ति टँगे उपले और माँ के डैनों में छिपे बच्चों के दृश्यों के बीच भारतीय-दर्शन का दिग्दर्शन कराते हाइकु उल्लेखनीय हैं। जीवन की साँझ कैसी होनी चाहिए  और जीव जीवन की क्षणभंगुरता जानते हुए भी कैसा आचरण करता है-

झरी पत्तियाँ /मोक्ष की राह चलीं/ भजन गाती ।पृ.25

तारों पे पाखी/धूप सेंकने बैठे/ताके शिकारी।पृ.22

     'खरगोश फुदके' तथा 'धूप का स्वाद' वन्य-जीवों और फलों, सब्जियों की आकृति-प्रकृति का मोहक, मनरंजक वर्णन करती हाइकु रचनाओं से सज्जित है- 

गाजर खाने/ खरगोश फुदके/ दाँत दिखाके ।पृ.29

धूप ने चूमे/ टमाटर के गाल/गुस्से में लाल।पृ.37

     यूँ तो वर्षा का सौन्दर्य शब्दातीत है किन्तु कवि की लेखनी ने 'अक्षरलीला' में पहली वर्षा की सुगंध, वर्षा में नहाते पक्षियों की मस्ती, मेघ के छौने,तड़ित, जोगन नदी के जीवन्त दृश्यों के साथ कुछ ऐसा कहा कि मन अहा!अहा! भी कह उठा और आह भी - 

रश्मियाँ हँसी/ मेघों के पीछे खड़ी/ इन्द्रधनुष।पृ.42

 मेघ सावनी/पायल बजा झूली/ झूमती घाटी।पृ.43  तथा 

किसी की देह/ सावन भिगोता है/ किसी के नैन।पृ.42

     'धुंध की माया' के व्याज से शीत ऋतु के सुन्दर दृश्य दृष्टिगोचर होते हैं-

वन सुन्दरी/ कोहरे में सजती/ओस नहाती।पृ.51

     दूसरी ओर ग्रीष्म भी कुछ कम नहीं, पूरी प्रखरता के साथ विद्यमान है-

नौतपा धूप/ प्रचंड गर्मी वेश/ जेठ की माया।पृ.52

     प्रकृति के प्रति प्रेम से भरी,उसके सौन्दर्य में रमी कवि की दृष्टि से 'प्रदूषण का दर्द' भी छिपा नहीं है। वह साहित्यकार ही क्या जो अपने परिवेश के प्रति संवेदनशील न हो। सजग कवि कहते हैं-

जलते खेत/ मिट्टी, हवा पूछते/ कैसे बचोगे ? पृ.59

     कटते वन, पॉलीथीन, जलती पराली, तेज ध्वनि में संगीत बजाते डीजे, यहाँ तक कि हत्यारा मांझा कुछ भी कवि की दृष्टि से अगोचर नहीं है। 'पेड़ की बात' में कवि अपने मन का तंज कुछ इस तरह कहते हैं कि पेड़ निस्पृह भाव से पत्थरों के बदले भी फल-फूल देते हैं, छाया देते हैं लेकिन अपने साथी के कटने पर मौन क्यों रहते हैं-

पेड़ स्वार्थी हैं/साथी के कटने से / चुप रहते।पृ.64

     'प्रेम नगर की स्मृतियाँ' तो प्रेम के रंग में कुछ ऐसे रँगी हैं कि सहृदय पाठक का मन भी सतरंगी हो जाए। प्रेम ही तो है जो मन को वासंती कर देता है या रच जाता है हाथों पर मेहंदी बनकर-

पत्र उनका/ वासंती हुआ मन/ महकी बेला।पृ.71

मन की बातें/ मेहंदी बन रचीं/ प्रीत महकी।पृ.72

   और तो और प्रेम की गली जाकर तो वक्त भी ठहर जाता  है-

तुम्हें जो देखा/ वक्त ठहर गया/प्रेम नि: शब्द।पृ.72

     कवि का मन प्रकृति में रमा तो रमा ही रह गया ऐसा भी नहीं है। पुस्तक में समाज की संवेदनाओं से स्पंदित रचनाएँ भी प्रचुरता से उपलब्ध होती हैं । कवि की सजग लेखनी ने अपने चारों ओर घटती घटनाएँ देखीं और उनके आनन्द तथा पीड़ा को अपने हाइकुओं के माध्यम से अभिव्यक्त किया। कुछ दृश्य देखिए-

बच्चे शर्माते/टूटे दाँत छिपाते/ चिढ़ते-रोते।पृ.77

मां परोसती/ भोजन संग प्यार/ढाबे में बिल। पृ.78

मुस्काते बँटी/ प्रतीक्षा की कुनैन/ वृद्धाश्रम में। पृ.82

     पुस्तक में पिता पर बहुत सुन्दर, मनभावन हाइकु हैं। सामान्य रूप से समाज में स्त्री की दशा और दिशा पर विचार करें तो विगत की अपेक्षा चित्र कुछ सुधरता प्रतीत होता है। शिक्षा, खेल, विज्ञान, कला, साहित्य प्राय: सभी क्षेत्रों में आज की स्त्री नए कीर्तिमान स्थापित कर रही है। लेकिन कवि की दृष्टि केवल यहीं नहीं रुकी, उन्होने देखा आज भी-

मायके लौटी/प्रश्न उछल पड़े/घर सहमा।पृ.80

   पुस्तक में समाज का रंग-बदरंग चेहरा, जाति-धर्मगत वैमनस्य, युद्ध और भूख की विभीषिका, भ्रष्ट सिस्टम की पर्त उधेड़ती सशक्त हाइकु रचनाएँ हैं तो उत्सवधर्मी भारत के त्योहारों के सरस, सुन्दर, मनभावन रंग भी हैं। निराशा कवि का मन्तव्य नहीं। उन्हें विश्वास है कि दर्द भी महकेगा। नन्हें जुगनू अपनी दीप्ति से मंजिल तलाश ही लेंगे -

काँटों के बीच/ दर्द महक उठा/ खिला गुलाब।पृ.110

मशाल लिए/ जुगनू दल खोजते/ घर अपना।पृ.110


     अधिक क्या कहूँ  'अक्षरलीला' का सम्पूर्ण रसास्वादन तो पढ़कर ही किया जा सकता है। निश्चय ही पुस्तक सुधी सहृदयजनों के बीच प्रचुर स्नेह और सम्मान प्राप्त करेगी। 

मंगलकामनाएँ !

                              

डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा 

वापी, गुजरात

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अक्षरलीला (हाइकु-संग्रह)- रमेश कुमार सोनी

भूमिका-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ 

पृष्ठ-112, मूल्य-340/-₹ 

ISBN: 978-93-6423-264-7

अयन प्रकाशन-नई दिल्ली 2025

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हिन्दी हाइकु-संग्रह, अक्षरलीला

अक्षरलीला— लघु छंद में विराट अनुभूति

     साहित्यकार रमेश कुमार सोनी की लेखनी ने छत्तीसगढ़ी व हिंदी में लेखन के क्षेत्र में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। रोली अक्षत (2004) तथा पेड़ बुलाते मेघ (2018) के बाद उनका तीसरा हाइकु संग्रह- ‘अक्षरलीला’ मेरे हाथ में है।

      रमेश कुमार सोनी हिंदी और छत्तीसगढ़ी भाषा में हाइकु, ताँका, सेदोका छंद को लोकप्रिय बनाने में अग्रणी रहे हैं। हिंदी हाइकु को पारंपरिक ढाँचे से बाहर निकालकर उसे छत्तीसगढ़ी भाषा और लोकसंस्कृति से जोड़ने वाले वे पहले रचनाकार हैं। ‘गुरतुर मया’ उनका छत्तीसगढ़ी हाइकु संग्रह है। उनकी कविताएँ जीवन, प्रकृति, समाज, पर्यावरण जैसे मुद्दों पर संवेदना व्यक्त करती हैं।

     रमेश कुमार सोनी की रचनाओं में लघु छंदों के माध्यम से प्रकृति और समाज के साथ ही पारंपरिक और लोकभाषा संगम की अनूठी भूमिका देखने को मिलती है। वे भाषा और शैली में नवाचार लाते हुए विविध भावनात्मक पक्षों को हाइकु की मर्यादा में समेटने में सक्षम रहे हैं। 

     14 उपशीर्षकों में विभाजित 'अक्षरलीलालघु छंद में विराट अनुभूति का संग्रह है। सोनी जी का अनुभव संसार कितना व्यापक है, प्रतिष्ठित साहित्यकार रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ की सूक्ष्म अंतर्दृष्टि से पता चलता है।

     रमेश कुमार सोनी का हाइकु संग्रह ‘अक्षरलीला’ विषयवस्तु की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध और विविधता से भरा हुआ है। इस संग्रह में जीवन के अनेक रूपों की सूक्ष्म झलकियाँ है, जो तीन पंक्तियों में हाइकुकार के पूरे अनुभव संसार को समेटने की कला को दर्शाती हैं। लेखक ने गाँव की सादगी और शहर की चहल-पहल, दोनों को संवेदनशील दृष्टि से देखा है—कहीं खेत की हरियाली है, तो कहीं शहरी भीड़ में खोती संवेदना।

     प्रकृति, ऋतुएँ, पेड़-पौधे, पक्षी, बारिश, धूप—इन सबको हाइकु के माध्यम से चित्रित करते हुए, सोनी जीवन के हर उस क्षण को पकड़ते हैं जो अक्सर हमारी व्यस्तता में अनदेखा रह जाता है। उनके हाइकु में मौसम की करवटें सिर्फ जलवायु परिवर्तन नहीं, बल्कि मन की अवस्था का रूप भी बन जाती हैं।

     इन हाइकुओं में जीवन के छोटे-छोटे दृश्य हैं—चूल्हे की आँच, नदी के किनारे की चुप्पी, स्कूली बच्चों की आवाज़, पतझड़ में झरते पत्तों की साँसें—जो पाठक को सीधे अनुभव के केंद्र में ले जाते हैं। ‘अक्षरलीला’ के हाइकु सिर्फ पढ़े नहीं जाते, वे महसूस किए जाते हैं।

     इनकी विशेषता यह है कि हर हाइकु एक चित्र है। वह चित्र जीवन की एक पूरी कथा को अपने भीतर समेटे होता है। गाँव से शहर, ऋतु से मनोदशा, और प्रकृति से आत्मा तक की यह यात्रा,अक्षरलीला’ को केवल एक हाइकु संग्रह नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन की लघु लेखनी बना देती है।

भोर का मौन/ पाखी ने मंत्र पढ़ा/ दुनिया जागी (1)

     पहला हाइकु ही प्रकृति के माध्यम से प्रात:कालीन जागरण की एक सूक्ष्म, भावपूर्ण छवि रचता है। पहली पंक्ति एक शांत क्षण की स्थापना करती है। भोर का मौन चेतना के जागरण से ठीक पहले का ठहराव है—जहाँ सारा जगत अभी नींद और जागरण के संधि-काल में है। यह मौन बहुत कुछ कहता है। यहाँ ‘पाखी’ प्रकृति का पहला पुजारी बन जाता है। उसकी चहचहाहट को कवि ने “मंत्र” कहा है, जिससे पक्षी का स्वर एक पवित्र, जाग्रत करने वाला अनुष्ठान बन जाता है। अंतिम पंक्ति में क्रिया और परिणाम आता है। पक्षी के मंत्र की गूँज से दुनिया जागती है। यह संवेदना और चेतना के स्तर पर भी एक जागरण है।

     यह हाइकु प्रकृति और मानव जीवन के अंतर्संबंध को अत्यंत सूक्ष्म, सौंदर्यपूर्ण और प्रतीकात्मक ढंग से प्रस्तुत करता है। तीन पंक्तियों में एक पूरा दृश्य, एक चेतना और एक संदेश समाहित है। यह कविता पाठक को न केवल सुबह का दृश्य दिखाती है, बल्कि उसे भीतर से जागृत भी करती है।

खेत गा उठे/ बैलों की घंटी संग/ किसान— राग। (5)     

     खेत गा उठे यह मानवीकरण है, जिससे खेत मानो किसान के श्रम के साथ स्वयं संगीत रचने लगते हैं। यहाँ ध्वनि का बिंब अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। बैलों के गले में बँधी घंटियाँ केवल संगीत का स्रोत नहीं, बल्कि श्रम के आरंभ की पुकार हैं। यह ध्वनि परिश्रम की पहचान है, एक लोक-ध्वनि, जो केवल कानों में नहीं, मन में गूँजती है। यह खेत, बैल और किसान के बीच की त्रयी को जोड़ती है।

     तीसरी पंक्ति इस हाइकु को एक संगीतात्मक और सांस्कृतिक ऊँचाई पर ले जाती है। ‘किसान-राग’ कोई स्थापित शास्त्रीय राग नहीं, बल्कि किसान के श्रम, पसीने, संघर्ष और आशा का राग है। यह राग प्रकृति से उपजता है—जिसमें मिट्टी की सोंधी गंध, बैलों की चाल, और मानवीय श्रम की तपिश शामिल है।

     रमेश कुमार सोनी ने अपने संग्रह में नवीन प्रयोग भी किए हैं—

शेखी बघारे/ काँटों बीच गुलाब/ जेड प्लस में। (53)

 काँटों के बीच गुलाब ऐसा है, जैसे उसे जेड प्लस सुरक्षा मिली है। 

तितली उड़ी/ ग्लोबल सिटीजन/ प्रकृति जाने। (81)

 तितली को कवि ने ग्लोबल सिटीजन कहा है।

कवि ने मृगी को ट्रेनर माना है—

छौने उछले/ मृगी चौकस खड़ी/ ट्रेनर अच्छी। (7)

 कवि ने बाज को पैराग्लाइड करते देखा है—

नभ में बाज/ पैराग्लाइड करे/ योग में मग्न। (18)

 दर्पण के सामने गौरैया का बच्चों सा ठुमकने का दृश्य मनभावन है—

दर्पण देख/ गौरैया ठुमकती/ बच्चों के जैसी। (46)

 आज के युग की भयावह तस्वीर दिखाता यह हाइकु है— 

फ्रिज सहमा/ चालीस टुकड़ों का/ गवाह बना। (70)

     सोनी के इस हाइकु संग्रह के सभी हाइकु भाव भाषा से समृद्ध हाइकु हैं। जीवन, समाज, प्रकृति का कोई भी रंग उनकी लेखनी से छूटा नहीं है। आशा है पाठक को यह संग्रह पसंद आएगा।

रश्मि विभा त्रिपाठी

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अक्षरलीला (हाइकु-संग्रह): रमेश कुमार सोनी, पृष्ठ: 112, मूल्य: 340 रुपये, ISBN: 978-93-6423-264-7, प्रथम संस्करण: 2025, प्रकाशक: अयन प्रकाशन, जे- 19/39, राजापुरी, उत्तम नगर, नई दिल्ली— 110059