अक्षरलीला

‘अक्षरलीला’- जग की लीलाओं को समेटते सत्रह अक्षर

 ऋता शेखर ‘मधु’

     ‘अक्षरलीला’ रमेश कुमार सोनी का सद्य प्रकाशित हाइकु संग्रह है। हाइकु जगत में रमेश कुमार सोनी जी का स्थान उल्लेखनीय है। विविध विषयों पर हाइकु लिखना उनकी क्रियाशीलता एवं अनुभव के वृहद संसार का परिचायक है। क्षण विशेष को सत्रह वर्णों में समाहित करके दृश्यमान कर देना हाइकुकार की विशेषता होती है। पूर्व में दो हाइकु-संग्रह प्रकाशित करवाने के बाद यही विशेषता तीसरे हाइकु-संग्रह ‘अक्षरलीला’ में पाठकों के समक्ष आयी है। सर्वप्रथम  पुस्तक का नाम  ही आकर्षित करने वाला है। अक्षरों की लीला कभी रामलीला, कभी कृष्णलीला की तरह मनोहारी दृश्य उत्पन्न करती हैं और कभी प्रकृतिलीला की तरह आक्रामक भी हो सकती हैं। पुस्तक हार्डकवर के साथ सुसज्जित है। पृष्ठों की गुणवत्ता बहुत अच्छी है। 


     पुस्तक माता-पिता को श्रद्धापूर्वक समर्पित की गई है। हाइकु को चौदह विषयों में विभाजित किया गया है। पुस्तक को जाने-माने वरिष्ठ हाइकुकार रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ जी का आशीर्वचन प्राप्त है। पुस्तक में 14 विषय लिए गए हैं जिनमें प्रकृति, जीवन दर्शन एवं सामाजिक रिश्ते शामिल हैं।

     ‘पाखी की सरगम’ विषय में कुल 84 हाइकु में जहाँ अपने गाँव की मिट्टी पर गर्व प्रदशित किया गया है वहीं सेमल बीज की यात्रा एक दृश्य उत्पन्न करती है जो बचपन में कुतूहल का विषय हुआ करता था। समाज में कम कपड़ों से बने आधुनिक परिधान को लक्ष्य करके लिखा गया हाइकु विचारणीय है।

गुरूर देती/ चंदन जैसी शोभा/ गाँव की मिट्टी।

सेमल बीज/ हवाई यात्रा करे/ पैराशूट में।

तन ढकने/ नोची गयी कपास/ तन उघरे।

     पशु-पक्षी-कीटों को आधार बनाकर रचे गए 56 हाइकु ‘खरगोश फुदके’ विषय में सम्मिलित हैं। अत्यधिक गर्मी से मनुष्य या अन्य जीव भले भी परेशान होते हों मगर ऊँट को वही गर्मी भली लगती है। मौसम की विविधता का प्रभाव सभी के लिए एक जैसे हों, यह आवश्यक नहीं। चौपायों से सड़कों पर जो अफरातफरी होती है उसपर भी सटीक हाइकु का सृजन हुआ है।

तपती रेत/ऊँट-गर्मी न कोसे/लू को दौड़ाते।

रास्ते में सांड/ट्रैफिक सत्यानाश/मर्जी चलाते।

     सब्जी और फलों ने ‘धूप का स्वाद’ में 28 अद्भुत रंग बिखेरे हैं। एक ओर पक्षी और पौधे के विशेष खेल को  चित्रित किया गया है तो दूसरी ओर सब्जियों को रहस्यमयी भी बताया गया है।

मक्के के खेत/ खो-खो खेलते तोते/ प्रेम पकता।

पत्तों में पत्ते/ जाने क्या छिपाती हैं?/ गोभी-पत्तियाँ।

    ‘ठुमकती बूँदों’ ने 35 हाइकु के जरिये कई जीवनदायिनी रूप का प्रदर्शन किया है।

शिला जी उठी/ घास मुकुट शोभे/ वर्षा मुस्काती।

     ‘धुंध की माया’ में 42 मायावी हाइकु ठंड और धुंधलापन समेटे नटखट भी हुए हैं। साथ ही धुंध को एक कुशल खिलाड़ी के रूप में देखने की क्षमता हाइकुकार की कल्पनाशीलता को अलग ऊँचाई प्रदान कर रहा है।

बुझी-अँगीठी/पूस काटके भागी/ ठंडी चिकोटी।

धूप का स्पिन/ओस वाली पिच में/धुंध का छक्का।

     ‘लू का चाबुक’ के 49 हाइकु बरबस ही लू के प्रचंड रूप से चाबुक जैसी चोट महसूस करवाने में सफल हैं।

लू महारानी/ गश्त पर निकली/ फैला सन्नाटा।

भैंस बेफ़िक्र/तालाब में बैठक/धूप भी हारी।

     वर्तमान समय की प्रदूषण समस्या को ‘प्रदूषण का दर्द’ के 35 हाइकु में बखूबी समेटा गया है।

डंप ग्राउंड/धुआँ घेरे शहर/मास्क बिकते।

पेड़ जो कटे/कटे कटे हैं लोग/भीड़-अकेली।

पेड़ है तो सृष्टि है, पेड़ है तो जीवन है। यह सब ‘पेड़ की बातें’ शीर्षक के 35 हाइकु कह रहे।

शुल्क ना माँगे/ रास्ते के बड़े पेड़/ मुफ़्त विश्राम।

पेड़ की छाँव/रोटी प्याज का लंच/सुस्ताते बैल।

     जीवन पथ पर स्मृतियों का विशेष स्थान है। ये स्मृतियाँ प्रेम की हों तो और सुखद हो जाती हैं।  ‘प्रेमनगर की 56 स्मृतियाँ’ प्रेम की गहराई को समझाने में सफल हैं।

डाब में स्ट्रॉ-दो/ लहरें मचली हैं/प्यार का ‘बीच’।

प्रतीक्षा बैठी/ यादों के दालान में/रंगोली डाले।

     ‘घर संसार की बातें’, 77 हाइकु में हजारों बातों के साथ भ्रमित युवा वर्ग की बातें भी लेकर आई हैं।

बच्चे बनाते/लालटेन का चित्र/ झूमर नीचे।

नए युग में/बटोही भटके हैं/लिव इन में।

    ‘त्योहार की खुशियाँ’, 42 में  28 हाइकु होली को समर्पित है। बाकी में रक्षाबंधन, कुम्भ एवं करवाचौथ पर आधारित हैं। ‘सच-झूठ की माया’ में सभी 21 हाइकु जीवन के सुख-दुःख, उतार- चढ़ाव, सच-झूठ पर आधारित प्रभावपूर्ण हैं।

झूठ का मेला/सच,बचके लौटा/‘एंटीक पीस।

     ‘युद्ध और भूख’ के 35 हाइकु युद्ध की विभीषिका, युद्ध से हानि, भूख के रंग पर आधारित हैं।

लाश किसकी/जीत की या हार की/दावा गायब।

भूखे किसान/खेतों में उगे मुद्दे/नारे चीखते।

     ‘आजकल की चर्चा’ के 70 हाइकु में वर्तमान समाज के विचारणीय मुद्दों को उठाया गया है।

लोकतंत्र जी/रिसॉर्ट में रहते/‘हॉर्स ट्रेंडिंग’।

चीखती नारी/मर्द का पशु जिंदा/‘न्यूज़’ भी ‘न्यूड’।

तोतली आँखे/माँ को ढूँढती फिरे/रोती ‘मर्चुरी’।

    रमेश सोनी जी ने अपने हाइकु में अंग्रेज़ी शब्दों का प्रयोग करके हाइकु विधा के लिये नया रास्ता खोला है। अंग्रेज़ी मिश्रित हिन्दी के आधुनिक प्रचलन में ये पाठकों द्वारा पसन्द किया जाएगा। रमेश सोनी जी आगे भी हाइकु जगत को समृद्ध करते रहें, इसके लिए हार्दिक शुभकामनाएँ!

ऋता शेखर ‘मधु’

बंगलुरू 

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‘अक्षरलीला’ हाइकु संग्रह- रमेश कुमार सोनी

भूमिका-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

ISBN:978-93-6423-264-7

पृष्ठ संख्या - 111, मूल्य - 340/-₹

अयन प्रकाशन-नई दिल्ली

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हाइकु-समीक्षा


      व्यापक जीवन अनुभवों की 'अक्षर लीला'

                       

         समीक्षक-डॉ. शिवजी श्रीवास्तव 

 


      'अक्षर लीला' श्री रमेश कुमार सोनी का नवीन हाइकु-संग्रह है, इसके पूर्व उनके दो हाइकु- संग्रह- 'रोली अक्षत' और 'पेड़ बुलाते मेघ' प्रकाश में आ चुके हैं। श्री सोनी हिंदी साहित्य की अनेक विधाओं में सृजनरत तो हैं ही साथ ही वे पर्यावरणविद भी हैं,पर्यावरण संरक्षण हेतु किए गए कार्यो के लिए उन्हें राज्य स्तर पर कई बार सम्मानित भी किया गया है। कवि स्वभावतः संवेदनशील होते हैं, प्रकृति के प्रति अनुराग भी व्यक्ति की संवेदना को सघन करता है,स्वाभाविक ही है कि श्री सोनी जी के हृदय में संवेदना एवं भावाकुलता  अत्यंत सघन है। भावों की यह सघनता उनकी रचनाओं में अनेक रूपों में देखी जा सकती है। उनके समस्त रचना-संसार में उनकी यह प्रवृत्ति  ही विविध रूपों में प्रतिबिम्बित  देखी जा सकती है, उनका यह नवीन हाइकु -संग्रह उसी भावाकुल प्रवृत्ति की एक कड़ी है। इस संग्रह के प्रारम्भ में प्रसिद्ध साहित्यकार श्री रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' जी द्वारा 'रमेश कुमार सोनी का अनुभव संसार' शीर्षक से लिखा हुआ परिचयात्मक आलेख संग्रह की विशिष्टता को सिद्ध करता है।

       'अक्षर लीला' के समस्त हाइकुओं को कवि ने चौदह शीर्षकों में विभाजित किया है। इनमें प्रकृति है, घर -परिवार हैं, तीज-त्यौहार हैं, समसामयिक समस्याएँ हैं और जीवन -जगत के दार्शनिक प्रश्न हैं।  प्रकृति के प्रति स्वाभाविक अनुराग संग्रह के  हाइकुओं में सहज रूप में अभिव्यक्त हुआ है।हाइकु अपनी प्रकृति से ही  प्रकृति की  कविता है अतः सोनी जी के हाइकुओं में उनके प्रकृति प्रेम को स्वाभाविक रूप से अभिव्यक्ति के अनेक अवसर मिले हैं।'अक्षर लीला' में प्रकृति अपने विविध रूपों के साथ उपस्थित है। हिंदी कविता में प्रकृति चित्रण के जितने रूप मिलते हैं सोनी जी के हाइकुओं में भी प्रकृति के लगभग समस्त रूप चित्रित हैं, उनमें प्रकृति का यथातथ्य चित्रण हैं, उसके अलंकारिक, उपदेशक और मानवीकरण-रूप भी विद्यमान हैं। रमेश सोनी जी प्रकृति के जिस रूप का चयन करते हैं,उसका अत्यंत सहज  बिम्ब उपस्थित करते हैं। उदाहरण के लिए नदी तट पर पेड़ के नीचे पानी पीते हुई एक चीते का एक स्वाभाविक चित्र दृष्टव्य है -

नदी का तट / पानी पी रहा चीता / पेड़ की छाँव।

       ठीक इसी प्रकार एक और सहज चित्र देखा जा सकता है -

झूमे सैलानी / बर्फबारी जो हुई /बाज़ार गर्म।

       यद्यपि प्रकृति के सहज और स्वाभाविक सौंदर्य को को कवि ने अनेक हाइकुओं में अत्यंत सहज रूप में चित्रित किया है, पर उसमें साथ-साथ वे आलंकारिकता और कलात्मकता का स्पर्श भी देते चले हैं। वर्षा का एक बिम्ब है, जब वर्षा की प्रथम फुहार धरा को भिगोती है तो मिट्टी से जो सोंधी महक उठती है उसे कवि ने विलक्षण उपमा प्रदान की है -

पहली वर्षा / खुली इत्र की शीशी / महकी मिट्टी।

     वर्षा होने पर इत्र की शीशी खुलने की उपमा सर्वथा अनूठी और मौलिक है, ऐसे और भी अनेक बिम्ब हैं जहाँ कवि ने प्रकृति के उपादानों को नवीन उपमाओं से सुसज्जित किया है, यथा -

तीखी है मिर्च / कौन सौतन तेरी?/ जलन बड़ी।

भोर का मौन/ पाखी ने मंत्र पढ़ा / दुनिया जागी।

सन्यासी वृक्ष/ पतझड़ की ऋतु / केश लुंचन। 

    तीखी मिर्च की सौतन ढूँढना, भोर में पक्षियों का मंत्र उच्चारण करना और पतझड़ की केश लुंचन से तुलनाएँ सर्वथा नवीन हैं । इस प्रकार की नवीन उपमाओ के लिए वे लोक जीवन में व्याप्त प्रतीकों को चुनते हैं जैसे पृथ्वी द्वारा मेघ -पत्रों को बाँचना और धुंध द्वारा धूप से नेग माँगना, ये लोक जीवन के प्रचलित उदाहरण हैं किन्तु इन्होने हाइकुओं में एक अद्भुत सौंदर्य की सृष्टि कर दी है।                     

मेघों का पत्र/ बाँचती रही पृथ्वी/हरित भाषा।

धूप के द्वारे/धुंध हठीली खड़ी/  नेग माँगती।

    प्रकृति के माध्यम से विविध मानवीय मनोभावों की अभिव्यक्ति भी सोनी जी के हाइकुओं में अत्यंत स्वाभाविक रूप में व्यक्त हुई हैं। यथा-

धूप ने चूमे /टमाटर के गाल/गुस्से में लाल।

 लू महारानी/ गश्त पर निकली / सन्नाटा फैला।

     विषयों की भाँति रमेश सोनी जी के हाइकुओं की भाषा में भी विविधता है,भाषा में व्यंजना है, प्रतीकात्मकता है आलंकारिकता है, इसके साथ ही लोक जीवन में प्रचलित अंग्रेजी शब्दों के प्रयोग हैं। इस वैविध्य ने संग्रह के हाइकुओं को जीवंत बनाते हुई लोक मन के निकट स्थित कर दिया है। मुहावरों और लोकोक्तियों के सार्थक प्रयोग भी उनकी भाषा में विद्यमान है। कुछ हाइकु दृष्टव्य हैं -

शेखी बघारे/काँटों बीच गुलाब/जेड प्लस में। 

पेड़ों के पंछी / ऑर्केस्ट्रा सुनाते हैं / भोर -साँझ में 

बेटी विदाई/साथ ले जाती घर /मकान बाकी।

धर्म जो लड़े /जातियाँ उग आयीं/सत्ता की भाषा।

मेघों का स्कूल/ बूंदो की पूरी छुट्टी/सावन हँसे।

गाँव के मेले/पीपल पंखा झेले/ खुश बटोही।

       कवि एक पर्यावरणविद भी है अतः स्वाभाविक रूप से पर्यावरण की चिंता भी उनके हाइकुओं में विद्यमान है। संग्रह के चौदह भागों में 'प्रदूषण का दर्द' शीर्षक से एक भाग है जिसमें पर्यावरण संबंधी हाइकु ही हैं। इसमें विकास के नाम पर कटते जंगल , बढ़ते पॉलीथिन के प्रयोग, पराली का जलना, पटाखों के प्रयोग इत्यादि से बढ़ते प्रदूषण की पीड़ा और चिंता साफ देखी जा सकती है-

वन जो कटे  / ग्लेशियर भी टूटे /धरा उबली।

वन डरते / विकास की कुल्हाड़ी / गर्दन काटे।

प्लास्टिक-कूड़ा / हरियाली निगले / धरा कूकर।

खतरे बड़े / पॉलीथिन कचरा /कभी न सड़े।

विकास पथ /यात्री को छाँव कहाँ /ठूँठ बाकी हैं।

    इन सब चिंताओं के मध्य कवि निराश नहीं है उसे नई पीढ़ी से उम्मीद है, उसे उम्मीद है कि बच्चे ही प्रकृति को बचाएँगे-

 धरती खुश/ बच्चे पौधा रोपते/उम्मीद जिन्दा। 

    पर्यावरण की चिंता के साथ ही अनेक सामाजिक /सांस्कृतिक चिंताओं से भी कवि मन व्याकुल है। वर्तमान में झूठ का साम्राज्य फल-फूल रहा है, सत्य एकाकी एवं उपेक्षित सा है इस तथ्य को कवि ने हाइकुओं में अत्यंत गंभीरता से चित्रित किया है 

सच संत सा / झूठ रंगीला बड़ा / चले तनके।

झूठ का मेला / सच, बचके लौटा / एंटीक पीस।

       युद्धों की विभीषिका भी वर्तमान का बड़ा अभिशाप है।युद्ध का परिणाम सदैव विनाशक ही होता है,युद्ध स्वयं में गूंगा-बहरा होता है वह किसी प्रश्न के उत्तर नहीं देता। आश्चर्य तो यह है कि युद्धों की आवश्यकता का कारण लोग शांति की स्थापना बताया करते हैं। मानवता के आधार स्तंभ विद्यालय, अस्पताल भी जब युद्ध में नष्ट होते हैं तो गम्भीर संकट उपस्थित होता है, इसके दुष्परिणामों को कोई नहीं बताता,ऐसी अनेक  चिंताओं के हाइकु भी संग्रह में विद्यमान हैं-

कसूर पूछे / स्कूल अस्पताल भी /युद्ध गूंगा है। 

लाशों के ढेर / शांति वार्ता बेमानी / जिंदगी हारी।

       इन सबके साथ ही घर -परिवार, रिश्ते नाते, मेले बाज़ार, सभी उनके हाइकु के विषय हैं। उदाहरण के लिए पिता और माँ के इन हाइकुओं में सहजता, आत्मीयता और परिवार के स्नेह के अत्यंत स्वाभाविक चरित्र को देखा जा सकता है।

 बच्चों की जिद / घोड़ा बनते पिता / घर चहके।

 माँ परोसती / भोजन संग प्यार / ढाबे में 'बिल'।

         प्रकृति से लेकर जीवन -जगत और घर -परिवार तक की दुनिया के जितने हाइकु 'अक्षर लीला' में संकलित है वे कोरी कल्पना की उपज नहीं है वे सभी हाइकु कवि के जीवन अनुभवो से निःसृत हैं, उनमें कल्पना उतनी ही है जितनी काव्य सौंदर्य हेतु अनिवार्य है। अतः यह कहना समीचीन होगा कि यह संग्रह कवि के अनुभव संसार की 'अक्षर लीला' है।

डॉ. शिवजी श्रीवास्तव-गौतम बुद्ध नगर, उ.प्र.

Email-   shivji.sri@gmail.com

Mobile-   9557518552

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हाइकु-संग्रह ‘अक्षर लीला’-रमेश कुमार सोनी 

भूमिका-रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

अयन प्रकाशन दिल्ली, संस्करण - प्रथम, 2025

पृष्ठ-112,मूल्य-340/-₹

ISBN: 978-93-6423-264-7

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