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पीपल वाला घर

पर्यावरणीय कविता संग्रह-रमेश कुमार सोनी
शुभकामनाएँ-डॉ. अनिता सावंत (पर्यावरण वैज्ञानिक) छत्तीसगढ़
भूमिका-अजय चंद्रवंशी, कवर्धा
ISBN:978-81-19292-90-5, मूल्य-200/-₹, पृष्ठ-129
जिज्ञासा प्रकाशन-ग़ाज़ियाबाद (उ.प्र.)
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       यह मेरी पहली हिंदी कविता संग्रह है जो लम्बी प्रतीक्षा के बाद प्रकाशित हुई है। इस पर्यावरणीय कविता संग्रह 'पीपल वाला घर' में मेरी 51 कविताएँ संगृहीत हैं जिनमें से कुछ कविताएँ विविध समय पर विविध पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। 
     आप सभी सुधि पाठकों, संपादकों, एवं इस संग्रह की भूमिका लिखने हेतु-अजय चंद्रवंशी जी तथा शुभकामना संदेश लिखने के लिए डॉ. अनिता सावंत जी का आभार व्यक्त करता हूँ। 
शीघ्र ही यह पुस्तक आप तक पहुँचेगी, कृपया अपना कीमती समय निकालकर मुझे पढ़िएगा। 
आपकी टिप्पणी/समीक्षा की प्रतीक्षा रहेगी।

रमेश कुमार सोनी

विश्व पर्यावरण दिवस-कविता

सुरमई भोर


उठो साथियों हमको ये, सुरमई भोर बुलाती है;

चिड़िया है उदास, हमें उसे गीत सुनानी है। 


उठो साथियों हमको ये, सुरमई भोर बुलाती है...

विधवा धरा है रोती, देखो बबूल पुकारे है;

छोड़ कुल्हाड़ी,उठा कुदाल- अब दौड़ लगाना है। 


उठो साथियों हमको ये, सुरमई भोर बुलाती है..

देखो पसीना ना सूखे , हमें छाँव उगाने हैं;

आम को तरस रहे हैं बच्चे, हमें अमराई सजाने हैं।


उठो साथियों हमको ये, सुरमई भोर बुलाती है...

देखो पानी है-बोतल में,प्यासे पक्षी पुकारे हैं;

चलो खोद लें पाताल कि , हमें नदी बहाने हैं।


उठो साथियों हमको ये, सुरमई भोर बुलाती है..

देखो आग लगी वसुधा में,हाथी चिंघाड़े हैं;

उठाओ चुल्लू-चोंच अपनी, हमें शेर बचाने हैं।


उठो साथियों हमको ये, सुरमई भोर बुलाती है..

बरखा रूठी,बंजर खेत पुकारे हैं;

हवा साफ रखें हम, झोला - साथ उठाना है। 


उठो साथियों हमको ये, सुरमई भोर बुलाती है..

कांक्रीट के घर और काली, सड़कें पूछती हैं;

कहाँ गए वो लोग, जिन्हें हम-पानी पूछते थे। 


उठो साथियों हमको ये, सुरमई भोर बुलाती है...

उठो साथियों अब तो छोड़ो , क्या तेरा-क्या मेरा है;

हम सबकी है- ये धरती ,क्यों तू  दूसरे- ग्रह को खोजे है।


उठो साथियों हमको ये, सुरमई भोर बुलाती है...

कचरे को ना कहना सीखें- जीवन अब ये गाती है ;

पॉलीथिन में -लिपटे जाओगे , चेता-वनी ये अब भी जिंदा है। 

उठो साथियों हमको ये, सुरमई भोर बुलाती है..

….. 

रमेश कुमार सोनी

रायपुर,छत्तीसगढ़



विश्व पर्यावरण दिवस-कविता 2


अलार्म बज रहा है 


इतना पानी दिन भर में पीना है

इतनी साँसे गिनकर लेनी है

इतने समय तक काम करना है

इतने समय व्यायाम करना है 

इतने समय में सोना-जागना है 

इतना डाटा उपयोग करना है 

इतना ही हँसना-बोलना है; 


इतने ही पैसों में जिंदा रहना है

इतना ही खाना,खाना है 

दवाईयाँ तो तय समय पर लेना ही है 

सब कुछ तय होता है-शहरों में।

बहारों को प्रवेश से पहले ही 

शहर के नियम पता हैं


देखो वसंत भी 

गमलों में कनबुच्ची करते बैठा है

हवाएँ, अपनी मर्जी से 

यहाँ-वहाँ घूम नहीं सकतीं

नदियाँ बेशोर निकल लेती हैं 

अतिथियों का प्रवेश निषेध है ही। 


जब सब कुछ तय है इनका यहाँ पर 

फिर यहाँ के लोग 

मरने से डरते क्यों हैं? 

क्या बचा रह गया है शहर में इनका? 

डॉक्टर ने पहले ही चेता दिया है कि-

तुम्हारा कोटा पूरा हो चुका है!


नमक,शक्कर,तेल-घी, मसाला सब बंद।

आखिरकार एक दिन 

शहर ने सुना ही दिया-

इनकी सेवा-सुश्रुषा करो

आब-ओ-हवा बदल दो 

दुआएँ करो…


अब ये प्लास्टिक के पहाड़ जैसे लोग 

गाँव में अपना घर ढूँढ रहे हैं-

नदी किनारे,जंगल के पास 

शहर जैसा घर

अलार्म बज रहा है…

श श श कोई जा रहा है….। 

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रमेश कुमार सोनी

रायपुर, छत्तीसगढ़




#विश्व पर्यावरण दिवस-कविता 1

आखिरी पेड़ 

जंगल कहते ही 

याद आने लगते हैं- 

पशु- पक्षी, नदी, झरने और 

जंगल का कानून, 

पेड़ मानते हैं कानून 

इसलिए सावधान खड़े हैं 

जंगल कहे तो ये फूल- फल जाते हैं, 

झर जाते हैं, कट जाते हैं 

उफ़्फ़ भी नहीं करते । 


सड़कों की सीमा पर खड़े पेड़ 

कई दिनों से उनीदें हैं 

वे टकराना नहीं चाहते आदमी से 

क्योंकि ये विनम्र और अहिंसक हैं 

धूल- धुआँ, पत्थर और 

मौसम की बेरुखी सहते हुए भी सबको 

पानी और छाया निःशुल्क देते हैं ; 

उदास होने पर 

पत्तियाँ गिराकर नंगे खड़े हो जाते हैं और 

खुश होने पर महक कर

फल -फूल बाँटने लगते हैं । 

पेड़ों की  परिंदों से यारी है 

पाखी उन्हें अपने गीतों में ढालकर 

दुनिया का हाल- चाल सुनाते हैं, 

पेड़ चूजों के पलायन से खुश हैं 

क्योंकि वे चाहती हैं कि- 

बीजों की तरह ही 

सबकी बिरादरी 

दूर का प्रेम संबंध निभाए । 


पेड़ डरे हुए हैं आजकल 

कुल्हाड़ी की लकड़ी से 

जो पेड़ों की कमज़ोर नस को जानती है 

विभीषण की तरह; 

एक पेड़ कटने की शोक सभा में 

आज जंगल के सभी पेड़ उपवास पर हैं 

ठूँठ सिसक रहे हैं,

पक्षी हत्यारे की खोज में निकल पड़े हैं,

डोजियर तैयार हो रहा है; 

लोग पौधे लगाते तो हैं 

पर बचाते कहाँ हैं ? 

आदमी चाहे तो जंगल बचेंगे 

क्योंकि अब जंगल का कानून 

लोग ही तय करते हैं !! 

आदमी के चाहने पर ही बचेगा आखिरी पेड़ ।

       ……..      ……… 


रमेश कुमार सोनी 

रायपुर ( छत्तीसगढ़ )

पिन - 493554 , संपर्क - 7049355476