Showing posts with label रायपुर. Show all posts
Showing posts with label रायपुर. Show all posts

अक्षरलीला

‘अक्षरलीला’- जग की लीलाओं को समेटते सत्रह अक्षर

 ऋता शेखर ‘मधु’

     ‘अक्षरलीला’ रमेश कुमार सोनी का सद्य प्रकाशित हाइकु संग्रह है। हाइकु जगत में रमेश कुमार सोनी जी का स्थान उल्लेखनीय है। विविध विषयों पर हाइकु लिखना उनकी क्रियाशीलता एवं अनुभव के वृहद संसार का परिचायक है। क्षण विशेष को सत्रह वर्णों में समाहित करके दृश्यमान कर देना हाइकुकार की विशेषता होती है। पूर्व में दो हाइकु-संग्रह प्रकाशित करवाने के बाद यही विशेषता तीसरे हाइकु-संग्रह ‘अक्षरलीला’ में पाठकों के समक्ष आयी है। सर्वप्रथम  पुस्तक का नाम  ही आकर्षित करने वाला है। अक्षरों की लीला कभी रामलीला, कभी कृष्णलीला की तरह मनोहारी दृश्य उत्पन्न करती हैं और कभी प्रकृतिलीला की तरह आक्रामक भी हो सकती हैं। पुस्तक हार्डकवर के साथ सुसज्जित है। पृष्ठों की गुणवत्ता बहुत अच्छी है। 


     पुस्तक माता-पिता को श्रद्धापूर्वक समर्पित की गई है। हाइकु को चौदह विषयों में विभाजित किया गया है। पुस्तक को जाने-माने वरिष्ठ हाइकुकार रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ जी का आशीर्वचन प्राप्त है। पुस्तक में 14 विषय लिए गए हैं जिनमें प्रकृति, जीवन दर्शन एवं सामाजिक रिश्ते शामिल हैं।

     ‘पाखी की सरगम’ विषय में कुल 84 हाइकु में जहाँ अपने गाँव की मिट्टी पर गर्व प्रदशित किया गया है वहीं सेमल बीज की यात्रा एक दृश्य उत्पन्न करती है जो बचपन में कुतूहल का विषय हुआ करता था। समाज में कम कपड़ों से बने आधुनिक परिधान को लक्ष्य करके लिखा गया हाइकु विचारणीय है।

गुरूर देती/ चंदन जैसी शोभा/ गाँव की मिट्टी।

सेमल बीज/ हवाई यात्रा करे/ पैराशूट में।

तन ढकने/ नोची गयी कपास/ तन उघरे।

     पशु-पक्षी-कीटों को आधार बनाकर रचे गए 56 हाइकु ‘खरगोश फुदके’ विषय में सम्मिलित हैं। अत्यधिक गर्मी से मनुष्य या अन्य जीव भले भी परेशान होते हों मगर ऊँट को वही गर्मी भली लगती है। मौसम की विविधता का प्रभाव सभी के लिए एक जैसे हों, यह आवश्यक नहीं। चौपायों से सड़कों पर जो अफरातफरी होती है उसपर भी सटीक हाइकु का सृजन हुआ है।

तपती रेत/ऊँट-गर्मी न कोसे/लू को दौड़ाते।

रास्ते में सांड/ट्रैफिक सत्यानाश/मर्जी चलाते।

     सब्जी और फलों ने ‘धूप का स्वाद’ में 28 अद्भुत रंग बिखेरे हैं। एक ओर पक्षी और पौधे के विशेष खेल को  चित्रित किया गया है तो दूसरी ओर सब्जियों को रहस्यमयी भी बताया गया है।

मक्के के खेत/ खो-खो खेलते तोते/ प्रेम पकता।

पत्तों में पत्ते/ जाने क्या छिपाती हैं?/ गोभी-पत्तियाँ।

    ‘ठुमकती बूँदों’ ने 35 हाइकु के जरिये कई जीवनदायिनी रूप का प्रदर्शन किया है।

शिला जी उठी/ घास मुकुट शोभे/ वर्षा मुस्काती।

     ‘धुंध की माया’ में 42 मायावी हाइकु ठंड और धुंधलापन समेटे नटखट भी हुए हैं। साथ ही धुंध को एक कुशल खिलाड़ी के रूप में देखने की क्षमता हाइकुकार की कल्पनाशीलता को अलग ऊँचाई प्रदान कर रहा है।

बुझी-अँगीठी/पूस काटके भागी/ ठंडी चिकोटी।

धूप का स्पिन/ओस वाली पिच में/धुंध का छक्का।

     ‘लू का चाबुक’ के 49 हाइकु बरबस ही लू के प्रचंड रूप से चाबुक जैसी चोट महसूस करवाने में सफल हैं।

लू महारानी/ गश्त पर निकली/ फैला सन्नाटा।

भैंस बेफ़िक्र/तालाब में बैठक/धूप भी हारी।

     वर्तमान समय की प्रदूषण समस्या को ‘प्रदूषण का दर्द’ के 35 हाइकु में बखूबी समेटा गया है।

डंप ग्राउंड/धुआँ घेरे शहर/मास्क बिकते।

पेड़ जो कटे/कटे कटे हैं लोग/भीड़-अकेली।

पेड़ है तो सृष्टि है, पेड़ है तो जीवन है। यह सब ‘पेड़ की बातें’ शीर्षक के 35 हाइकु कह रहे।

शुल्क ना माँगे/ रास्ते के बड़े पेड़/ मुफ़्त विश्राम।

पेड़ की छाँव/रोटी प्याज का लंच/सुस्ताते बैल।

     जीवन पथ पर स्मृतियों का विशेष स्थान है। ये स्मृतियाँ प्रेम की हों तो और सुखद हो जाती हैं।  ‘प्रेमनगर की 56 स्मृतियाँ’ प्रेम की गहराई को समझाने में सफल हैं।

डाब में स्ट्रॉ-दो/ लहरें मचली हैं/प्यार का ‘बीच’।

प्रतीक्षा बैठी/ यादों के दालान में/रंगोली डाले।

     ‘घर संसार की बातें’, 77 हाइकु में हजारों बातों के साथ भ्रमित युवा वर्ग की बातें भी लेकर आई हैं।

बच्चे बनाते/लालटेन का चित्र/ झूमर नीचे।

नए युग में/बटोही भटके हैं/लिव इन में।

    ‘त्योहार की खुशियाँ’, 42 में  28 हाइकु होली को समर्पित है। बाकी में रक्षाबंधन, कुम्भ एवं करवाचौथ पर आधारित हैं। ‘सच-झूठ की माया’ में सभी 21 हाइकु जीवन के सुख-दुःख, उतार- चढ़ाव, सच-झूठ पर आधारित प्रभावपूर्ण हैं।

झूठ का मेला/सच,बचके लौटा/‘एंटीक पीस।

     ‘युद्ध और भूख’ के 35 हाइकु युद्ध की विभीषिका, युद्ध से हानि, भूख के रंग पर आधारित हैं।

लाश किसकी/जीत की या हार की/दावा गायब।

भूखे किसान/खेतों में उगे मुद्दे/नारे चीखते।

     ‘आजकल की चर्चा’ के 70 हाइकु में वर्तमान समाज के विचारणीय मुद्दों को उठाया गया है।

लोकतंत्र जी/रिसॉर्ट में रहते/‘हॉर्स ट्रेंडिंग’।

चीखती नारी/मर्द का पशु जिंदा/‘न्यूज़’ भी ‘न्यूड’।

तोतली आँखे/माँ को ढूँढती फिरे/रोती ‘मर्चुरी’।

    रमेश सोनी जी ने अपने हाइकु में अंग्रेज़ी शब्दों का प्रयोग करके हाइकु विधा के लिये नया रास्ता खोला है। अंग्रेज़ी मिश्रित हिन्दी के आधुनिक प्रचलन में ये पाठकों द्वारा पसन्द किया जाएगा। रमेश सोनी जी आगे भी हाइकु जगत को समृद्ध करते रहें, इसके लिए हार्दिक शुभकामनाएँ!

ऋता शेखर ‘मधु’

बंगलुरू 

…..

‘अक्षरलीला’ हाइकु संग्रह- रमेश कुमार सोनी

भूमिका-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

ISBN:978-93-6423-264-7

पृष्ठ संख्या - 111, मूल्य - 340/-₹

अयन प्रकाशन-नई दिल्ली

…..

हाइकु समीक्षा


भाषाएँ पृथक भाव एक

     हिंदी हाइकु अब अपने अनुवाद के दौर में प्रवेश कर चुकी है। हिंदी साहित्य इसके द्वारा अंग्रेजी और अन्य स्थानीय भाषा एवं बोली के आँगन में इठलाने लगी है। यूँ कह लें कि हाइकु को सभी का प्यार और सम्मान मिल रहा है। हाइकु में इससे पूर्व भी अनुवाद हुए हैं। अनुवाद एक कठिन विधा है जिसमें स्चना की मौलिकता, भाव और आत्मा को सुरक्षित रखते हुए अपनी भाषा में प्रस्तुत करना होता है। 

     “रामधारी सिंह दिनकर" पुरस्कार से सम्मानित हाइकुकार डॉ० सुरंगमा यादव-लखनऊ की हाइकु कृतियों- ‘यादों के पंछी’, ‘भाव प्रकोष्ठ’ और ‘गाएगी सदी’ के चुनिंदा हाइकु का मराठी अनुवाद,  तुकाराम पुंडलिक खिल्लारे- महाराष्ट्र ने किया है जो ‘सुनो आकाश (ऐक रे नभा)’ के नाम से प्रकाशित हुआ है। 

    अनुवाद के लिए अनुवादक दोनों भाषाओं में निपुण होना हैं जो उसके अनुवाद में प्रतिबिंबित होता है; साथ ही  इस विधा में भी आपका पूरा अधिकार है। इस संग्रह का देवनागरी का देवनागरी लिपि (मराठी भाषा) में भावानुवाद हुआ है अतः पढ़ने/समझने में ज्यादा दिक्कत नहीं है। 

     इस संग्रह में श्रमसाध्य के साथ अनुशासन का सौंदर्य देखने को मिला। इस काव्यात्मकता के साथ कह सकता हूँ कि इन अनुदित हाइकु का यहाँ पुनर्जन्म हुआ है। सुरंगमा जी के तीनों हाइकु-संग्रह की समीक्षा मैंने की है जो सोशल मीडिया में पढ़ने हेतु उपलब्ध है। तुकाराम पुंडलिक जी मराठी हाइकु के पर्याय बन गए हैं आपका एक हाइकु-संग्रह मराठी में प्रकाशित हो चुका है। हाइकु में चूँकि तीन पंक्ति और 17 वर्ण का पालन करना होता है इसलिए इसका भावानुवाद ही हुआ है। 

     ‘गाएगी सदी’ के अंतर्गत इन हाइकु और उसके अनुवाद पर दृष्ट होने से इसमें अन्तर्निहित भाव निखरकर आता है। 

इसमें से कुल 163 हाइकु का अनुवाद किया गया है। इस हाइकु में पूर्णिमा के चाँद के सौंदर्य को उसके फोटो खिंचाते हुए ‘क्लोजअप’ रूप को रेखांकित किया गया है। चाँद अपने आप में सलोना है और पूर्णिमा का चाँद जिसका जादू हमेशा से रहा है। 

पूनो को देख/दे रहा क्लोजअप/चाँद सलोना। 

चंद्र सुंदर/क्लोजअप देतोय/पूनव राती।(3)

     इस हाइकु का यहाँ गहरा अर्थ है- एक कि व्यक्ति जो माटी का बना है वह नहा धोकर दिवाली मनाने चला है यह उसके तन की शुद्धि को इंगित करता है।  वहीं दूसरी ओर माटी के दीप को रोशन करने से पहले पानी मे भिगोया जाता है। इस तरह वे नहा के दिवाली मनाने चले हैं। आध्यात्मिक और शाब्दिक अर्थ लिए यह हाइकु अद्भुत है। 

नहा के चले/दीपोत्सव मनाने/माटी के दिए।

दिवे मातीचे/दिवाळी पूजेसाठी/सुस्नात आले।(10)

      जीवन, चार दिन का मेला कहा गया है लेकिन इस चार दिन में जीवन का अर्थ समझ नहीं आता। जीवन के सार को इस हाइकु में ढाला गया है। 

जीवन क्या है?/उड़ी-चढ़ी, लो कटी/गिरी पतंग।

जीवन काय?/उडे-चढे, नि कटे/पडे पतंग।(21)

     काले मेघ जब प्यासी धरती पर वर्षा करते हैं तो प्रतीक्षारत बीज हरिया जाते हैं इसे ही हाइकुकार ने हरित कथा लेखन कहा है। 

मेघ लिखता/धरा के आँचल पे/हरित कथा।

लिहितो मेघ/भूच्या पदरावर/कथा हिरवी।(100)

    कंक्रीट के वन में एवं पर्यावरण प्रदूषण से उपजी समस्या में प्रमुख है-छाँव का ना होना जो परिंदों के घोसले के लिए मुश्किलें खड़ी करता है। इस हाइकु में परिंदे बेजान खम्भों से छाँव का पता पूछ रहे हैं। 

खंभे से पूछे/हाँफता हुआ पंछी/छाँव का पता।

पूसे खांब्याला/दमलेले पाखरू/पत्ता छायेचा।(112) 

     केरल के पाठ्यक्रम में शामिल आपका यह हाइकु वर्तमान के भ्रष्टाचार और लालफीताशाही को इंगित करता है। साहब के बंगले के आँगन को सूखा या बाढ़ प्रभावित नहीं कर पाता केवल सुख की फुहारें ही वहाँ होती हैं। प्रतिकूलता में अनुकूलता का यह अच्छा उदाहरण है। 

सूखा या बाढ़/साहब के आँगन/सदा फुहार। *

दुर्भिक्ष्य-पूर/साहेबांच्या अंगणी/सदा तुषार।(141)

     ‘भाव प्रकोष्ठ’ आपका दूसरा हाइकु-संग्रह है। इसमें से कुल 127 हाइकु का अनुवाद किया गया है। इस हाइकु के द्वारा हाइकुकार ने आधुनिक समय की तुलना त्रेता काल से की है जब छल-प्रपंच में राक्षस प्रबल थे और रूप बदलकर छलते थे। अभी के दौर में भी राक्षसी प्रवृत्ति हावी है उस समय एक मारीच स्वर्णमृग बनकर छला था आज की सीता को छलने कई मारीच घूम रहे हैं।

सचेत सीते !/कितने ही मारीच/आज घूमते।

सावध सीते ! /कितीतरी मारीच/आज फिरती।(2)

      मानव मन एक महाकाव्य की भाँति है इसका कोई ओर-छोर नहीं है। मन, इस प्रतीक्षा में है कि इसके महाकाव्य को कोई समझ ले तात्पर्य इसमें वर्णित सुख-दुःख में साथ हो, प्रेम-करुणा की भाषा कोई समझे। 

करूँ प्रतीक्षा/ये मन-महाकाव्य/बाँचे तो कोई।

मी प्रतीक्षेत/मनाचे महाकाव्य/वाचा ना कुणी !(38)

     आधुनिक समय में एकल होते परिवारों में यद्यपि रिश्तों की अहमियत नहीं है इसका प्रमुख कारण है-रिश्तों में अपेक्षाओं को कर्तव्य और त्याग के स्थान पर प्रमुख मानना। यह हाइकु ऐसा भाव लिए हुए है-

स्वार्थ बिछौना/बेसुध पड़े रिश्ते?साँसें गिनते।

नाते बेशुद्ध/स्वार्थाच्या अंथरुणी/श्वास मोजत।(72)

     इस हाइकु में प्यास के दो अर्थ हैं । एक जो आत्मा और परमात्मा का है और दूसरा शाब्दिक जिसमें ग्रीष्म से प्यासी तड़पती चिड़िया जो मेघ से वर्षा की गुहार लगा रही है। 

मेघ चिरौरी/करे प्यासी चिरैया-/'भरो तलैया!'

तृषित चिऊ/मेघाला लागे भांडू-/'भर तलाव'।(90)

     ‘यादों के पंछी’ खंड से कुल 60 हाइकु का अनुवाद किया गया है। यहाँ निशा का मानवीयकरण सुंदरता के साथ हुआ है जिसे प्रकृति चित्रण के साथ संयुक्त किया हुआ है। रात्रि, आकाश और उसके केश के झरने से ओस बनने का दृश्य अद्भुत है। 

निशा सुखाती/नभ में गीले केश/झरती ओस।

रात्र सुकवी/नभात केस ओले/दंव ओघळे।(10)

      इस हाइकु में भी प्रकृति का मानवीकरण है। गेहूँ की पकी बालियों को कोहरे के झूले में हवा का झुलाना सुंदर दृश्य है। 

गेहूँ की बाली/कुहरे का पलना/झुलाती हवा।

गव्हाची लोंबी/धुक्याच्या पाळण्यात/झुलवी हवा।(21)

     ‘विविध’ खण्ड में कुल 14 हाइकु का अनुवाद किया गया है। यहाँ भी मानवीयकरण निखरकर प्रस्तुत हुआ है। वसंत ऋतु वैसे भी बहारों का मौसम होता है तब पूरी प्रकृति यौवन पर होती है। इसकी तुलना वर्तमान के ब्यूटी पार्लर से करना नवीन बिम्ब है। 

निखर उठी/वसंत पार्लर में/प्रकृति सखी।

उजळ झाली/पार्लरी वसंताच्या/निसर्ग सखी।(13)

     हाइकु के इस अनुवाद संग्रह के माध्यम से दो भाषाओं  की खाई कम हुई है और मराठी एवं हाइकु साहित्य समृद्ध हुआ है। जितने शिद्दत से हाइकु रचा गया है उतनी ही शिद्दत से भावानुवाद किया गया है। भाषा परिवर्तन की व्यापक चुनौतियों से बखूबी जूझा गया है। मराठी में हाइकु पढ़ना नई अनुभूति देता है। आप द्वय का कार्य साहित्यिक क्षेत्र में मील का पत्थर है। आप दोनों को मेरी शुभेच्छा।  


रमेश कुमार सोनी, रायपुर, छत्तीसगढ़ 

…..

सुनो आकाश (ऐक रे नभा) (मराठी में अनूदित हाइकु -संग्रह)

रचनाकार-डॉ. सुरंगमा यादव, अनुवाद-तुकाराम पुंडलिक खिल्लारे, परभणी, शुभकामनाएँ-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ 

अयन प्रकाशन-दिल्ली, 2026

ISBN:978-93-6423-466-4

मूल्य-320/-₹,  पृष्ठ-104

……


हाइकु बचपन के


1

समुद्र लीले

नन्हे घरौंदे डरे

माँ से लिपटे। 

2

पोता जो आया

बूढ़ा आँगन हँसा

मासूम बातें। 

3

बच्चों की भाषा

बर्तन भी खिलौना 

माता तू धन्य। 

4

खेल पुकारे

बेफ़िक्री के मैदान

किल्लोल मचा। 

5

क्रेयॉन रंग

कैनवास बच्चों का 

हँसी दीवार। 

6

झूला ना थका

बच्चे झुलाते हुए

माँ सा है मन। 

7

खट्टी इमली 

बचपन बुलाती

मासूम बातें। 

8

बच्चों के प्रश्न 

माता ही सुलझाती

विज्ञानी फेल। 

9

कच्ची अमिया

बच्चे बीनने दौड़े

आँधी के बाद।

10

चोंच में तृण

बड़ा सपना थामे

युवा पखेरु।

11

आज जो लड़े

कल साथ खेलते

बच्चों का खेल। 

12

बच्चों की भूख 

मनुहार थकता

माता ना थकी। 

13

बच्चों की ज़िद 

पिता पूरी करते

डाँट के बाद। 

14

भरा टिफ़िन 

माँ बिन कैसे खाता

स्कूल से लौटा। 

15

छुट्टियाँ ख़त्म

लौटा खिलौने वाला

घर अपने। 

16

नन्ही मुस्कान

गुल्लक सी खनके

छुट्टी में घर। 

…..

रमेश कुमार सोनी

रायपुर, छत्तीसगढ़



हाइकु


1

रिश्ते टूटते

घर बिखर जाता

बोला-बोली में। 

2

गाँव का घर

इसका न उसका

रिश्ता सबका।  

3

घर डरता

रिश्तों की जीभ लंबी

पड़ोसी-कान। 

4

लोग कमाते

सात पुश्तों का धन

रिश्ते किनारे। 

5

घड़ी सबकी

अलग ब्राण्ड वाली

वक्त भी वैसा!

6

बाजार जैसे 

रिश्तों में शर्तें लागू

रोज बदले।

7

शहरी रास्ते

पूछपरख गुम

मोल-भाव है। 

8

एकल घर

रिश्तों का सूनापन

क्लब आबाद। 

9

मन्नती धागे

घर बचाने बँधे

मौका-बेमौका। 

10

रिश्तों में एका

फले-फूले, महके

ताड़ अकेला। 

11

रिश्तों से घर

हवेली भूतहा है

कुत्ते भौंकते। 

12

रिश्तों की माला

घर-प्यार से गूँथे

रोज महके। 

13

तौल लीजिए 

रिश्तों का वजन भी

कर्ज़ माँग लें।।

14

घर जानता

सुख-दुख का आँसू

बाँट भी लेता। 

15

खुशी का पता

हवेली या कुटीर

पूछे डाकिया। 

16

खर्च होना है

जिंदगी भी पैसों सी

लोग कमा लें। 

…..

रमेश कुमार सोनी

‘अक्षरलीला’ 

रायपुर, छत्तीसगढ़




अँजोर

अँजोर 


दीप पंक्तियाँ सजग है

अँधेरों को भगाने की सीख, सीखते 

किसी मजदूर के जैसे कर्मरत 

अँजोर बगराने की जिद लिए

तो कभी ये बन जाते हैं-

सीमा पर सैनिकों से 

हर धमाकों से बेख़ौफ़ 

रोशनी की रक्षा में 

जीवन की आहुति देने। 


दीप जल रहे हैं

झोपड़ी को रोजगार,

महलों को सुकून, 

युवाओं को मंजिल,

महिलाओं को निडर और 

देश को सामर्थ्य देने की आस में

एक सिपाही की तरह। 


जाग रहा हूँ मैं 

हर दीपक को साथ देने

दोनों हथेलियों से इसे बचाते हुए,

पटाखों की धमाकों से 

काँपते लौ को ढाँढस देते हुए,

रंगोलियों की रंगों से 

इसमें उत्साह भरते हुए 

दीप जागृत हैं-

महालक्ष्मी की प्रतीक्षा में।


मैं आपके साथ 

एक दीप बारना चाहता हूँ

तमाम प्रदूषणों के खिलाफ,

अन्याय,अत्याचारों के खिलाफ,

अनाम शहीदों के नाम, 

अपनी प्राकृतिक संसाधनों को बचाने और 

अपने उन पूर्वजों के नाम 

जिसने हमें ये दुनिया दी

आइए इस दीवाली हम

संकल्प का एक दीप रोशन करें। 


मैंने एक दीप जला रखा है

अपने मन के मुंडेर पर 

हर किसी के अँजोर के लिए,

आओ दो कदम हम भी साथ चल लें

दीप की रोशनी के साथ 

आओ हम भी उजास की खुशी में

सूर्य बनकर उगें और

अपने रिश्तों को अँजोर करें

आओ हम भी दिवाली मनाएँ। 

…..

रमेश कुमार सोनी

रायपुर, छत्तीसगढ़



हिन्दी हाइकु-संग्रह, अक्षरलीला

अक्षरलीला— लघु छंद में विराट अनुभूति

     साहित्यकार रमेश कुमार सोनी की लेखनी ने छत्तीसगढ़ी व हिंदी में लेखन के क्षेत्र में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। रोली अक्षत (2004) तथा पेड़ बुलाते मेघ (2018) के बाद उनका तीसरा हाइकु संग्रह- ‘अक्षरलीला’ मेरे हाथ में है।

      रमेश कुमार सोनी हिंदी और छत्तीसगढ़ी भाषा में हाइकु, ताँका, सेदोका छंद को लोकप्रिय बनाने में अग्रणी रहे हैं। हिंदी हाइकु को पारंपरिक ढाँचे से बाहर निकालकर उसे छत्तीसगढ़ी भाषा और लोकसंस्कृति से जोड़ने वाले वे पहले रचनाकार हैं। ‘गुरतुर मया’ उनका छत्तीसगढ़ी हाइकु संग्रह है। उनकी कविताएँ जीवन, प्रकृति, समाज, पर्यावरण जैसे मुद्दों पर संवेदना व्यक्त करती हैं।

     रमेश कुमार सोनी की रचनाओं में लघु छंदों के माध्यम से प्रकृति और समाज के साथ ही पारंपरिक और लोकभाषा संगम की अनूठी भूमिका देखने को मिलती है। वे भाषा और शैली में नवाचार लाते हुए विविध भावनात्मक पक्षों को हाइकु की मर्यादा में समेटने में सक्षम रहे हैं। 

     14 उपशीर्षकों में विभाजित 'अक्षरलीलालघु छंद में विराट अनुभूति का संग्रह है। सोनी जी का अनुभव संसार कितना व्यापक है, प्रतिष्ठित साहित्यकार रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ की सूक्ष्म अंतर्दृष्टि से पता चलता है।

     रमेश कुमार सोनी का हाइकु संग्रह ‘अक्षरलीला’ विषयवस्तु की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध और विविधता से भरा हुआ है। इस संग्रह में जीवन के अनेक रूपों की सूक्ष्म झलकियाँ है, जो तीन पंक्तियों में हाइकुकार के पूरे अनुभव संसार को समेटने की कला को दर्शाती हैं। लेखक ने गाँव की सादगी और शहर की चहल-पहल, दोनों को संवेदनशील दृष्टि से देखा है—कहीं खेत की हरियाली है, तो कहीं शहरी भीड़ में खोती संवेदना।

     प्रकृति, ऋतुएँ, पेड़-पौधे, पक्षी, बारिश, धूप—इन सबको हाइकु के माध्यम से चित्रित करते हुए, सोनी जीवन के हर उस क्षण को पकड़ते हैं जो अक्सर हमारी व्यस्तता में अनदेखा रह जाता है। उनके हाइकु में मौसम की करवटें सिर्फ जलवायु परिवर्तन नहीं, बल्कि मन की अवस्था का रूप भी बन जाती हैं।

     इन हाइकुओं में जीवन के छोटे-छोटे दृश्य हैं—चूल्हे की आँच, नदी के किनारे की चुप्पी, स्कूली बच्चों की आवाज़, पतझड़ में झरते पत्तों की साँसें—जो पाठक को सीधे अनुभव के केंद्र में ले जाते हैं। ‘अक्षरलीला’ के हाइकु सिर्फ पढ़े नहीं जाते, वे महसूस किए जाते हैं।

     इनकी विशेषता यह है कि हर हाइकु एक चित्र है। वह चित्र जीवन की एक पूरी कथा को अपने भीतर समेटे होता है। गाँव से शहर, ऋतु से मनोदशा, और प्रकृति से आत्मा तक की यह यात्रा,अक्षरलीला’ को केवल एक हाइकु संग्रह नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन की लघु लेखनी बना देती है।

भोर का मौन/ पाखी ने मंत्र पढ़ा/ दुनिया जागी (1)

     पहला हाइकु ही प्रकृति के माध्यम से प्रात:कालीन जागरण की एक सूक्ष्म, भावपूर्ण छवि रचता है। पहली पंक्ति एक शांत क्षण की स्थापना करती है। भोर का मौन चेतना के जागरण से ठीक पहले का ठहराव है—जहाँ सारा जगत अभी नींद और जागरण के संधि-काल में है। यह मौन बहुत कुछ कहता है। यहाँ ‘पाखी’ प्रकृति का पहला पुजारी बन जाता है। उसकी चहचहाहट को कवि ने “मंत्र” कहा है, जिससे पक्षी का स्वर एक पवित्र, जाग्रत करने वाला अनुष्ठान बन जाता है। अंतिम पंक्ति में क्रिया और परिणाम आता है। पक्षी के मंत्र की गूँज से दुनिया जागती है। यह संवेदना और चेतना के स्तर पर भी एक जागरण है।

     यह हाइकु प्रकृति और मानव जीवन के अंतर्संबंध को अत्यंत सूक्ष्म, सौंदर्यपूर्ण और प्रतीकात्मक ढंग से प्रस्तुत करता है। तीन पंक्तियों में एक पूरा दृश्य, एक चेतना और एक संदेश समाहित है। यह कविता पाठक को न केवल सुबह का दृश्य दिखाती है, बल्कि उसे भीतर से जागृत भी करती है।

खेत गा उठे/ बैलों की घंटी संग/ किसान— राग। (5)     

     खेत गा उठे यह मानवीकरण है, जिससे खेत मानो किसान के श्रम के साथ स्वयं संगीत रचने लगते हैं। यहाँ ध्वनि का बिंब अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। बैलों के गले में बँधी घंटियाँ केवल संगीत का स्रोत नहीं, बल्कि श्रम के आरंभ की पुकार हैं। यह ध्वनि परिश्रम की पहचान है, एक लोक-ध्वनि, जो केवल कानों में नहीं, मन में गूँजती है। यह खेत, बैल और किसान के बीच की त्रयी को जोड़ती है।

     तीसरी पंक्ति इस हाइकु को एक संगीतात्मक और सांस्कृतिक ऊँचाई पर ले जाती है। ‘किसान-राग’ कोई स्थापित शास्त्रीय राग नहीं, बल्कि किसान के श्रम, पसीने, संघर्ष और आशा का राग है। यह राग प्रकृति से उपजता है—जिसमें मिट्टी की सोंधी गंध, बैलों की चाल, और मानवीय श्रम की तपिश शामिल है।

     रमेश कुमार सोनी ने अपने संग्रह में नवीन प्रयोग भी किए हैं—

शेखी बघारे/ काँटों बीच गुलाब/ जेड प्लस में। (53)

 काँटों के बीच गुलाब ऐसा है, जैसे उसे जेड प्लस सुरक्षा मिली है। 

तितली उड़ी/ ग्लोबल सिटीजन/ प्रकृति जाने। (81)

 तितली को कवि ने ग्लोबल सिटीजन कहा है।

कवि ने मृगी को ट्रेनर माना है—

छौने उछले/ मृगी चौकस खड़ी/ ट्रेनर अच्छी। (7)

 कवि ने बाज को पैराग्लाइड करते देखा है—

नभ में बाज/ पैराग्लाइड करे/ योग में मग्न। (18)

 दर्पण के सामने गौरैया का बच्चों सा ठुमकने का दृश्य मनभावन है—

दर्पण देख/ गौरैया ठुमकती/ बच्चों के जैसी। (46)

 आज के युग की भयावह तस्वीर दिखाता यह हाइकु है— 

फ्रिज सहमा/ चालीस टुकड़ों का/ गवाह बना। (70)

     सोनी के इस हाइकु संग्रह के सभी हाइकु भाव भाषा से समृद्ध हाइकु हैं। जीवन, समाज, प्रकृति का कोई भी रंग उनकी लेखनी से छूटा नहीं है। आशा है पाठक को यह संग्रह पसंद आएगा।

रश्मि विभा त्रिपाठी

…..

अक्षरलीला (हाइकु-संग्रह): रमेश कुमार सोनी, पृष्ठ: 112, मूल्य: 340 रुपये, ISBN: 978-93-6423-264-7, प्रथम संस्करण: 2025, प्रकाशक: अयन प्रकाशन, जे- 19/39, राजापुरी, उत्तम नगर, नई दिल्ली— 110059

हाइकु संग्रह-अक्षरलीला

       हिन्दी में मेरा तीसरा हाइकु संग्रह- 'अक्षरलीला' प्रकाशित हुआ। आप सभी पढ़िएगा। भूमिका- श्री रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' जी (वरिष्ठ हाइकुकार) ने लिखा है। प्रकाशन-अयन प्रकाशन, दिल्ली-2025. 

अनुक्रम इस तरह से है-

रमेश कुमार सोनी
रायपुर