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अक्षरलीला

‘अक्षरलीला’- जग की लीलाओं को समेटते सत्रह अक्षर

 ऋता शेखर ‘मधु’

     ‘अक्षरलीला’ रमेश कुमार सोनी का सद्य प्रकाशित हाइकु संग्रह है। हाइकु जगत में रमेश कुमार सोनी जी का स्थान उल्लेखनीय है। विविध विषयों पर हाइकु लिखना उनकी क्रियाशीलता एवं अनुभव के वृहद संसार का परिचायक है। क्षण विशेष को सत्रह वर्णों में समाहित करके दृश्यमान कर देना हाइकुकार की विशेषता होती है। पूर्व में दो हाइकु-संग्रह प्रकाशित करवाने के बाद यही विशेषता तीसरे हाइकु-संग्रह ‘अक्षरलीला’ में पाठकों के समक्ष आयी है। सर्वप्रथम  पुस्तक का नाम  ही आकर्षित करने वाला है। अक्षरों की लीला कभी रामलीला, कभी कृष्णलीला की तरह मनोहारी दृश्य उत्पन्न करती हैं और कभी प्रकृतिलीला की तरह आक्रामक भी हो सकती हैं। पुस्तक हार्डकवर के साथ सुसज्जित है। पृष्ठों की गुणवत्ता बहुत अच्छी है। 


     पुस्तक माता-पिता को श्रद्धापूर्वक समर्पित की गई है। हाइकु को चौदह विषयों में विभाजित किया गया है। पुस्तक को जाने-माने वरिष्ठ हाइकुकार रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ जी का आशीर्वचन प्राप्त है। पुस्तक में 14 विषय लिए गए हैं जिनमें प्रकृति, जीवन दर्शन एवं सामाजिक रिश्ते शामिल हैं।

     ‘पाखी की सरगम’ विषय में कुल 84 हाइकु में जहाँ अपने गाँव की मिट्टी पर गर्व प्रदशित किया गया है वहीं सेमल बीज की यात्रा एक दृश्य उत्पन्न करती है जो बचपन में कुतूहल का विषय हुआ करता था। समाज में कम कपड़ों से बने आधुनिक परिधान को लक्ष्य करके लिखा गया हाइकु विचारणीय है।

गुरूर देती/ चंदन जैसी शोभा/ गाँव की मिट्टी।

सेमल बीज/ हवाई यात्रा करे/ पैराशूट में।

तन ढकने/ नोची गयी कपास/ तन उघरे।

     पशु-पक्षी-कीटों को आधार बनाकर रचे गए 56 हाइकु ‘खरगोश फुदके’ विषय में सम्मिलित हैं। अत्यधिक गर्मी से मनुष्य या अन्य जीव भले भी परेशान होते हों मगर ऊँट को वही गर्मी भली लगती है। मौसम की विविधता का प्रभाव सभी के लिए एक जैसे हों, यह आवश्यक नहीं। चौपायों से सड़कों पर जो अफरातफरी होती है उसपर भी सटीक हाइकु का सृजन हुआ है।

तपती रेत/ऊँट-गर्मी न कोसे/लू को दौड़ाते।

रास्ते में सांड/ट्रैफिक सत्यानाश/मर्जी चलाते।

     सब्जी और फलों ने ‘धूप का स्वाद’ में 28 अद्भुत रंग बिखेरे हैं। एक ओर पक्षी और पौधे के विशेष खेल को  चित्रित किया गया है तो दूसरी ओर सब्जियों को रहस्यमयी भी बताया गया है।

मक्के के खेत/ खो-खो खेलते तोते/ प्रेम पकता।

पत्तों में पत्ते/ जाने क्या छिपाती हैं?/ गोभी-पत्तियाँ।

    ‘ठुमकती बूँदों’ ने 35 हाइकु के जरिये कई जीवनदायिनी रूप का प्रदर्शन किया है।

शिला जी उठी/ घास मुकुट शोभे/ वर्षा मुस्काती।

     ‘धुंध की माया’ में 42 मायावी हाइकु ठंड और धुंधलापन समेटे नटखट भी हुए हैं। साथ ही धुंध को एक कुशल खिलाड़ी के रूप में देखने की क्षमता हाइकुकार की कल्पनाशीलता को अलग ऊँचाई प्रदान कर रहा है।

बुझी-अँगीठी/पूस काटके भागी/ ठंडी चिकोटी।

धूप का स्पिन/ओस वाली पिच में/धुंध का छक्का।

     ‘लू का चाबुक’ के 49 हाइकु बरबस ही लू के प्रचंड रूप से चाबुक जैसी चोट महसूस करवाने में सफल हैं।

लू महारानी/ गश्त पर निकली/ फैला सन्नाटा।

भैंस बेफ़िक्र/तालाब में बैठक/धूप भी हारी।

     वर्तमान समय की प्रदूषण समस्या को ‘प्रदूषण का दर्द’ के 35 हाइकु में बखूबी समेटा गया है।

डंप ग्राउंड/धुआँ घेरे शहर/मास्क बिकते।

पेड़ जो कटे/कटे कटे हैं लोग/भीड़-अकेली।

पेड़ है तो सृष्टि है, पेड़ है तो जीवन है। यह सब ‘पेड़ की बातें’ शीर्षक के 35 हाइकु कह रहे।

शुल्क ना माँगे/ रास्ते के बड़े पेड़/ मुफ़्त विश्राम।

पेड़ की छाँव/रोटी प्याज का लंच/सुस्ताते बैल।

     जीवन पथ पर स्मृतियों का विशेष स्थान है। ये स्मृतियाँ प्रेम की हों तो और सुखद हो जाती हैं।  ‘प्रेमनगर की 56 स्मृतियाँ’ प्रेम की गहराई को समझाने में सफल हैं।

डाब में स्ट्रॉ-दो/ लहरें मचली हैं/प्यार का ‘बीच’।

प्रतीक्षा बैठी/ यादों के दालान में/रंगोली डाले।

     ‘घर संसार की बातें’, 77 हाइकु में हजारों बातों के साथ भ्रमित युवा वर्ग की बातें भी लेकर आई हैं।

बच्चे बनाते/लालटेन का चित्र/ झूमर नीचे।

नए युग में/बटोही भटके हैं/लिव इन में।

    ‘त्योहार की खुशियाँ’, 42 में  28 हाइकु होली को समर्पित है। बाकी में रक्षाबंधन, कुम्भ एवं करवाचौथ पर आधारित हैं। ‘सच-झूठ की माया’ में सभी 21 हाइकु जीवन के सुख-दुःख, उतार- चढ़ाव, सच-झूठ पर आधारित प्रभावपूर्ण हैं।

झूठ का मेला/सच,बचके लौटा/‘एंटीक पीस।

     ‘युद्ध और भूख’ के 35 हाइकु युद्ध की विभीषिका, युद्ध से हानि, भूख के रंग पर आधारित हैं।

लाश किसकी/जीत की या हार की/दावा गायब।

भूखे किसान/खेतों में उगे मुद्दे/नारे चीखते।

     ‘आजकल की चर्चा’ के 70 हाइकु में वर्तमान समाज के विचारणीय मुद्दों को उठाया गया है।

लोकतंत्र जी/रिसॉर्ट में रहते/‘हॉर्स ट्रेंडिंग’।

चीखती नारी/मर्द का पशु जिंदा/‘न्यूज़’ भी ‘न्यूड’।

तोतली आँखे/माँ को ढूँढती फिरे/रोती ‘मर्चुरी’।

    रमेश सोनी जी ने अपने हाइकु में अंग्रेज़ी शब्दों का प्रयोग करके हाइकु विधा के लिये नया रास्ता खोला है। अंग्रेज़ी मिश्रित हिन्दी के आधुनिक प्रचलन में ये पाठकों द्वारा पसन्द किया जाएगा। रमेश सोनी जी आगे भी हाइकु जगत को समृद्ध करते रहें, इसके लिए हार्दिक शुभकामनाएँ!

ऋता शेखर ‘मधु’

बंगलुरू 

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‘अक्षरलीला’ हाइकु संग्रह- रमेश कुमार सोनी

भूमिका-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

ISBN:978-93-6423-264-7

पृष्ठ संख्या - 111, मूल्य - 340/-₹

अयन प्रकाशन-नई दिल्ली

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हाइकु-समीक्षा


      व्यापक जीवन अनुभवों की 'अक्षर लीला'

                       

         समीक्षक-डॉ. शिवजी श्रीवास्तव 

 


      'अक्षर लीला' श्री रमेश कुमार सोनी का नवीन हाइकु-संग्रह है, इसके पूर्व उनके दो हाइकु- संग्रह- 'रोली अक्षत' और 'पेड़ बुलाते मेघ' प्रकाश में आ चुके हैं। श्री सोनी हिंदी साहित्य की अनेक विधाओं में सृजनरत तो हैं ही साथ ही वे पर्यावरणविद भी हैं,पर्यावरण संरक्षण हेतु किए गए कार्यो के लिए उन्हें राज्य स्तर पर कई बार सम्मानित भी किया गया है। कवि स्वभावतः संवेदनशील होते हैं, प्रकृति के प्रति अनुराग भी व्यक्ति की संवेदना को सघन करता है,स्वाभाविक ही है कि श्री सोनी जी के हृदय में संवेदना एवं भावाकुलता  अत्यंत सघन है। भावों की यह सघनता उनकी रचनाओं में अनेक रूपों में देखी जा सकती है। उनके समस्त रचना-संसार में उनकी यह प्रवृत्ति  ही विविध रूपों में प्रतिबिम्बित  देखी जा सकती है, उनका यह नवीन हाइकु -संग्रह उसी भावाकुल प्रवृत्ति की एक कड़ी है। इस संग्रह के प्रारम्भ में प्रसिद्ध साहित्यकार श्री रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' जी द्वारा 'रमेश कुमार सोनी का अनुभव संसार' शीर्षक से लिखा हुआ परिचयात्मक आलेख संग्रह की विशिष्टता को सिद्ध करता है।

       'अक्षर लीला' के समस्त हाइकुओं को कवि ने चौदह शीर्षकों में विभाजित किया है। इनमें प्रकृति है, घर -परिवार हैं, तीज-त्यौहार हैं, समसामयिक समस्याएँ हैं और जीवन -जगत के दार्शनिक प्रश्न हैं।  प्रकृति के प्रति स्वाभाविक अनुराग संग्रह के  हाइकुओं में सहज रूप में अभिव्यक्त हुआ है।हाइकु अपनी प्रकृति से ही  प्रकृति की  कविता है अतः सोनी जी के हाइकुओं में उनके प्रकृति प्रेम को स्वाभाविक रूप से अभिव्यक्ति के अनेक अवसर मिले हैं।'अक्षर लीला' में प्रकृति अपने विविध रूपों के साथ उपस्थित है। हिंदी कविता में प्रकृति चित्रण के जितने रूप मिलते हैं सोनी जी के हाइकुओं में भी प्रकृति के लगभग समस्त रूप चित्रित हैं, उनमें प्रकृति का यथातथ्य चित्रण हैं, उसके अलंकारिक, उपदेशक और मानवीकरण-रूप भी विद्यमान हैं। रमेश सोनी जी प्रकृति के जिस रूप का चयन करते हैं,उसका अत्यंत सहज  बिम्ब उपस्थित करते हैं। उदाहरण के लिए नदी तट पर पेड़ के नीचे पानी पीते हुई एक चीते का एक स्वाभाविक चित्र दृष्टव्य है -

नदी का तट / पानी पी रहा चीता / पेड़ की छाँव।

       ठीक इसी प्रकार एक और सहज चित्र देखा जा सकता है -

झूमे सैलानी / बर्फबारी जो हुई /बाज़ार गर्म।

       यद्यपि प्रकृति के सहज और स्वाभाविक सौंदर्य को को कवि ने अनेक हाइकुओं में अत्यंत सहज रूप में चित्रित किया है, पर उसमें साथ-साथ वे आलंकारिकता और कलात्मकता का स्पर्श भी देते चले हैं। वर्षा का एक बिम्ब है, जब वर्षा की प्रथम फुहार धरा को भिगोती है तो मिट्टी से जो सोंधी महक उठती है उसे कवि ने विलक्षण उपमा प्रदान की है -

पहली वर्षा / खुली इत्र की शीशी / महकी मिट्टी।

     वर्षा होने पर इत्र की शीशी खुलने की उपमा सर्वथा अनूठी और मौलिक है, ऐसे और भी अनेक बिम्ब हैं जहाँ कवि ने प्रकृति के उपादानों को नवीन उपमाओं से सुसज्जित किया है, यथा -

तीखी है मिर्च / कौन सौतन तेरी?/ जलन बड़ी।

भोर का मौन/ पाखी ने मंत्र पढ़ा / दुनिया जागी।

सन्यासी वृक्ष/ पतझड़ की ऋतु / केश लुंचन। 

    तीखी मिर्च की सौतन ढूँढना, भोर में पक्षियों का मंत्र उच्चारण करना और पतझड़ की केश लुंचन से तुलनाएँ सर्वथा नवीन हैं । इस प्रकार की नवीन उपमाओ के लिए वे लोक जीवन में व्याप्त प्रतीकों को चुनते हैं जैसे पृथ्वी द्वारा मेघ -पत्रों को बाँचना और धुंध द्वारा धूप से नेग माँगना, ये लोक जीवन के प्रचलित उदाहरण हैं किन्तु इन्होने हाइकुओं में एक अद्भुत सौंदर्य की सृष्टि कर दी है।                     

मेघों का पत्र/ बाँचती रही पृथ्वी/हरित भाषा।

धूप के द्वारे/धुंध हठीली खड़ी/  नेग माँगती।

    प्रकृति के माध्यम से विविध मानवीय मनोभावों की अभिव्यक्ति भी सोनी जी के हाइकुओं में अत्यंत स्वाभाविक रूप में व्यक्त हुई हैं। यथा-

धूप ने चूमे /टमाटर के गाल/गुस्से में लाल।

 लू महारानी/ गश्त पर निकली / सन्नाटा फैला।

     विषयों की भाँति रमेश सोनी जी के हाइकुओं की भाषा में भी विविधता है,भाषा में व्यंजना है, प्रतीकात्मकता है आलंकारिकता है, इसके साथ ही लोक जीवन में प्रचलित अंग्रेजी शब्दों के प्रयोग हैं। इस वैविध्य ने संग्रह के हाइकुओं को जीवंत बनाते हुई लोक मन के निकट स्थित कर दिया है। मुहावरों और लोकोक्तियों के सार्थक प्रयोग भी उनकी भाषा में विद्यमान है। कुछ हाइकु दृष्टव्य हैं -

शेखी बघारे/काँटों बीच गुलाब/जेड प्लस में। 

पेड़ों के पंछी / ऑर्केस्ट्रा सुनाते हैं / भोर -साँझ में 

बेटी विदाई/साथ ले जाती घर /मकान बाकी।

धर्म जो लड़े /जातियाँ उग आयीं/सत्ता की भाषा।

मेघों का स्कूल/ बूंदो की पूरी छुट्टी/सावन हँसे।

गाँव के मेले/पीपल पंखा झेले/ खुश बटोही।

       कवि एक पर्यावरणविद भी है अतः स्वाभाविक रूप से पर्यावरण की चिंता भी उनके हाइकुओं में विद्यमान है। संग्रह के चौदह भागों में 'प्रदूषण का दर्द' शीर्षक से एक भाग है जिसमें पर्यावरण संबंधी हाइकु ही हैं। इसमें विकास के नाम पर कटते जंगल , बढ़ते पॉलीथिन के प्रयोग, पराली का जलना, पटाखों के प्रयोग इत्यादि से बढ़ते प्रदूषण की पीड़ा और चिंता साफ देखी जा सकती है-

वन जो कटे  / ग्लेशियर भी टूटे /धरा उबली।

वन डरते / विकास की कुल्हाड़ी / गर्दन काटे।

प्लास्टिक-कूड़ा / हरियाली निगले / धरा कूकर।

खतरे बड़े / पॉलीथिन कचरा /कभी न सड़े।

विकास पथ /यात्री को छाँव कहाँ /ठूँठ बाकी हैं।

    इन सब चिंताओं के मध्य कवि निराश नहीं है उसे नई पीढ़ी से उम्मीद है, उसे उम्मीद है कि बच्चे ही प्रकृति को बचाएँगे-

 धरती खुश/ बच्चे पौधा रोपते/उम्मीद जिन्दा। 

    पर्यावरण की चिंता के साथ ही अनेक सामाजिक /सांस्कृतिक चिंताओं से भी कवि मन व्याकुल है। वर्तमान में झूठ का साम्राज्य फल-फूल रहा है, सत्य एकाकी एवं उपेक्षित सा है इस तथ्य को कवि ने हाइकुओं में अत्यंत गंभीरता से चित्रित किया है 

सच संत सा / झूठ रंगीला बड़ा / चले तनके।

झूठ का मेला / सच, बचके लौटा / एंटीक पीस।

       युद्धों की विभीषिका भी वर्तमान का बड़ा अभिशाप है।युद्ध का परिणाम सदैव विनाशक ही होता है,युद्ध स्वयं में गूंगा-बहरा होता है वह किसी प्रश्न के उत्तर नहीं देता। आश्चर्य तो यह है कि युद्धों की आवश्यकता का कारण लोग शांति की स्थापना बताया करते हैं। मानवता के आधार स्तंभ विद्यालय, अस्पताल भी जब युद्ध में नष्ट होते हैं तो गम्भीर संकट उपस्थित होता है, इसके दुष्परिणामों को कोई नहीं बताता,ऐसी अनेक  चिंताओं के हाइकु भी संग्रह में विद्यमान हैं-

कसूर पूछे / स्कूल अस्पताल भी /युद्ध गूंगा है। 

लाशों के ढेर / शांति वार्ता बेमानी / जिंदगी हारी।

       इन सबके साथ ही घर -परिवार, रिश्ते नाते, मेले बाज़ार, सभी उनके हाइकु के विषय हैं। उदाहरण के लिए पिता और माँ के इन हाइकुओं में सहजता, आत्मीयता और परिवार के स्नेह के अत्यंत स्वाभाविक चरित्र को देखा जा सकता है।

 बच्चों की जिद / घोड़ा बनते पिता / घर चहके।

 माँ परोसती / भोजन संग प्यार / ढाबे में 'बिल'।

         प्रकृति से लेकर जीवन -जगत और घर -परिवार तक की दुनिया के जितने हाइकु 'अक्षर लीला' में संकलित है वे कोरी कल्पना की उपज नहीं है वे सभी हाइकु कवि के जीवन अनुभवो से निःसृत हैं, उनमें कल्पना उतनी ही है जितनी काव्य सौंदर्य हेतु अनिवार्य है। अतः यह कहना समीचीन होगा कि यह संग्रह कवि के अनुभव संसार की 'अक्षर लीला' है।

डॉ. शिवजी श्रीवास्तव-गौतम बुद्ध नगर, उ.प्र.

Email-   shivji.sri@gmail.com

Mobile-   9557518552

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हाइकु-संग्रह ‘अक्षर लीला’-रमेश कुमार सोनी 

भूमिका-रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

अयन प्रकाशन दिल्ली, संस्करण - प्रथम, 2025

पृष्ठ-112,मूल्य-340/-₹

ISBN: 978-93-6423-264-7

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हाइकु समीक्षा


भाषाएँ पृथक भाव एक

     हिंदी हाइकु अब अपने अनुवाद के दौर में प्रवेश कर चुकी है। हिंदी साहित्य इसके द्वारा अंग्रेजी और अन्य स्थानीय भाषा एवं बोली के आँगन में इठलाने लगी है। यूँ कह लें कि हाइकु को सभी का प्यार और सम्मान मिल रहा है। हाइकु में इससे पूर्व भी अनुवाद हुए हैं। अनुवाद एक कठिन विधा है जिसमें स्चना की मौलिकता, भाव और आत्मा को सुरक्षित रखते हुए अपनी भाषा में प्रस्तुत करना होता है। 

     “रामधारी सिंह दिनकर" पुरस्कार से सम्मानित हाइकुकार डॉ० सुरंगमा यादव-लखनऊ की हाइकु कृतियों- ‘यादों के पंछी’, ‘भाव प्रकोष्ठ’ और ‘गाएगी सदी’ के चुनिंदा हाइकु का मराठी अनुवाद,  तुकाराम पुंडलिक खिल्लारे- महाराष्ट्र ने किया है जो ‘सुनो आकाश (ऐक रे नभा)’ के नाम से प्रकाशित हुआ है। 

    अनुवाद के लिए अनुवादक दोनों भाषाओं में निपुण होना हैं जो उसके अनुवाद में प्रतिबिंबित होता है; साथ ही  इस विधा में भी आपका पूरा अधिकार है। इस संग्रह का देवनागरी का देवनागरी लिपि (मराठी भाषा) में भावानुवाद हुआ है अतः पढ़ने/समझने में ज्यादा दिक्कत नहीं है। 

     इस संग्रह में श्रमसाध्य के साथ अनुशासन का सौंदर्य देखने को मिला। इस काव्यात्मकता के साथ कह सकता हूँ कि इन अनुदित हाइकु का यहाँ पुनर्जन्म हुआ है। सुरंगमा जी के तीनों हाइकु-संग्रह की समीक्षा मैंने की है जो सोशल मीडिया में पढ़ने हेतु उपलब्ध है। तुकाराम पुंडलिक जी मराठी हाइकु के पर्याय बन गए हैं आपका एक हाइकु-संग्रह मराठी में प्रकाशित हो चुका है। हाइकु में चूँकि तीन पंक्ति और 17 वर्ण का पालन करना होता है इसलिए इसका भावानुवाद ही हुआ है। 

     ‘गाएगी सदी’ के अंतर्गत इन हाइकु और उसके अनुवाद पर दृष्ट होने से इसमें अन्तर्निहित भाव निखरकर आता है। 

इसमें से कुल 163 हाइकु का अनुवाद किया गया है। इस हाइकु में पूर्णिमा के चाँद के सौंदर्य को उसके फोटो खिंचाते हुए ‘क्लोजअप’ रूप को रेखांकित किया गया है। चाँद अपने आप में सलोना है और पूर्णिमा का चाँद जिसका जादू हमेशा से रहा है। 

पूनो को देख/दे रहा क्लोजअप/चाँद सलोना। 

चंद्र सुंदर/क्लोजअप देतोय/पूनव राती।(3)

     इस हाइकु का यहाँ गहरा अर्थ है- एक कि व्यक्ति जो माटी का बना है वह नहा धोकर दिवाली मनाने चला है यह उसके तन की शुद्धि को इंगित करता है।  वहीं दूसरी ओर माटी के दीप को रोशन करने से पहले पानी मे भिगोया जाता है। इस तरह वे नहा के दिवाली मनाने चले हैं। आध्यात्मिक और शाब्दिक अर्थ लिए यह हाइकु अद्भुत है। 

नहा के चले/दीपोत्सव मनाने/माटी के दिए।

दिवे मातीचे/दिवाळी पूजेसाठी/सुस्नात आले।(10)

      जीवन, चार दिन का मेला कहा गया है लेकिन इस चार दिन में जीवन का अर्थ समझ नहीं आता। जीवन के सार को इस हाइकु में ढाला गया है। 

जीवन क्या है?/उड़ी-चढ़ी, लो कटी/गिरी पतंग।

जीवन काय?/उडे-चढे, नि कटे/पडे पतंग।(21)

     काले मेघ जब प्यासी धरती पर वर्षा करते हैं तो प्रतीक्षारत बीज हरिया जाते हैं इसे ही हाइकुकार ने हरित कथा लेखन कहा है। 

मेघ लिखता/धरा के आँचल पे/हरित कथा।

लिहितो मेघ/भूच्या पदरावर/कथा हिरवी।(100)

    कंक्रीट के वन में एवं पर्यावरण प्रदूषण से उपजी समस्या में प्रमुख है-छाँव का ना होना जो परिंदों के घोसले के लिए मुश्किलें खड़ी करता है। इस हाइकु में परिंदे बेजान खम्भों से छाँव का पता पूछ रहे हैं। 

खंभे से पूछे/हाँफता हुआ पंछी/छाँव का पता।

पूसे खांब्याला/दमलेले पाखरू/पत्ता छायेचा।(112) 

     केरल के पाठ्यक्रम में शामिल आपका यह हाइकु वर्तमान के भ्रष्टाचार और लालफीताशाही को इंगित करता है। साहब के बंगले के आँगन को सूखा या बाढ़ प्रभावित नहीं कर पाता केवल सुख की फुहारें ही वहाँ होती हैं। प्रतिकूलता में अनुकूलता का यह अच्छा उदाहरण है। 

सूखा या बाढ़/साहब के आँगन/सदा फुहार। *

दुर्भिक्ष्य-पूर/साहेबांच्या अंगणी/सदा तुषार।(141)

     ‘भाव प्रकोष्ठ’ आपका दूसरा हाइकु-संग्रह है। इसमें से कुल 127 हाइकु का अनुवाद किया गया है। इस हाइकु के द्वारा हाइकुकार ने आधुनिक समय की तुलना त्रेता काल से की है जब छल-प्रपंच में राक्षस प्रबल थे और रूप बदलकर छलते थे। अभी के दौर में भी राक्षसी प्रवृत्ति हावी है उस समय एक मारीच स्वर्णमृग बनकर छला था आज की सीता को छलने कई मारीच घूम रहे हैं।

सचेत सीते !/कितने ही मारीच/आज घूमते।

सावध सीते ! /कितीतरी मारीच/आज फिरती।(2)

      मानव मन एक महाकाव्य की भाँति है इसका कोई ओर-छोर नहीं है। मन, इस प्रतीक्षा में है कि इसके महाकाव्य को कोई समझ ले तात्पर्य इसमें वर्णित सुख-दुःख में साथ हो, प्रेम-करुणा की भाषा कोई समझे। 

करूँ प्रतीक्षा/ये मन-महाकाव्य/बाँचे तो कोई।

मी प्रतीक्षेत/मनाचे महाकाव्य/वाचा ना कुणी !(38)

     आधुनिक समय में एकल होते परिवारों में यद्यपि रिश्तों की अहमियत नहीं है इसका प्रमुख कारण है-रिश्तों में अपेक्षाओं को कर्तव्य और त्याग के स्थान पर प्रमुख मानना। यह हाइकु ऐसा भाव लिए हुए है-

स्वार्थ बिछौना/बेसुध पड़े रिश्ते?साँसें गिनते।

नाते बेशुद्ध/स्वार्थाच्या अंथरुणी/श्वास मोजत।(72)

     इस हाइकु में प्यास के दो अर्थ हैं । एक जो आत्मा और परमात्मा का है और दूसरा शाब्दिक जिसमें ग्रीष्म से प्यासी तड़पती चिड़िया जो मेघ से वर्षा की गुहार लगा रही है। 

मेघ चिरौरी/करे प्यासी चिरैया-/'भरो तलैया!'

तृषित चिऊ/मेघाला लागे भांडू-/'भर तलाव'।(90)

     ‘यादों के पंछी’ खंड से कुल 60 हाइकु का अनुवाद किया गया है। यहाँ निशा का मानवीयकरण सुंदरता के साथ हुआ है जिसे प्रकृति चित्रण के साथ संयुक्त किया हुआ है। रात्रि, आकाश और उसके केश के झरने से ओस बनने का दृश्य अद्भुत है। 

निशा सुखाती/नभ में गीले केश/झरती ओस।

रात्र सुकवी/नभात केस ओले/दंव ओघळे।(10)

      इस हाइकु में भी प्रकृति का मानवीकरण है। गेहूँ की पकी बालियों को कोहरे के झूले में हवा का झुलाना सुंदर दृश्य है। 

गेहूँ की बाली/कुहरे का पलना/झुलाती हवा।

गव्हाची लोंबी/धुक्याच्या पाळण्यात/झुलवी हवा।(21)

     ‘विविध’ खण्ड में कुल 14 हाइकु का अनुवाद किया गया है। यहाँ भी मानवीयकरण निखरकर प्रस्तुत हुआ है। वसंत ऋतु वैसे भी बहारों का मौसम होता है तब पूरी प्रकृति यौवन पर होती है। इसकी तुलना वर्तमान के ब्यूटी पार्लर से करना नवीन बिम्ब है। 

निखर उठी/वसंत पार्लर में/प्रकृति सखी।

उजळ झाली/पार्लरी वसंताच्या/निसर्ग सखी।(13)

     हाइकु के इस अनुवाद संग्रह के माध्यम से दो भाषाओं  की खाई कम हुई है और मराठी एवं हाइकु साहित्य समृद्ध हुआ है। जितने शिद्दत से हाइकु रचा गया है उतनी ही शिद्दत से भावानुवाद किया गया है। भाषा परिवर्तन की व्यापक चुनौतियों से बखूबी जूझा गया है। मराठी में हाइकु पढ़ना नई अनुभूति देता है। आप द्वय का कार्य साहित्यिक क्षेत्र में मील का पत्थर है। आप दोनों को मेरी शुभेच्छा।  


रमेश कुमार सोनी, रायपुर, छत्तीसगढ़ 

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सुनो आकाश (ऐक रे नभा) (मराठी में अनूदित हाइकु -संग्रह)

रचनाकार-डॉ. सुरंगमा यादव, अनुवाद-तुकाराम पुंडलिक खिल्लारे, परभणी, शुभकामनाएँ-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ 

अयन प्रकाशन-दिल्ली, 2026

ISBN:978-93-6423-466-4

मूल्य-320/-₹,  पृष्ठ-104

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हाइकु बचपन के


1

समुद्र लीले

नन्हे घरौंदे डरे

माँ से लिपटे। 

2

पोता जो आया

बूढ़ा आँगन हँसा

मासूम बातें। 

3

बच्चों की भाषा

बर्तन भी खिलौना 

माता तू धन्य। 

4

खेल पुकारे

बेफ़िक्री के मैदान

किल्लोल मचा। 

5

क्रेयॉन रंग

कैनवास बच्चों का 

हँसी दीवार। 

6

झूला ना थका

बच्चे झुलाते हुए

माँ सा है मन। 

7

खट्टी इमली 

बचपन बुलाती

मासूम बातें। 

8

बच्चों के प्रश्न 

माता ही सुलझाती

विज्ञानी फेल। 

9

कच्ची अमिया

बच्चे बीनने दौड़े

आँधी के बाद।

10

चोंच में तृण

बड़ा सपना थामे

युवा पखेरु।

11

आज जो लड़े

कल साथ खेलते

बच्चों का खेल। 

12

बच्चों की भूख 

मनुहार थकता

माता ना थकी। 

13

बच्चों की ज़िद 

पिता पूरी करते

डाँट के बाद। 

14

भरा टिफ़िन 

माँ बिन कैसे खाता

स्कूल से लौटा। 

15

छुट्टियाँ ख़त्म

लौटा खिलौने वाला

घर अपने। 

16

नन्ही मुस्कान

गुल्लक सी खनके

छुट्टी में घर। 

…..

रमेश कुमार सोनी

रायपुर, छत्तीसगढ़



हाइकु


1

रिश्ते टूटते

घर बिखर जाता

बोला-बोली में। 

2

गाँव का घर

इसका न उसका

रिश्ता सबका।  

3

घर डरता

रिश्तों की जीभ लंबी

पड़ोसी-कान। 

4

लोग कमाते

सात पुश्तों का धन

रिश्ते किनारे। 

5

घड़ी सबकी

अलग ब्राण्ड वाली

वक्त भी वैसा!

6

बाजार जैसे 

रिश्तों में शर्तें लागू

रोज बदले।

7

शहरी रास्ते

पूछपरख गुम

मोल-भाव है। 

8

एकल घर

रिश्तों का सूनापन

क्लब आबाद। 

9

मन्नती धागे

घर बचाने बँधे

मौका-बेमौका। 

10

रिश्तों में एका

फले-फूले, महके

ताड़ अकेला। 

11

रिश्तों से घर

हवेली भूतहा है

कुत्ते भौंकते। 

12

रिश्तों की माला

घर-प्यार से गूँथे

रोज महके। 

13

तौल लीजिए 

रिश्तों का वजन भी

कर्ज़ माँग लें।।

14

घर जानता

सुख-दुख का आँसू

बाँट भी लेता। 

15

खुशी का पता

हवेली या कुटीर

पूछे डाकिया। 

16

खर्च होना है

जिंदगी भी पैसों सी

लोग कमा लें। 

…..

रमेश कुमार सोनी

‘अक्षरलीला’ 

रायपुर, छत्तीसगढ़




प्रकृति के गूँजते शब्द


प्रकृति के गूँजते शब्द 


     कविता किसी कवि के परिवेश की अनुभूति से उपजी संवेदनाओं का शब्दांकन है। कविता कभी छोटी या बड़ी नहीं होकर उस संवेदित घटना की तीव्रता पर निर्भर करती है। यदि इसका प्रभाव गहरा है तो कविता में ज्यादा शब्दों की आवश्यकता होती है। कई बार ज्यादा शब्दों पर अनुभव और शब्दशक्ति भारी होती है मुझे इस संग्रह में ऐसा ही अहसास हुआ। 

     वर्तमान समय से जूझती हुई कविताओं का दौर जल्द सिमट जाता है क्योंकि वक्त उसी तीव्रता से करवटें लेता है। प्रकृति वाद की कविताओं को स्थायित्व मिलता है ये हर दौर की पसंद होती हैं। किसी व्यक्ति की साहित्यिक चेतना की तीव्रता उसकी कविताओं में दृष्टिगोचर होती है। 

     सुदर्शन रत्नाकर की कृति ‘प्रकृति के स्वर’ को बाँचते हुए मुझे लगा कि इनमें आज के दौर की कविता जैसा प्रकृति का सौंदर्य है, संदेश देने से बचती हुई एवं शब्द चयन में वरिष्ठता झलकती है। इनमें आशावाद और मानवीकरण का समन्वय भी है। आइए इस संग्रह की 102 कविताओं को परिवेश में झाँकने का प्रयास करें। 

     ‘अलबेला चाँद’ कविता में जीवन की लंबाई के बनिस्बत उसकी गुणों की महत्ता रेखांकित है। जिस तरह चाँद यहाँ कम समय के लिए ही उपस्थित होकर सबको मोह लेता है वैसे ही जीवन से अपेक्षा है-

प्रहरी बन देता है पहरा 

उजाला फैलाकर 

अलबेला यह चाँद 

जीवन है छोटा-सा 

फिर भी, मधु से भर देता 

अवनि और अम्बर।

     ‘वह सूरज’ कविता संभावनाओं की अभिव्यक्ति है साथ ही यह हमें प्यार में झुककर ही प्राप्त करने को दर्शाता है। यहाँ आशावादी प्रवृत्ति की सुंदर झलक भी है। 

कल फिर आएगा 

कल फिर बिखेरेगा 

किरणें 

मेरे घर की मुँडेर पर 

वह सूरज जो रोज़ आता है 

चिड़ियाँ चहचहाएँगी 

स्वागत में 

मंगल गीत गाएँगी 

सूरजमुखी खिलेगा 

वशीभूत हो प्यार में 

सिर झुकाएगा।

     ‘अरुणोदय’ कविता में भोर की सुंदरता का मानवीकरण है, हमारे जीवन में ऊर्जा का संचरण भी करता है। कर्म का संदेश इसमें निहित है कि जीवन है तो उगना और अस्त होना लगा ही रहेगा। 

हो रहा हैं अरुणोदय 

भोर ने आँचल समेटा 

पाँवों में लगा महावर 

उषा दुल्हन बन आई है 

माथे पर सूरज टीका 

किरणों ने चूड़ियाँ छनकाई हैं 

रथ पर होकर सवार 

दिनकर बाहर आए हैं 

आलस्य छोड़, पक्षियों ने 

मंगल गीत गाए हैं।

     ‘जल परियाँ’ कविता बारिश के सौंदर्य का मानवीकरण है। इस दृश्य को कवि की कल्पना का आलम्बन मिला है, अनुभूति यहाँ प्रकट हुई है। 

उतर रहीं आसमान से 

पहन पैंजनिया 

सखियों संग मिल 

तीज गातीं 

छपक-छपककर 

झूम-झूमकर धरती को नहलातीं 

पेड़ों से छनकर, 

उतर रहीं

जल बूँदें, मनभावन बूँदें।

     ‘साँझ की वर्षा’ में बूँदों का संगीत के साथ ही विरहिणी की सिसकी से तपस्वी को अंतर्ज्ञान प्राप्ति का अभिलेख है। ‘लहरों के रंग’ में लहरों को आपने सहेलियाँ की स्पर्धा और उनकी क्रीड़ा का अद्भुत वर्णन किया है। ‘भोर की समीर’ कविता में भोर का साहित्यिक दृश्य है। वायु का शिशुरुप और प्रभात योगिनी का ध्यानमग्न होना हम सबके मन को आनंदित करने के लिए पर्याप्त है। 

प्रभात की वह योगिनी लगती, 

ध्यानमग्न हो मंद समाए 

कस्तूरी-सी छुअन लिये वह, 

हर कोना महकाने आए।

सांसों में रच जाए चुपचाप, 

कुछ कहे न, बस मन हुलसाए।

     ‘रंगों की दुल्हन’ में ऋतुराज बसंत की छटाएँ बिखरी हुई हैं जिसका प्रकृति के साथ हम सबको प्रतीक्षा होती है। फूलों के महकने से लेकर भौरों के इतराने तक मदनोत्सव सबको अपने रंग में सराबोर कर लेता है। 

आई रंगों की दुल्हन !

झूम उठे बाग-बगीचे 

हर शाख है लहराई 

बजी प्रेम की बांसुरी 

मन में मस्ती है छाई।

भीनी-भीनी-सी मादकता 

हर दिल को है भायी 

देख सौन्दर्य धरा मुस्काई 

ऋतु वसंत है आई।

     ऐसे ही भाव लिए कविता ‘प्रकृति का रंगोत्सव’ का प्रेम पाश मधु रस लुटाने आया है। पहाड़ भी इस उत्सव में शामिल होने से अपने आपको नहीं रोक पाए। 

पर्वत के उत्तंग शिखर पर 

सूर्य ने किरणों का 

जाल फैलाया है 

रंगरेज ने 

बांध लिया प्रेम पाश में 

चहूँ ओर सोना बिखराया है 

पहन पीताम्बर 

पर्वत भी इठलाया है।

     ‘सर्दी की धूप’ सबको सुहाती है इसकी तुलना नई दुल्हन से हुआ है जो गपशप करती हुई पेड़ों की फुनगी पर जाकर साँझ को दस्तक देती है। 

सर्दी की धूप 

छुई मुई-सी थोड़ी देर बैठी 

मुँडेर पर, फिर 

उतरी धीरे-धीरे, लजाती हुई।

छुए धरा के पाँव 

थपथपाया, दुलार से तपाया 

ढकी छाँव-धूप ने आँचल से।

     ‘आशावादी’ और जीवन के पहलुओं को रेखांकित करती हुई कविता ‘संहार और सर्जन’ में कवि ने संहार को सर्जन की जन्मदात्री कहा है। 

वृक्षों ने पीले वस्त्र उतार दिए हैं 

नई कोंपलों ने किया है 

उसका स्वागत।

पक्षी चहचहाने लगे हैं, 

पीली दूब ने सिर उठाना शुरु 

कर दिया है

कह रही हों जैसे-

हर चुनौती को स्वीकार करो 

संहार है तो सर्जन भी है 

मिटने के बाद ही कुछ 

प्रतिलिपित होता है!

     ‘प्रकृति के स्वर’ से शब्दों की यह यात्रा इसके दृश्यों को पाठकों तक पहुँचाने में सफल रही है। क्लिष्टता एवं बनावटीपन से दूर विशुद्ध प्राकृतिक सकारात्मक बिम्बयुक्त कविताएँ सबको पढ़नी चाहिए। इस संग्रह की कविताओं  में सहजता देखी जा सकती है। ये कविताएँ किसी प्रकार का कोई उपदेश नहीं देती, भाषा सहज और सरल है। 


रमेश कुमार सोनी

रायपुर, छत्तीसगढ़

……

प्रकृति के स्वर, कविता संग्रह- सुदर्शन रत्नाकर 

ISBN: 978-93-6423-538-9

अयन प्रकाशन-नई दिल्ली, 2025

मूल्य-340/-₹, पृष्ठ-116

…..




अँजोर

अँजोर 


दीप पंक्तियाँ सजग है

अँधेरों को भगाने की सीख, सीखते 

किसी मजदूर के जैसे कर्मरत 

अँजोर बगराने की जिद लिए

तो कभी ये बन जाते हैं-

सीमा पर सैनिकों से 

हर धमाकों से बेख़ौफ़ 

रोशनी की रक्षा में 

जीवन की आहुति देने। 


दीप जल रहे हैं

झोपड़ी को रोजगार,

महलों को सुकून, 

युवाओं को मंजिल,

महिलाओं को निडर और 

देश को सामर्थ्य देने की आस में

एक सिपाही की तरह। 


जाग रहा हूँ मैं 

हर दीपक को साथ देने

दोनों हथेलियों से इसे बचाते हुए,

पटाखों की धमाकों से 

काँपते लौ को ढाँढस देते हुए,

रंगोलियों की रंगों से 

इसमें उत्साह भरते हुए 

दीप जागृत हैं-

महालक्ष्मी की प्रतीक्षा में।


मैं आपके साथ 

एक दीप बारना चाहता हूँ

तमाम प्रदूषणों के खिलाफ,

अन्याय,अत्याचारों के खिलाफ,

अनाम शहीदों के नाम, 

अपनी प्राकृतिक संसाधनों को बचाने और 

अपने उन पूर्वजों के नाम 

जिसने हमें ये दुनिया दी

आइए इस दीवाली हम

संकल्प का एक दीप रोशन करें। 


मैंने एक दीप जला रखा है

अपने मन के मुंडेर पर 

हर किसी के अँजोर के लिए,

आओ दो कदम हम भी साथ चल लें

दीप की रोशनी के साथ 

आओ हम भी उजास की खुशी में

सूर्य बनकर उगें और

अपने रिश्तों को अँजोर करें

आओ हम भी दिवाली मनाएँ। 

…..

रमेश कुमार सोनी

रायपुर, छत्तीसगढ़



रोली अक्षत 2004


      रोली अक्षत मेरा प्रथम हिंदी हाइकु-संग्रह है जो सन 2004 में प्रकाशित हुआ था। यह छत्तीसगढ़ का भी प्रथम हिंदी हाइकु-संग्रह है। 
      इसकी समीक्षाएँ यथासमय प्रिंट मीडिया में प्रकाशित हुई हैं ऐसी ही दो समीक्षा को डिजिटलाइज करते हुए आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ। 
     इसके साथ ही मैं हाइकु समीक्षक द्वय को इसके माध्यम से धन्यवाद सहित अपनी श्रद्धाजंलि अर्पित करता हूँ-

1
देखन में छोटे लगे
(बिजनौर टाइम्स उ.प्र.)

     प्रमुख हिन्दी कवि बिहारी द्वारा रचित दोहों के बारे में यह उक्ति प्रसिद्ध हैं-

सत सैया के दोहरे ज्यों नावक के तीर।

देखन में छोटे लगे, घाव करें गंभीर ॥

     बिहारी के एक-एक दोहे में जो अर्थ कूट-कूटकर भरा है, उसे प्रगट करने के लिए साधारण कवियों को कई पंक्तियाँ लिखनी पड़ेंगी, तब भी वह प्रभाव नहीं आ पाएगा।

     हिन्दी के जाने माने कवि कहानीकार एवं स्तंभलेखक रमेश कुमार सोनी का एक हाइकु संग्रह ‘रोली अक्षत’ मेरे सामने है। इसका प्रकाशन वैभव प्रकाशन, रायपुर छत्तीसगढ़ द्वारा सन-2004 में किया गया था। वैसे लेखक ने पुस्तक की एक प्रति उसी वर्ष मुझे भेज दी थी तो भी अब तक मैं उसकी समीक्षा नहीं लिख पाया। हाइकु एक सरल छंद है, जिसके केवल तीन चरण होते हैं। पहले और तीसरे चरण में पाँच-पाँच अक्षर दूसरे चरण में सात अक्षर। कुल सतरह अक्षर। यद्यपि हाइकु का आकार इतना छोटा है तो भी सफल रचनाकार उसके माध्यम से अपने अनुभूत यथार्थ की सशक्त अभिव्यक्ति अत्यंत सुंदर ढँग से कर सकता है। बिहारी के दोहों के समान। उसमें लोकमंगल की भावना भी आ जाए तो सोने में सुगंध ।

     वैसे तो हाइकु मुक्तक छंद है। अतः एक-एक हाइकु का अपना स्वतंत्रता अस्तित्व है पर कोई-कोई हाइकुकार हाइकु रचनाओं में प्रबंधात्मकता का भी थोड़ा बहुत निर्वाह करते हैं। रमेश कुमार सोनी ने अलोच्य संग्रह को कई शीर्षकों के अंतर्गत बाँटा है। एक-एक शीर्षक के अंतर्गत आने वाले हाइकु पदों में हल्का संबंध भी जुड़ गया है। एक-एक भाव को अधिक पूर्णता प्रदान करने में यह रीति सहायक हुई है। लोरी कहानी खंड की रचनाओं में नारी के पुत्री, पत्नी, माँ तीनों रूपों को वंदनीय मानते हुए लिखा है-

ना दूध कर्ज/ना लोरी, ना कहानी/कैसे चुकाए।

     ममतमयी माता अपनी संतान को दूध पिलाकर लोरी गाकर, कहानी सुनाकर बड़े प्रेम व वात्सल्य के साथ पालती पोसती है पर क्या संतानें इसका कर्ज चुकाती हैं? जो संतान पढ़ लिखकर जितना उच्च पद पाती है, वह माता से उतनी ही दूसरी पर बस जाती है। माता यदि विधवा भी बन गयी तो?

विधवा हुई/मौत की परछाई/जीने न पाई।

     लेकिन फैशन के नाम पर जिस्म की जो नुमाइश होती है, उससे कवि समझौता नहीं कर पाते।

कैसी साजिश/जिस्म की नुमाइश/तेरी ख्वाहिश।

     आज हम देखते हैं जाति, धर्म और राजनीति, भाषावाद और प्रांतवाद आदि के नाम पर जनसमूहों में विद्वेष पनप रहा है। दुनिया के विभिन्न भागों में बम विस्फोट हो रहे हैं। बच्चों, महिलाओं सहित निरपराध जनों की हत्याएँ हो रही हैं। कवि का आह्वान है-

मन का मोल/चले रेलम पेल/बिना सिग्नल।

     इसमें शब्दालंकार और अर्थालंकार का कैसा अच्छा संयोग हुआ है। दहेज की कुप्रथा कैसे लड़कों को भी संकट में डालती है इस पर कहते हैं-

दूल्हा बेचारा/शादी के बाजार में/लाचार मर्द।

और नई दुल्हन की स्थिति देखिए-

नई दुल्हन/बड़ी है उलझन/केंद्रीय जेल।

     समाज में व्याप्त घने अंधकार के चंगुल से उसे कैसा नेतृत्व मुक्त कर सकेगा? इस पर उनका हाइकु है-

शूल से यारी/पौरूष और यौवन/ज्योतिर्गमय।

     नेतृत्व करने वाले ऐसे युवा है, जिनमें समाज के लिए कष्ट सहन करे और प्राण तक न्यौछावर करने का साहस हो। हमारे देश की यह हालत है। नब्बे वर्ष पार कर जाने पर भी विधानसभा और संसद की कुर्सी का मोह छूटता नहीं, फिर साहसी, निस्वार्थ युवक कैसे आगे आएँ? हमारी अंधेर नगरी का हाल देखिए-

सब लुटेरे/किससे लड़ें-बचें/सभी अपने।

     जब ये पंक्तियाँ लिखी गईं, तब 2जी स्पेक्ट्रम, कॉमनवेल्थ गेम्स, आदर्श सोसायटी घोटाला जैसे पदबंध सुर्खियों में नहीं थे। कहते हैं, अधिकार दिए नहीं जाते लिए जाते हैं,कवि का आह्वान है-

छीन लीजिए/निज हिस्से की रोटी,/ऐसे ना मिले।

…..

के.जी.बालकृष्ण पिल्लै-तिरुवनंतपुरम 

.....

2

जीवन में सुख-दुःख का एहसास कराता हुआ हाइकु संग्रह "रोली अक्षत"     

     "रोली अक्षत" श्री रमेश कुमार सोनी का प्रथम हाइकु संग्रह है। इस हाइकु संग्रह के प्राक्कथन में कवि ने वर्तमान जीवन की अवदशा तथा उस संदर्भ में अपनी मानसिकता को व्यक्त करने के लिए अपने हृदय के मार्मिक उद्‌गारों को "रोली अक्षत" हाइकु संग्रह में व्यक्त किया है। "रोली अक्षत-हाइकु जगत में रहे अक्षत" शीर्षक के अंतर्गत शंभूशरण द्विवेदी "बन्धु" ने सोनी के हाइकुओं पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। श्री द्विवेदी जी को इस हाइकुकार से आशा है, अतः स्पष्टतः कहा है -"हाइकुकार के रूप में  रमेश कुमार सोनी का यह हाइकु संग्रह हिन्दी जगत में अपना विशिष्ट स्थान भी बनाने में समर्थ होगा। इसकी इंद्रधनुषी छटा पाठकों को आकर्षित करेगी।" "अर्चना की थाली में सजे रोली अक्षत शीर्षक अंतर्गत डॉ. सुधा गुप्ता ने भी सोनी की रचनाधर्मिता को सराहा है।"

      "रोली अक्षत" हाइकु संग्रह में कवि ने विविध शीर्षकों के अंतर्गत जीवन के विविध भावों को रेखांकित करने का सफल प्रयास किया है। नारी के प्रति कवि का दृष्टिकोण उदात्त रहा है, क्योकि नारी हर रूप में महान है। अतः कवि ने प्रारंभ में ही कहा है-

नारी, बहन/पुत्री, पत्नी, रूप है/वंदनीया।

     कवि जीवन में हर हाल में निराशा को भूलकर आशा भरे जीवन की कामना करता है अतः स्पष्टतया कहता है-

मन यौवन/पिघला दे पत्थर/यही पौरुष।

     अंधेरी नगरी में आज के राजनीतिक जीवन की अवदशा का चित्र प्रस्तुत करते हुए कवि ने सच ही कहा है-

चौपट राजा/अंधेर नगरी है/ भ्रष्ट शासन।

     शायद इस कारण ही देश आज अत्यंत दयाजनक स्थिति से गुजर रहा है-

ऑफिस बाबू/साहब चपरासी/आतंकवादी।

      आज की शैक्षणिक व्यवस्था पर करारा व्यंग्य करते हुए कवि ने सच ही कहा है -

गुरु महिमा / किधर है गरिमा /धन महिमा।

"एक भारती" में कवि का देशप्रेम व्यक्त हुआ है-

तुझे नमन/वतन हिन्दुस्तान/हर्षित मन।

"सियासत का खेल" का व्यंग्य देखिए -

पैसे जिनके/सरकार उनकी/हम पराये।

     इस प्रकार रोली अक्षत में श्री रमेश कुमार सोनी ने जीवन और प्रकृति के अटूट संबंध को व्यक्त करके अपने दिल की धड़कन को वाणी दी है। जब भी कोई बात दिल से निकलता है, तब वह चोट भी पहुँचाता है। अतः इन हाइकुओं में प्रभाव क्षमता की भावना बेजोड़ है।

प्रा. मुकेश रावल-आणंद 

अध्यक्ष,हिन्दी विभाग-आणंद आर्ट्स कॉलेज, 

आणंद, गुजरात 

…..

रोली अक्षत, हाइकु संग्रह, रमेश कुमार सोनी, 

प्रकाशक-वैभव प्रकाशन, रायपुर (छ.ग.), 2004

मूल्य 100/- रुपये

…..

(साहित्य वैभव अंक 3 मई-जुलाई 2005 रायपुर में प्रकाशित पृष्ठ-50)







हाइकु संग्रह-अक्षरलीला

       हिन्दी में मेरा तीसरा हाइकु संग्रह- 'अक्षरलीला' प्रकाशित हुआ। आप सभी पढ़िएगा। भूमिका- श्री रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' जी (वरिष्ठ हाइकुकार) ने लिखा है। प्रकाशन-अयन प्रकाशन, दिल्ली-2025. 

अनुक्रम इस तरह से है-

रमेश कुमार सोनी
रायपुर

अक्षरलीला


मेरा अक्षय तृतीया-
         'अक्षरलीला' हिंदी हाइकु में मेरा यह तीसरा संग्रह है जो अतिशीघ्र आपके पास होगा। 
         अयन प्रकाशन-दिल्ली से यह प्रकाशित हो रहा है। 

मेरा पहला हिंदी हाइकु-संग्रह 'रोली अक्षत'-2004 है जो छत्तीसगढ़ का पहला हिंदी हाइकु-संग्रह है। 'गुरतुर मया' मेरा छत्तीसगढ़ी का हाइकु-संग्रह है। 

रमेश कुमार सोनी
रायपुर


समीक्षा


चिरैया की ख़ुशी में चहकते हाइकु

     जापानी साहित्य की विधा हाइकु, अनुभूतियों के शब्दांकन की सघनता का काव्य है जो-5,7,5 यानि 17 वर्णों की तीन पंक्तियों में लिखी जाती है। यह एक सम्पूर्ण कविता है। काव्यसौन्दर्य की परिपूर्णता के साथ ही शिल्पगत अनुशासन किसी हाइकु के प्राण है। इसके संकेतों में रचे गए दृश्य पाठकों के समक्ष स्पष्ट रुप से खुलते हैं। किसी क्षण विशेष के अहसास को साहित्य की इस विधा में रचना कड़ी साधना की अपेक्षा रखता है। 

     अपनी संवेदनाओं को हाइकु में रचने, विषय की कोई बाध्यता नहीं है यह लोकजीवन की किसी भी अन्तर्सम्बन्धों में रचा जाता है जिसमें प्रकृति प्रमुख है। इस संग्रह में हाइकु की कुल संख्या-345 है जो 20 विविध उपखण्ड में वर्णित हैं। ये हाइकु उमेश महादोषी द्वारा मार्च 2020 के पूर्व के लिखे हुए हैं जो रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ की प्रेरणा एवं मार्गदर्शन से प्रेरित हैं। परिवेशगत परिस्थितियों से आपमें उपजी आत्मचेतना की वैचारिक फसल ‘चूँ चूँ चिरैया’ के रुप में प्रस्तुत हुआ है। साहित्य की विविध विधाओं में रचने और संपादकीय दायित्व निभाने के बाद आपका यह पहला हाइकु संग्रह आया है। 

      रिश्तों में सबसे बड़ा स्थान माँ का होता है और इसका कर्ज़ कोई कभी नहीं चुका सकता। मॉं, आज के परिवेश में भी सर्वोपरि है। माँ पर साहित्य में बहुत कुछ लिखा जा चुका है इसमें हाइकु भी पीछे नहीं है। माँ की ममता सभी योनियों में एक समान सी है। इन दो हाइकु में माता की महत्ता को सुंदरता से रेखांकित किया गया है-

बैठी गौरैया/मुँडेर पे ताकती/चोंच में धागा।

माँ की चुप में/कविता-सा कुछ है/मानो सच में।

     उम्मीद आज के दौर में सबसे अहम है इसके दो रुप इन हाइकु में देखने को मिलता है। कागज़ की नाव का पार होने की उम्मीद (प्रतीक) मेहनत की बैशाखी पर निर्भर है वहीं नीम के नीचे धूप का सरपंच की तरह बैठने की चाहत, धूप की सरपंची ज़िद है-

हो न हो आज/कागज की नाव भी/होगी ही पार !

नीम तले, रे!/धूप चाहे बैठना/ज्यों सरपंच !

     राजनीति में आज सब जायज़ माना जाने लगा है धीरे-धीरे तमाम ऐब इसमें स्वीकार होने लगे हैं। शुचिता और उम्मीद क्रमशः क्षीण होने लगे हैं ऐसे में ये हाइकु बहुत कुछ अर्थ लिए प्रस्तुत हुए हैं-

तीनो बन्दर/हो गये एकाकार/कुर्सी पै बैठ !

नशे में तख्त/भींचती आवाम है?मुट्ठियाँ सख्त !

     हाइकुकार की कल्पना में उसका गाँव हाइकु विधा में उतर आया है जहाँ सब आदर्श है। नीम की छाँव(सुख) दोनों स्थानों यानि आम और बबूल के गाँव में है जो उसकी समतामूलक दृष्टि को प्रदर्शित करती है-

नीम की छाँव/आम और बबूल/दोनों के गाँव!

     डॉक्टर इस कलियुग में भगवान के जैसे माने जाते हैं जिसे उन्होंने कोरोना काल में दिखाया भी है। आज  ई.एम.आई. के दौर में जब कर्ज़ हावी है हॉस्पीटल और उपकरण क्रय करने में; तब उसके चुकारा के लिए मरीजों की जेब की ओर निहारा जाने लगा है जो इस व्यवस्था को कलंकित करता है। ऐसी ही नकरात्मता के भाव को दर्शाता हुआ ये हाइकु दृष्टव्य है-

काँटे-सी चुभे/जेब पै दृष्टि तेरी/पीर क्यों घटे !

इन्द्र बेचता/दधीच की हड्डियाँ..../डॉलर पाता !

     यादें हर किसी की अमानत हैं जो हमें अनायास ही अपनी दुनिया में खींचकर सुख-दुःख का अहसास ज़िंदा कर देती हैं। यादें,अकेलेपन की दोस्त हैं जो हमारी धरोहर होती हैं। हाइकु में यादों के भाव को पिरोना यानि इसे सहेजना ही है-

कभी तुम थे/आज तुम्हारी यादें/स्वप्न हमारे !

आग बरसी /झुलसी कल्पनाएँ/बचीं वो यादें !

     प्रकृति के पास सौंदर्य का अकूत खज़ाना है उसे अनुभूत करने और शब्दांकित करने का माद्दा सभी विधाओं में मौजूद है लेकिन हाइकु की लघुता उसमें चार चाँद लगा देती है। आपके हाइकु में मानवीयकरण है तथा इसके बिम्ब का चयन सर्वथा नवीन है-

ताल-तलैया/वर्षा की मार खा-खा/उफने भैया !

गुलाब खिला/आँगन में सूरज/ठुमुक रहा।

खिले चाँदनी/गमलों में नभ के/बिहँसे घनी !

घूमता शीत/ले हाथ में बन्दूक/काँपती धूप !

सूरज झुका/अँजुरी भर पानी/नदी का पिया।

      प्रदूषण से संपूर्ण विश्व त्राहिमाम कर तो रहा है लेकिन इससे बचने के लिए वह आधुनिक विकास का चोला पहने हुए है। प्रकृति के पास बदला लेने के अलावा कोई विकल्प शेष नहीं है। प्रदूषण विविध रुपों में हमें हानि पहुँचा रही है लेकिन इंसान इससे बचने की सोचता कहाँ है? प्रदूषणों के हाहाकार को दर्शाते हुए ये हाइकु अच्छे हैं-

वर्षा के हाथ/तेजाब भरा ज़ाम/पौधों के नाम।

वन की आग !/बुझाने आये इसे/जल कहाँ से !

रेत ही रेत /और एक नदी है?स्वप्न या सच !

     डर का बाज़ारीकरण और इस हेतु तैयार उत्पादों के विज्ञापन में फँसा व्यक्ति इससे उबरने की जुगत में कितना सफल और कितना असफल होता है  यह उसकी अपनी कूबत होती है। डर सदैव से खौफ़नाक रहा है और इसकी आड़ में जीवन का संघर्ष और सत्ता की बुनियाद रखी जाती रही है। वर्तमान समय में डर सर्वत्र विद्यमान है तब ये हाइकु समीचीन लगते हैं-

फूल भी जब/बम-सा है दिखता/जग हिलता।

आँखों में भरा/झरता रहा डर/कितना सहा।

     युद्ध के वैश्वीकरण और सीमाओं तथा व्यापार के अंधे लोभ ने ना तो बस्ती देखी ना जंगल, बच्चे देखे ना मानवता सब नष्ट करके विजेता जैसा सत्ता सुख भोगने की चाह को बलवती बना दिया है। युद्ध का कोई नतीजा नहीं होता बल्कि यह बदले की बीज बोकर एक और युद्ध को पालता-पोषता है ऐसे ही भावों को पुष्ट करते हैं ये हाइकु-

आग तू जला/और हवा भी बहा/नतीजा बता !

बोयी जाती है /बीज में आग जब/होता है युद्ध !

           विषय वैविध्य और अनुपम बिम्ब का प्रयोग आपके हाइकु को स्थापित करते हैं। यह आपका प्रथम हाइकु संग्रह है जो आपकी संभावनाओं को दर्ज़ करती हैं। यह हाइकु आपके भीतर की समतामूलक भाव को व्यक्त करती है कि किसी भी स्थिति में प्रेम का दामन नहीं छोड़ना चाहिए-

प्रेम न सही/प्रेमियों की तरह/मिलो तो कहीं !

मेरी शुभकामनाएँ


रमेश कुमार सोनी

रायपुर, छत्तीसगढ़

….

चूँ चूँ चिरैया-हाइकु संग्रह, उमेश महादोषी

ISBN:978-93-341-0141-6 

प्रकाशन-स्वयं 2024, मूल्य-100₹, पृष्ठ-88




समीक्षा

पीपल वाला घर’ बहुत मायने रखता है


     आदरणीय रमेश कुमार सोनी का कविता- संग्रह ‘पीपल वाला घर’ मिला। पर्यावरणीय जागरण और प्राकृतिक संरक्षण के प्रति गहन संवेदना से ओत- प्रोत कविताएँ पढ़ीं। कवि का प्रकृति के प्रति लगाव भी इन कविताओं में रचा-बसा है।

     संग्रह का शीर्षक ‘पीपल वाला घर’ बहुत मायने रखता है। यह भारतीय संस्कृति में पीपल का महत्त्व तो बताता ही है, प्रतीक रूप में प्रकृति की जीवनदायी शक्ति का आभास भी कराता है। पीपल का वृक्ष वह शरण स्थली है, जहाँ जीवन का संचार होता है, तो सोचिए जिसने पीपल को शरण दी है, वह पीपल वाला घर अर्थात् प्रकृति क्या मायने रखती है?

     जापानी साहित्य विधाओं को छह संग्रह समर्पित कर चुके साहित्यकार रमेश कुमार सोनी छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मण्डल व अन्य संस्थाओं के साथ मिलकर पर्यावरण संरक्षण हेतु प्रयास किए हैं, जिसके लिए उन्हें राज्य स्तर पर कई सम्मान प्राप्त हुए हैं। अपने इस प्रथम काव्य- संग्रह में विगत 20 वर्षों की अपने पर्यावरणीय जागृति अभियानों के दौरान हुई अनुभूतियाँ पाठक को उन्होंने इस उद्देश्य के साथ  सौंपी हैं कि उनमें चेतना जगा सकें। कवि का कथन है कि पर्यावरणीय असाक्षरता ने हमें भारी सजा दी है। केवल चर्चा- वार्ता से कुछ नहीं होगा, हमें व्यावहारिक होना होगा, तभी हम बरी हो पाएँगे। हमें प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण जीवन जीने की कला सीखनी ही होगी।

     डॉ. अनिता सावंत (छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मण्डल) ने इस संग्रह की भूमिका में कवि के साहित्यिक धर्म के साथ प्रकृति के प्रति उनके धर्म से भी हमारा परिचय कराया है कि वे कागज पर अपनी कलम चलाते हुए केवल पर्यावरणीय समस्याओं पर बात ही नहीं करते हैं, बल्कि उनके समाधान के लिए धरातल पर सक्रिय रूप से कार्य- व्यवहार भी करते हैं। वे साहित्य को पर्यावरण की दिशा में एक प्रेरक बल के रूप में उपयोग कर पाठकों में संचेतना और सक्रियता बढ़ाते हैं।

     आज पर्यावरणीय संकट दुनिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। मानवजनित गतिविधियाँ पर्यावरण संतुलन को बिगाड़ रही हैं। इस असंतुलन के परिणामस्वरूप पृथ्वी पर जीवन संकट में आ गया है। संग्रह की 51 कविताएँ न केवल इस संकट को व्यक्त करती हैं, बल्कि प्रकृति की ओर लौटकर उस संकट से बचने का उपाय भी बताती हैं।

     संग्रह की पहली ही कविता ‘खुशियाँ रोप लें’ जीवन में प्रकृति का महत्त्व बताती है। प्राकृतिक चक्र में बँधे प्रकृति के शांतिपूर्ण वातावरण में जीते पशु- पक्षी प्राकृतिक चक्र से छूटे मनुष्य की स्थिति बताते हैं—

पक्षियों का झुंड/ शाम ढले ही लौट आया है... / गाय लौट रही है गोधूलि बेला में/ रोज की तरह रंभाते हुए/ क्या आपने कभी इनका विराम देखा?.../

कुछ लोग नहीं लौटे हैं/ अस्पताल से वापस,

इस स्थिति में मनुष्य को मनुष्य ने ही पहुँचाया है प्रकृति का हद दर्जे का शोषण करके—

हवा-पानी बिक रहा है/ नदियों के ठेके हुए हैं.../ साँसों की कालाबाजारी में—/ ऑक्सीजन का मोल महँगा हुआ है। (पृष्ठ 15)

     मनुष्य के किए की कीमत मनुष्य को ही चुकानी पड़ रही है। जीने के लिए सबसे जरूरी है— हवा-पानी। उसे भी बेचा जा रहा है, ऐसे में कैसे जिन्दा रहा जाए? परन्तु प्रकृति के इस हद दर्जे के शोषण के बाद भी—

आज भी लोग/ कटते हुए पेड़ों पर चुप हैं/ प्लास्टिक के फूल बेचकर खुश हैं/ बहुत से बचे-खुचे हुए लोग/ मोबाइल में पक्षियों की रिंगटोन्स से। (पृष्ठ 16)

     असली फूल, पेड़-पौधे, पंछी यानी प्रकृति को बचाने की चिंता किसी को नहीं, जबकि इन्हीं से जीवन खिलता, महकता, चहकता है। कवि इन्हीं खुशियों को रोपने का सभी से आग्रह करते हैं। कवि धरती माँ की दशा पर दुखी हैं कि जो कल सोने की चिड़िया थी, रत्नगर्भा थी, आज—

     आज मुझे वो मिली है-/ जहरीली हवाओं की दमघोंटू साँस/ और अम्लीय वर्षा की चिंता लिए/ सीना छलनी हुआ/ बोरवेल से छिद्रित आँचल का दर्द लिए/ पानी के घूँट को तरसती/ सीने में ज्वाला धधकाती/ ओजोन की फटी छतरी ओढ़े/ विषैले कचरों का बोझा ढोए (पृष्ठ 19)

     मनुष्य ने धरती को जिस दशा में पहुँचाया है, इससे धरती कुपित है और मनुष्य उसे मनाने के लिए वैश्विक चर्चा कर रहा है। और कवि—

इन सबसे दूर/ मैं पेड़ लगाते हुए/ अकेले बुला रहा हूँ/ लौटे हुए परिंदों को... / इस उम्मीद के साथ कि/ एक दिन कारवाँ जरूर बनेगा/ एक दिन जरुर ये नादान लोग/ शिकायत नहीं रहने देंगे कि—/ धरा: कौन जाने दर्द तेरा। (पृष्ठ 21)

     ऊँची उड़ान भरती एक छोटी— सी चिड़िया हमारे सपनों में पंख लगा देती है। यह सब देखना कितना सुखद है मगर आज मुश्किल से कोई पक्षी भूले- भटके आसमान में उड़ता दिखाई देता है। कवि को विलुप्त हो रहे इन्हीं पंछियों की चिंता है—

इन दिनों सुन रहा हूँ/ आखिरी उड़ान का गीत/ ‘चल उड़ जा रे पंछी कि—/ अब ये देश हुआ बेगाना...’/ और इसी तरह एक दिन/ पूरा खाली हो जाएगा मेरा आसमान। (पृष्ठ 29)

     कवि बाजारवाद की चपेट में आई नदी की दशा देखकर व्यथित हैं—

नदियों ने बसाईं सभ्यताएँ/ सभ्यताओं से उपजे बाज़ार/ और बाज़ार की वस्तुएँ हो गईं—/ एक-एक कर सारी नदियाँ। (पृष्ठ 36)

वे नदी को बचाने का अनुरोध करते हैं—

हम सबको बचाना होगा—/ अपने भीतर की नदी को/ तभी बच पाएगी— कोई नदी/ हमारी विलुप्तता से पहले। (पृष्ठ 37)

     अगली कविता प्रगति और उपभोक्तावादी संस्कृति की आलोचना करती है—

लोग बोतलबंद आम आर्डर कर रहे हैं

     प्रगति आम के बगीचों वाली दुनिया से बहुत दूर ले गई और उपभोक्तावाद ने आम के बगीचों में बाजार खोल दिया। प्रकृति जो सबकुछ हमें मुफ्त में देती थी, अब उन सब वस्तुओं की बाजार बोली लगा रहा है।

     अमेजन और फ्लिपकार्ट मुस्कुरा रहे हैं/ यही एक दिन बेचेंगे भाड़े में हमें—/ छाया, आसरा, घोंसला, सुकून और.../ जैसे बिक रही है हवा और पानी बोतलों में!/ कितना पैसा है आपके पास इसे खरीदने को?

     अपने जीवन का खोया हुआ वास्तविक सुख भी क्या आज हम खरीद पाएँगे? जो कभी हमें निःशुल्क मिलता था। कवि खोए हुए उसी वास्तविक सुख का पता बताते हैं—

आइए लौट चलें प्रकृति की ओर कोई/ प्रतीक्षा में है आपके ही गाँव में। (पृष्ठ 86)

     अगली कविता में कवि का पीपल के साथ आत्मिक जुड़ाव है—

सोचता हूँ कि यदि यह पीपल न होता तो/ कैसे आते अतिथि/ कैसे आतीं मुझ तक चिट्ठियाँ...

     पहले ये पेड़ हमारी पहचान थे, आज खुद ही गुमनाम हैं। लेखक का ‘पीपल- सा विश्वास’ इस पहचान को बनाए रखना चाहता है। उसे भावी पीढ़ियों के लिए बचाकर रखना चाहता है।

कुछ बरगद और कुछ पीपल/ ताकि इसकी निडर छाया में फिर लौट सकें—/ कुछ गौरैया और बगुले जैसे बच्चों की बरदी; (पृष्ठ 109)

     अगली कविता में प्रकृति से दूर हुए शहरी लोगों की मनःस्थिति का चित्रण है जो पहले तो प्रकृति के स्वाभाविक रूप को नियंत्रित कर जीवन में अप्राकृतिक अव्यवस्था बनाते हैं और फिर अपनी यंत्रवत् दिनचर्या से तंग आकर प्राकृतिक शांति और स्वाभाविक सुख ढूँढने निकलते हैं—

आखिरकार एक दिन/ शहर ने सुना ही दिया कि-/ इनकी सेवा-सुश्रुषा करो/ आब-ओ-हवा बदल दो, दुआएँ करो/

अब ये प्लास्टिक के पहाड़ जैसे लोग/ गाँव में अपना घर ढूँढ रहे हैं— / नदी किनारे, जंगल के पास (पृष्ठ 126)

     संग्रह की सभी कविताएँ समकालीन समाज के लिए एक चेतावनी हैं। आज जब पर्यावरणीय संकट हमारे समाज को विकट परिस्थितियों की ओर ले जा रहा है, ऐसे में हमें चेताते हुए पर्यावरण रक्षार्थ सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता का एहसास कराता यह संग्रह प्रासंगिक है। पर्यावरणीय चेतना को जागृत करता यह संग्रह साहित्य और समाज दोनों के लिए महत्त्वपूर्ण है।

इस संकटकाल में ‘पीपल वाला घर’ हमें याद दिलाता है कि यदि हमें भविष्य में जीवन की सुरक्षा चाहिए, तो हमें प्रकृति की शरण में जाना होगा।

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समीक्षक- रश्मि विभा त्रिपाठी

आगरा, उत्तर प्रदेश

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पीपल वाला घर’ (काव्य- संग्रह): रमेश कुमार सोनी, पृष्ठ: 129, मूल्य: 200 रुपये, ISBN: 978-81-19292-90-5, प्रथम संस्करण: 2023, प्रकाशक: जिज्ञासा प्रकाशन (ओ. पी. सी.) प्रा. लि., ई- 86, स्वर्ण जयंती पुरम, गाज़ियाबाद- 201002 (उ. प्र.)

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हिंदी दिवस की आप सभी को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाऍं। 
जय हिंदी-जय देवनागरी, जय छत्तीसगढ़।


                      छत्तीसगढ़ राज्य को इस पर गर्व है कि -विश्व का पहला हिंदी ताँका ई पुस्तक 'झूला झूले फुलवा' है जो सन 2020 में किंडल पर प्रकाशित हुई है। 

रमेश कुमार सोनी,बसना (रायपुर)
          

नमन

वसुदेव सुतं देवं कंस चाणूर मर्दनम।

देवकी परमानंदं कृष्णं वंदे जगद्गुरुम्।।

नमन 

अज्ञानता के श्यामपट्ट पर 

गुरु जब अपनी 

कृपा के आलोक में लिखते हैं

तब उजियारे का जीवन महकता है 

नमन ऐसे गुरुवर को जो

हम सबके कल्याण में 

उपेक्षा का हलाहल पाते हैं।


प्रश्नों की कठिनतम दुनिया से 

वैतरणी पार लगाते सदा

ज्ञान की मशाल थामे

सकारात्मक विचारों की प्रेरणा से

प्यार,करुणा का ज्ञान बोते 

चाहें किसी से कुछ भी नहीं

सदैव पूछते और कैसे हो?

फिर कहते- खुश रहो।


मानवता और अनुशासन पढ़ाते,

पाप-पुण्य का भेद बताते और 

मोक्ष की राह बताने वाले गुरु हैं

गुरुओं की इस भूमि को नमन

नमन इस विश्व गुरु भारत को।

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रमेश कुमार सोनी