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रोली अक्षत 2004


      रोली अक्षत मेरा प्रथम हिंदी हाइकु-संग्रह है जो सन 2004 में प्रकाशित हुआ था। यह छत्तीसगढ़ का भी प्रथम हिंदी हाइकु-संग्रह है। 
      इसकी समीक्षाएँ यथासमय प्रिंट मीडिया में प्रकाशित हुई हैं ऐसी ही दो समीक्षा को डिजिटलाइज करते हुए आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ। 
     इसके साथ ही मैं हाइकु समीक्षक द्वय को इसके माध्यम से धन्यवाद सहित अपनी श्रद्धाजंलि अर्पित करता हूँ-

1
देखन में छोटे लगे
(बिजनौर टाइम्स उ.प्र.)

     प्रमुख हिन्दी कवि बिहारी द्वारा रचित दोहों के बारे में यह उक्ति प्रसिद्ध हैं-

सत सैया के दोहरे ज्यों नावक के तीर।

देखन में छोटे लगे, घाव करें गंभीर ॥

     बिहारी के एक-एक दोहे में जो अर्थ कूट-कूटकर भरा है, उसे प्रगट करने के लिए साधारण कवियों को कई पंक्तियाँ लिखनी पड़ेंगी, तब भी वह प्रभाव नहीं आ पाएगा।

     हिन्दी के जाने माने कवि कहानीकार एवं स्तंभलेखक रमेश कुमार सोनी का एक हाइकु संग्रह ‘रोली अक्षत’ मेरे सामने है। इसका प्रकाशन वैभव प्रकाशन, रायपुर छत्तीसगढ़ द्वारा सन-2004 में किया गया था। वैसे लेखक ने पुस्तक की एक प्रति उसी वर्ष मुझे भेज दी थी तो भी अब तक मैं उसकी समीक्षा नहीं लिख पाया। हाइकु एक सरल छंद है, जिसके केवल तीन चरण होते हैं। पहले और तीसरे चरण में पाँच-पाँच अक्षर दूसरे चरण में सात अक्षर। कुल सतरह अक्षर। यद्यपि हाइकु का आकार इतना छोटा है तो भी सफल रचनाकार उसके माध्यम से अपने अनुभूत यथार्थ की सशक्त अभिव्यक्ति अत्यंत सुंदर ढँग से कर सकता है। बिहारी के दोहों के समान। उसमें लोकमंगल की भावना भी आ जाए तो सोने में सुगंध ।

     वैसे तो हाइकु मुक्तक छंद है। अतः एक-एक हाइकु का अपना स्वतंत्रता अस्तित्व है पर कोई-कोई हाइकुकार हाइकु रचनाओं में प्रबंधात्मकता का भी थोड़ा बहुत निर्वाह करते हैं। रमेश कुमार सोनी ने अलोच्य संग्रह को कई शीर्षकों के अंतर्गत बाँटा है। एक-एक शीर्षक के अंतर्गत आने वाले हाइकु पदों में हल्का संबंध भी जुड़ गया है। एक-एक भाव को अधिक पूर्णता प्रदान करने में यह रीति सहायक हुई है। लोरी कहानी खंड की रचनाओं में नारी के पुत्री, पत्नी, माँ तीनों रूपों को वंदनीय मानते हुए लिखा है-

ना दूध कर्ज/ना लोरी, ना कहानी/कैसे चुकाए।

     ममतमयी माता अपनी संतान को दूध पिलाकर लोरी गाकर, कहानी सुनाकर बड़े प्रेम व वात्सल्य के साथ पालती पोसती है पर क्या संतानें इसका कर्ज चुकाती हैं? जो संतान पढ़ लिखकर जितना उच्च पद पाती है, वह माता से उतनी ही दूसरी पर बस जाती है। माता यदि विधवा भी बन गयी तो?

विधवा हुई/मौत की परछाई/जीने न पाई।

     लेकिन फैशन के नाम पर जिस्म की जो नुमाइश होती है, उससे कवि समझौता नहीं कर पाते।

कैसी साजिश/जिस्म की नुमाइश/तेरी ख्वाहिश।

     आज हम देखते हैं जाति, धर्म और राजनीति, भाषावाद और प्रांतवाद आदि के नाम पर जनसमूहों में विद्वेष पनप रहा है। दुनिया के विभिन्न भागों में बम विस्फोट हो रहे हैं। बच्चों, महिलाओं सहित निरपराध जनों की हत्याएँ हो रही हैं। कवि का आह्वान है-

मन का मोल/चले रेलम पेल/बिना सिग्नल।

     इसमें शब्दालंकार और अर्थालंकार का कैसा अच्छा संयोग हुआ है। दहेज की कुप्रथा कैसे लड़कों को भी संकट में डालती है इस पर कहते हैं-

दूल्हा बेचारा/शादी के बाजार में/लाचार मर्द।

और नई दुल्हन की स्थिति देखिए-

नई दुल्हन/बड़ी है उलझन/केंद्रीय जेल।

     समाज में व्याप्त घने अंधकार के चंगुल से उसे कैसा नेतृत्व मुक्त कर सकेगा? इस पर उनका हाइकु है-

शूल से यारी/पौरूष और यौवन/ज्योतिर्गमय।

     नेतृत्व करने वाले ऐसे युवा है, जिनमें समाज के लिए कष्ट सहन करे और प्राण तक न्यौछावर करने का साहस हो। हमारे देश की यह हालत है। नब्बे वर्ष पार कर जाने पर भी विधानसभा और संसद की कुर्सी का मोह छूटता नहीं, फिर साहसी, निस्वार्थ युवक कैसे आगे आएँ? हमारी अंधेर नगरी का हाल देखिए-

सब लुटेरे/किससे लड़ें-बचें/सभी अपने।

     जब ये पंक्तियाँ लिखी गईं, तब 2जी स्पेक्ट्रम, कॉमनवेल्थ गेम्स, आदर्श सोसायटी घोटाला जैसे पदबंध सुर्खियों में नहीं थे। कहते हैं, अधिकार दिए नहीं जाते लिए जाते हैं,कवि का आह्वान है-

छीन लीजिए/निज हिस्से की रोटी,/ऐसे ना मिले।

…..

के.जी.बालकृष्ण पिल्लै-तिरुवनंतपुरम 

.....

2

जीवन में सुख-दुःख का एहसास कराता हुआ हाइकु संग्रह "रोली अक्षत"     

     "रोली अक्षत" श्री रमेश कुमार सोनी का प्रथम हाइकु संग्रह है। इस हाइकु संग्रह के प्राक्कथन में कवि ने वर्तमान जीवन की अवदशा तथा उस संदर्भ में अपनी मानसिकता को व्यक्त करने के लिए अपने हृदय के मार्मिक उद्‌गारों को "रोली अक्षत" हाइकु संग्रह में व्यक्त किया है। "रोली अक्षत-हाइकु जगत में रहे अक्षत" शीर्षक के अंतर्गत शंभूशरण द्विवेदी "बन्धु" ने सोनी के हाइकुओं पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। श्री द्विवेदी जी को इस हाइकुकार से आशा है, अतः स्पष्टतः कहा है -"हाइकुकार के रूप में  रमेश कुमार सोनी का यह हाइकु संग्रह हिन्दी जगत में अपना विशिष्ट स्थान भी बनाने में समर्थ होगा। इसकी इंद्रधनुषी छटा पाठकों को आकर्षित करेगी।" "अर्चना की थाली में सजे रोली अक्षत शीर्षक अंतर्गत डॉ. सुधा गुप्ता ने भी सोनी की रचनाधर्मिता को सराहा है।"

      "रोली अक्षत" हाइकु संग्रह में कवि ने विविध शीर्षकों के अंतर्गत जीवन के विविध भावों को रेखांकित करने का सफल प्रयास किया है। नारी के प्रति कवि का दृष्टिकोण उदात्त रहा है, क्योकि नारी हर रूप में महान है। अतः कवि ने प्रारंभ में ही कहा है-

नारी, बहन/पुत्री, पत्नी, रूप है/वंदनीया।

     कवि जीवन में हर हाल में निराशा को भूलकर आशा भरे जीवन की कामना करता है अतः स्पष्टतया कहता है-

मन यौवन/पिघला दे पत्थर/यही पौरुष।

     अंधेरी नगरी में आज के राजनीतिक जीवन की अवदशा का चित्र प्रस्तुत करते हुए कवि ने सच ही कहा है-

चौपट राजा/अंधेर नगरी है/ भ्रष्ट शासन।

     शायद इस कारण ही देश आज अत्यंत दयाजनक स्थिति से गुजर रहा है-

ऑफिस बाबू/साहब चपरासी/आतंकवादी।

      आज की शैक्षणिक व्यवस्था पर करारा व्यंग्य करते हुए कवि ने सच ही कहा है -

गुरु महिमा / किधर है गरिमा /धन महिमा।

"एक भारती" में कवि का देशप्रेम व्यक्त हुआ है-

तुझे नमन/वतन हिन्दुस्तान/हर्षित मन।

"सियासत का खेल" का व्यंग्य देखिए -

पैसे जिनके/सरकार उनकी/हम पराये।

     इस प्रकार रोली अक्षत में श्री रमेश कुमार सोनी ने जीवन और प्रकृति के अटूट संबंध को व्यक्त करके अपने दिल की धड़कन को वाणी दी है। जब भी कोई बात दिल से निकलता है, तब वह चोट भी पहुँचाता है। अतः इन हाइकुओं में प्रभाव क्षमता की भावना बेजोड़ है।

प्रा. मुकेश रावल-आणंद 

अध्यक्ष,हिन्दी विभाग-आणंद आर्ट्स कॉलेज, 

आणंद, गुजरात 

…..

रोली अक्षत, हाइकु संग्रह, रमेश कुमार सोनी, 

प्रकाशक-वैभव प्रकाशन, रायपुर (छ.ग.), 2004

मूल्य 100/- रुपये

…..

(साहित्य वैभव अंक 3 मई-जुलाई 2005 रायपुर में प्रकाशित पृष्ठ-50)







अक्षरलीला


मेरा अक्षय तृतीया-
         'अक्षरलीला' हिंदी हाइकु में मेरा यह तीसरा संग्रह है जो अतिशीघ्र आपके पास होगा। 
         अयन प्रकाशन-दिल्ली से यह प्रकाशित हो रहा है। 

मेरा पहला हिंदी हाइकु-संग्रह 'रोली अक्षत'-2004 है जो छत्तीसगढ़ का पहला हिंदी हाइकु-संग्रह है। 'गुरतुर मया' मेरा छत्तीसगढ़ी का हाइकु-संग्रह है। 

रमेश कुमार सोनी
रायपुर


गॉफ के साये में


हाइकु का घनेरा साया

           हिंदी हाइकु देश की सीमाओं को लाँघते हुए वैश्विक स्तर पर अपनी लोकप्रियता का डंका पीट रहा है। कई देशों से हिंदी हाइकु के एकल संग्रहों का प्रकाशन इसका प्रमाण है। हाइकु के वामन विस्तार से हम सभी गौरवान्वित हैं। ऐसा सब सम्भव हुआ है सोशल मीडिया के प्रचार-प्रसार से, ‘हिंदी हाइकु’ इसका सशक्त पटल है। इसने कइयों को हाइकु लेखन के प्रति आकर्षित किया और उन्हें निखारा। विगत दशकों से एकल और साझा संग्रह,अनुवाद, विशेषांक एवं समीक्षा ग्रंथ से होते हुए हाइकु ने विश्वविद्यालयों के शोध एवं पाठ्यक्रम में अपना दखल सुनिश्चित किया है। हिंदी हाइकु अपने निर्धारित फ्रेम-5,7,5 यानि 17 वर्ण में तीन पंक्तियों की पूर्ण कविता है। यह क्षण मात्र की अनुभूतियों को सृजित करने की मुश्किल विधा है जिसमें भाव एवं विचारों की अभिव्यक्ति होती है। इस जापानी विधा का पूर्णतः हिन्दीकरण हो चुका है अतः अब यह अपनी विषय सीमाओं को लाँघकर मानवीय संवेदनाओं पर भी केंद्रित हो रही है। 

      समीक्षित कृति ‘ग़ाफ़ के साये में’ -डॉ. नितीन उपाध्ये (UAE) का सद्यः प्रकाशित हाइकु संग्रह है। आप पेशे से मेकेनिकल इंजीनियर हैं आप लिखते हैं- 

जमा रहा हूँ/पीपल जैसी जड़ें/परदेस में। 

दूर करता/एक-एक डॉलर/मातृभूमि से। 

आप पर कई साहित्यिक विद्वानों की संगत का प्रभाव पड़ा जिसने आपकी आनुभूतिक चक्षुओं को प्रखर किया। भूमिका में डॉ. जगदीश व्योम लिखते हैं कि- ‘कविता लिखने के लिए शब्दों का जोड़-तोड़ ही नहीं, कुछ और भी जरूरी है। यद्धपि 'कुछ और' को परिभाषित कर पाना सबसे कठिन है। …..'कुछ और' की पूँजी जिस रचनाकार के पास जितनी अधिक होगी, कविता का फलक भी उतना ही विस्तृत होता चला जाएगा। 'कुछ और' में- लोक जीवन से जुड़ाव, प्रकृति के प्रति सहचार्य का भाव, वस्तुओं को देखने की सूक्ष्म और वैज्ञानिक दृष्टि, मनोविज्ञान की समझ आदि-आदि न जाने कितना कुछ समाया हुआ है।’ 

      बढ़ती हुई दुनिया में सिमटते परिवारों की व्यथा किसी से छिपी नहीं है। अपेक्षाओं के बोझ तले सिसकते रिश्तों की आवाज़ दूर तक सुनाई देती है। खून के रिश्तों की गर्माहट को कम आँकते हुए बढ़ते वृद्धाश्रम एवं अनाथालय काफ़ी कुछ कहते हैं। सोशल मीडिया के इस बुरे दौर में रिश्तों के पास अपनों के लिए समय नहीं है यह घोर चिंताजनक है। आपके ज्यादातर हाइकु माँ और पिताजी की स्मृतियों तथा संघर्ष पर केंद्रित हैं। 

घर दफ़्तर/यही पिता की यात्रा/चार धाम की। 

उठा है बच्चा/अब वक़्त कटेगा/दादा-दादी का।

खुली खिड़की/आने लगी घर में/दुनिया सारी। 

द्वारे रंगोली/तुलसी पर दीया/घर में है माँ। 

     इन दिनों बढ़ते व्यभिचार से तमाम लोग हलाकान हैं व्यवस्था की पोल खोलते हुए अपराध और नैतिकता को अपने ठेंगे पर रखे अपराधियों पर ये हाइकु कड़ी चोट करते हुए प्रस्तुत हुए हैं- 

काली निगाहें/कपड़ों के भीतर/रेंगती रही। 

हजारों गिद्ध/लाखों चमगादड़/एक चिड़िया। 

     हमारी प्रकृति हम सब की पालनहार है इसका सौंदर्य प्रत्येक ऋतु में निखरते रहता है। इन ऋतुओं के अपने अलग त्यौहार हैं जो उमंग फैलाते हुए जीवन को नयी आशावादी दृष्टिकोण से ऊर्जान्वित करते हैं। प्रत्येक मौसम की अपनी कहानी है जिसमें ख़ुशी की चहलकदमी है। इन हाइकु में मानवीयकरण के साथ बिम्ब और प्रतीकों का सुंदर तालमेल है-हिंडोला झूला रही पंछियों को हवा, पंछियों की पूरी छुट्टी होने,गंगा नहाके तैयार नाव एवं वसुधा का स्वर्ण लेपन करती रश्मियों की छटा निराली है-

गोदती हवा/आकाश के तन पर/मेघों के टैटू। 

छुट्टी की घंटी/चहचहाते पंक्षी/फुर्र से उड़ें। 

जलाभिषेक/करते धरा पर/मेघ-कलश। 

स्वर्ण लेपती/गंगा के तन पर/रवि रश्मियाँ। 

भोर होते ही/तैयार हुईं नावें/गंगा नहा के। 

    वैश्विक आधुनिकता की आँधी के कारण वसुधा की अकूत संपदा और सौदर्य ने इंसानों को लोभी और भोगी बनाया है। पहले हम इसके संरक्षक होते थे, हमारे बदले आहार से हमारे विचार पहले प्रदूषित हुए और फिर प्रदूषणों की सुरसा का मुँह खुल गया।  आज हमारे पास इन समस्याओं का कोई समाधान नहीं हैं- ग्लोबल वार्मिंग, ग्रीनहाउस प्रभाव, अम्लीय वर्षा, सूखा-बाढ़, प्लास्टिक, भूस्खलन, कटते वन,घटते वन्यजीव और सिसकती मृदा। पर्यटकों के बोझ से थके पहाड़, तेज़ाब की वर्षा, नदी की लाश, प्रकृति रक्षा के पैम्पलेट का कूड़ा में पाया जाना जैसे दृश्य अब विचलित करते हैं। आम जनजागरण हेतु ये हाइकु मशाल लिए निकले हैं-

आया शिकारी/जाल में फँसे छौने/चीखा जंगल। 

झुलसा गई/तेज़ाबी बरसात/कोख धरा की। 

बहती रही/शहर में आकर/नदी की लाश। 

प्रकृति रक्षा/कल छपे पोस्टर/आज कूड़े में। 

     आज के युग में मानवीय मूल्यों के ह्रास को हर अख़बारी पन्ने पर पढ़ा जा सकता है। इसकी चिंता सबको है लेकिन समाधान सिर्फ कहने-सलाह देने तक ही सीमित है। तमाम समस्याओं के साथ सत्ता की जुगलबंदी से निकले आश्वासन अपना भरोसा खो चुके हैं। बाजार की सत्ता घरों से होते हुए जेब पर डाका डालने बैठी है और लोग हैं कि किसी भी कीमत पर बिकने को तैयार हैं ऐसे ही हाइकु के अंदाज़ देखिए-

खाली बगीचे/भरे चिकित्सालय/खाली मैदान। 

हम सामान/हम ख़रीददार/हमीं बाजार।

     आपके हाइकु में भाव एवं विचारों की स्पष्टता है। शिल्प का पालन किया गया और संवेदनाओं को पिरोया गया है। प्रेम, ईश्वर की सबसे बड़ी देन है जिसपर ये दुनिया टिकी हुई है। प्रेम जब किसी को होता है तो उसके अलावा सारी दुनिया को पहले पता चल जाता है। प्रेम-प्यार का गुड़ और तिल-तिल ज़िन्दगी मीठी ही मीठी लगती है, चाय की चुस्कियाँ अधूरी हैं तथा इसमें दो ज़िस्म एक जान होकर एकाकार हो जाते हैं-ये है इस दुनिया की बात। भारत की भक्ति परंपरा में त्याग और समर्पण को उच्च स्थान प्राप्त है जिसमें पाना यानि मोक्ष की कामना है, देह नहीं। इस प्रेम पर जितना लिखा जाए कम ही है फिर भी प्रेम के ये लिफ़ाफे खोलिए जिसे लौटाने की बात इस हाइकु में है, शायद वो आपके लिए हों-

दमक उठा/मन का कोना-कोना/तेरे जिक्र से। 

मैं,मैं न रहा/तुम-तुम न रहे/एक हो गए। 

लौटा आया हूँ/भेंट के लिफ़ाफ़े में/ उसके ख़त। 

हर सुबह/चाय की दो प्यालियाँ/तुम और मैं। 

    इस संग्रह में कुल 501 हाइकु विविध विषयों में यत्र-तत्र बिखरे हुए हैं जिनमें उपविषयों के अनुसार अलग नहीं रखा गया है जिससे पाठकों की दृष्टि बार-बार बदलते रहती है, पढ़ने की एकाग्रता टूट जाती है। ग़ाफ़ का वृक्ष UAE का राष्ट्रीय पेड़ है जिसे भारत में खेजड़ी के नाम से जाना जाता है। रचनात्मकता पूर्णतः ग्रहणशीलता पर आश्रित होती है। प्रत्येक हाइकुकार की अपनी सृजन भूमि होती है, पृथक शब्दावलियों की बगिया होती है जहाँ से उस अनुभूत दृश्य को शब्दों में पिरोने हर बार वह स्वयं को व्यक्त करता है। आपने जो कुछ विदेश में अनुभूत किया उसका सुंदर मानवीयकरण इन हाइकु में दृष्टव्य है। आप लिखते हैं- प्यासी हवाएँ मिलों ढूँढती हैं पानी, हवा को काटते उड़ते हैं रेत के कण, गॉफ के वृक्ष का भागते हुए मेघ को देखना…

गर्म रेत पे/भटके नंगे पाँव/अकेला दिन। 

नदी के बिना/समंदर कुँवारा/खाड़ी देश में। 

पके खजूर/महक दूर-दूर/दौड़ी चीटियाँ। 

     इस जीवन में सर्वत्र विसंगतियाँ ही विसंगतियाँ हैं यदि आपकी दृष्टि ही वैसी हो लेकिन ऐसा मानकर चुप भी बैठा नहीं रहा जा सकता। साहित्य को चाहिए कि वह समाज को आईना दिखाए इन हाइकु में आपने वही किया है-विद्या मंदिर की भब्यता देखकर माता शारदा का डरना जैसी टिप्पणी हमारी खोखली होती शिक्षा व्यवस्था पर करारी चोट है-

जब भी जली/राजनीति की भट्टी/भुनी जनता। 

पर्दे पे पर्दा/चेहरे पे चेहरा/सबको पता। 

राजा ने ओढ़ी/रेशम पे खद्दर/रँगा सियार। 

     चार दिन की इस ज़िन्दगी में शिकवा-शिकायत से हमें फुर्सत निकालकर इसे सँवारने में लगाना चाहिए क्योंकि ज़िन्दगी शतरंज की बाज़ी सी होती जा रही है इसमें हमें मोहरों की तरह चुनना होगा आँसू या मुस्कान। हमें अपना गिरेबाँ अपना मूल्यांकन और अपने व्यवहार कभी नहीं दिखते ऐसे ही भावों को मानवता बनाए रखने के लिए आप लिख रहे हैं-

एक अकेला/जोड़कर निन्नावे/बन जाता सौ। 

कब देखोगे/खुद का व्यवहार/मेरी दृष्टि से। 

कहते हैं जो/अपना नहीं कोई/वो किसके हैं। 

मेरी आपकी हाइकु लेखन की संभावनाओं को शुभकामनाएँ और इस संग्रह के लिए हार्दिक बधाई। 


रमेश कुमार सोनी

रायपुर, छत्तीसगढ़

मो.-7049355476

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ग़ाफ़ के साये में-हाइकु संग्रह, डॉ. नितीन उपाध्ये

सृजन बिम्ब प्रकाशन-नागपुर 2024

ISBN:978-93-91817-54-1

मूल्य-200/-₹, पृष्ठ- 128

भूमिका-डॉ. जगदीश व्योम एवं कमलेश भट्ट कमल

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New arrival


पीपल वाला घर

पर्यावरणीय कविता संग्रह-रमेश कुमार सोनी
शुभकामनाएँ-डॉ. अनिता सावंत (पर्यावरण वैज्ञानिक) छत्तीसगढ़
भूमिका-अजय चंद्रवंशी, कवर्धा
ISBN:978-81-19292-90-5, मूल्य-200/-₹, पृष्ठ-129
जिज्ञासा प्रकाशन-ग़ाज़ियाबाद (उ.प्र.)
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       यह मेरी पहली हिंदी कविता संग्रह है जो लम्बी प्रतीक्षा के बाद प्रकाशित हुई है। इस पर्यावरणीय कविता संग्रह 'पीपल वाला घर' में मेरी 51 कविताएँ संगृहीत हैं जिनमें से कुछ कविताएँ विविध समय पर विविध पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। 
     आप सभी सुधि पाठकों, संपादकों, एवं इस संग्रह की भूमिका लिखने हेतु-अजय चंद्रवंशी जी तथा शुभकामना संदेश लिखने के लिए डॉ. अनिता सावंत जी का आभार व्यक्त करता हूँ। 
शीघ्र ही यह पुस्तक आप तक पहुँचेगी, कृपया अपना कीमती समय निकालकर मुझे पढ़िएगा। 
आपकी टिप्पणी/समीक्षा की प्रतीक्षा रहेगी।

रमेश कुमार सोनी

आख़िरी उड़ान


आखिरी उड़ान 


उड़ गए हैं सभी पँख उगते ही 

सूने घोसलें में ताक रही है-

दाना लिए,आज फिर एक माँ;

जाने किधर गए होंगे?

जिंदा भी हैं या कोई निगल गया?

गौरैया हर बार उसे खोजकर

उदास लौट आती है।


धोखा खाना गौरैया की नियति बन गई है- 

इस बार वह अपने बच्चों को ढूँढने 

कॉन्क्रीट के जंगलों से भी लौट आयी

किसी को कोई फर्क नहीं पड़ा 

दुनिया यूँ ही चल रही है। 



गौरैया के पास 

भोजन-पानी खरीदने को पैसे नहीं है!

उधारी उसे कौन देगा?

गिरवी में वह क्या रखेगी? 

उसे चोरी-डकैती आती नहीं 

इन दिनों भोर और साँझ का कलरव 

ढूँढ रहा हूँ मैं।


मेरे पौधों के बड़े होने तक 

चिड़िया लौट गई थी जाने कहाँ,

काश मैं अपने अतिथियों को 

कुछ दिन और रोक पाता 

मैं उनके लौटने की प्रतीक्षा में 

कुछ और पौधे लगा रहा हूँ….। 

….. 

रमेश कुमार सोनी

रायपुर, छत्तीसगढ़