हाइकु समीक्षा


भाषाएँ पृथक भाव एक

     हिंदी हाइकु अब अपने अनुवाद के दौर में प्रवेश कर चुकी है। हिंदी साहित्य इसके द्वारा अंग्रेजी और अन्य स्थानीय भाषा एवं बोली के आँगन में इठलाने लगी है। यूँ कह लें कि हाइकु को सभी का प्यार और सम्मान मिल रहा है। हाइकु में इससे पूर्व भी अनुवाद हुए हैं। अनुवाद एक कठिन विधा है जिसमें स्चना की मौलिकता, भाव और आत्मा को सुरक्षित रखते हुए अपनी भाषा में प्रस्तुत करना होता है। 

     “रामधारी सिंह दिनकर" पुरस्कार से सम्मानित हाइकुकार डॉ० सुरंगमा यादव-लखनऊ की हाइकु कृतियों- ‘यादों के पंछी’, ‘भाव प्रकोष्ठ’ और ‘गाएगी सदी’ के चुनिंदा हाइकु का मराठी अनुवाद,  तुकाराम पुंडलिक खिल्लारे- महाराष्ट्र ने किया है जो ‘सुनो आकाश (ऐक रे नभा)’ के नाम से प्रकाशित हुआ है। 

    अनुवाद के लिए अनुवादक दोनों भाषाओं में निपुण होना हैं जो उसके अनुवाद में प्रतिबिंबित होता है; साथ ही  इस विधा में भी आपका पूरा अधिकार है। इस संग्रह का देवनागरी का देवनागरी लिपि (मराठी भाषा) में भावानुवाद हुआ है अतः पढ़ने/समझने में ज्यादा दिक्कत नहीं है। 

     इस संग्रह में श्रमसाध्य के साथ अनुशासन का सौंदर्य देखने को मिला। इस काव्यात्मकता के साथ कह सकता हूँ कि इन अनुदित हाइकु का यहाँ पुनर्जन्म हुआ है। सुरंगमा जी के तीनों हाइकु-संग्रह की समीक्षा मैंने की है जो सोशल मीडिया में पढ़ने हेतु उपलब्ध है। तुकाराम पुंडलिक जी मराठी हाइकु के पर्याय बन गए हैं आपका एक हाइकु-संग्रह मराठी में प्रकाशित हो चुका है। हाइकु में चूँकि तीन पंक्ति और 17 वर्ण का पालन करना होता है इसलिए इसका भावानुवाद ही हुआ है। 

     ‘गाएगी सदी’ के अंतर्गत इन हाइकु और उसके अनुवाद पर दृष्ट होने से इसमें अन्तर्निहित भाव निखरकर आता है। 

इसमें से कुल 163 हाइकु का अनुवाद किया गया है। इस हाइकु में पूर्णिमा के चाँद के सौंदर्य को उसके फोटो खिंचाते हुए ‘क्लोजअप’ रूप को रेखांकित किया गया है। चाँद अपने आप में सलोना है और पूर्णिमा का चाँद जिसका जादू हमेशा से रहा है। 

पूनो को देख/दे रहा क्लोजअप/चाँद सलोना। 

चंद्र सुंदर/क्लोजअप देतोय/पूनव राती।(3)

     इस हाइकु का यहाँ गहरा अर्थ है- एक कि व्यक्ति जो माटी का बना है वह नहा धोकर दिवाली मनाने चला है यह उसके तन की शुद्धि को इंगित करता है।  वहीं दूसरी ओर माटी के दीप को रोशन करने से पहले पानी मे भिगोया जाता है। इस तरह वे नहा के दिवाली मनाने चले हैं। आध्यात्मिक और शाब्दिक अर्थ लिए यह हाइकु अद्भुत है। 

नहा के चले/दीपोत्सव मनाने/माटी के दिए।

दिवे मातीचे/दिवाळी पूजेसाठी/सुस्नात आले।(10)

      जीवन, चार दिन का मेला कहा गया है लेकिन इस चार दिन में जीवन का अर्थ समझ नहीं आता। जीवन के सार को इस हाइकु में ढाला गया है। 

जीवन क्या है?/उड़ी-चढ़ी, लो कटी/गिरी पतंग।

जीवन काय?/उडे-चढे, नि कटे/पडे पतंग।(21)

     काले मेघ जब प्यासी धरती पर वर्षा करते हैं तो प्रतीक्षारत बीज हरिया जाते हैं इसे ही हाइकुकार ने हरित कथा लेखन कहा है। 

मेघ लिखता/धरा के आँचल पे/हरित कथा।

लिहितो मेघ/भूच्या पदरावर/कथा हिरवी।(100)

    कंक्रीट के वन में एवं पर्यावरण प्रदूषण से उपजी समस्या में प्रमुख है-छाँव का ना होना जो परिंदों के घोसले के लिए मुश्किलें खड़ी करता है। इस हाइकु में परिंदे बेजान खम्भों से छाँव का पता पूछ रहे हैं। 

खंभे से पूछे/हाँफता हुआ पंछी/छाँव का पता।

पूसे खांब्याला/दमलेले पाखरू/पत्ता छायेचा।(112) 

     केरल के पाठ्यक्रम में शामिल आपका यह हाइकु वर्तमान के भ्रष्टाचार और लालफीताशाही को इंगित करता है। साहब के बंगले के आँगन को सूखा या बाढ़ प्रभावित नहीं कर पाता केवल सुख की फुहारें ही वहाँ होती हैं। प्रतिकूलता में अनुकूलता का यह अच्छा उदाहरण है। 

सूखा या बाढ़/साहब के आँगन/सदा फुहार। *

दुर्भिक्ष्य-पूर/साहेबांच्या अंगणी/सदा तुषार।(141)

     ‘भाव प्रकोष्ठ’ आपका दूसरा हाइकु-संग्रह है। इसमें से कुल 127 हाइकु का अनुवाद किया गया है। इस हाइकु के द्वारा हाइकुकार ने आधुनिक समय की तुलना त्रेता काल से की है जब छल-प्रपंच में राक्षस प्रबल थे और रूप बदलकर छलते थे। अभी के दौर में भी राक्षसी प्रवृत्ति हावी है उस समय एक मारीच स्वर्णमृग बनकर छला था आज की सीता को छलने कई मारीच घूम रहे हैं।

सचेत सीते !/कितने ही मारीच/आज घूमते।

सावध सीते ! /कितीतरी मारीच/आज फिरती।(2)

      मानव मन एक महाकाव्य की भाँति है इसका कोई ओर-छोर नहीं है। मन, इस प्रतीक्षा में है कि इसके महाकाव्य को कोई समझ ले तात्पर्य इसमें वर्णित सुख-दुःख में साथ हो, प्रेम-करुणा की भाषा कोई समझे। 

करूँ प्रतीक्षा/ये मन-महाकाव्य/बाँचे तो कोई।

मी प्रतीक्षेत/मनाचे महाकाव्य/वाचा ना कुणी !(38)

     आधुनिक समय में एकल होते परिवारों में यद्यपि रिश्तों की अहमियत नहीं है इसका प्रमुख कारण है-रिश्तों में अपेक्षाओं को कर्तव्य और त्याग के स्थान पर प्रमुख मानना। यह हाइकु ऐसा भाव लिए हुए है-

स्वार्थ बिछौना/बेसुध पड़े रिश्ते?साँसें गिनते।

नाते बेशुद्ध/स्वार्थाच्या अंथरुणी/श्वास मोजत।(72)

     इस हाइकु में प्यास के दो अर्थ हैं । एक जो आत्मा और परमात्मा का है और दूसरा शाब्दिक जिसमें ग्रीष्म से प्यासी तड़पती चिड़िया जो मेघ से वर्षा की गुहार लगा रही है। 

मेघ चिरौरी/करे प्यासी चिरैया-/'भरो तलैया!'

तृषित चिऊ/मेघाला लागे भांडू-/'भर तलाव'।(90)

     ‘यादों के पंछी’ खंड से कुल 60 हाइकु का अनुवाद किया गया है। यहाँ निशा का मानवीयकरण सुंदरता के साथ हुआ है जिसे प्रकृति चित्रण के साथ संयुक्त किया हुआ है। रात्रि, आकाश और उसके केश के झरने से ओस बनने का दृश्य अद्भुत है। 

निशा सुखाती/नभ में गीले केश/झरती ओस।

रात्र सुकवी/नभात केस ओले/दंव ओघळे।(10)

      इस हाइकु में भी प्रकृति का मानवीकरण है। गेहूँ की पकी बालियों को कोहरे के झूले में हवा का झुलाना सुंदर दृश्य है। 

गेहूँ की बाली/कुहरे का पलना/झुलाती हवा।

गव्हाची लोंबी/धुक्याच्या पाळण्यात/झुलवी हवा।(21)

     ‘विविध’ खण्ड में कुल 14 हाइकु का अनुवाद किया गया है। यहाँ भी मानवीयकरण निखरकर प्रस्तुत हुआ है। वसंत ऋतु वैसे भी बहारों का मौसम होता है तब पूरी प्रकृति यौवन पर होती है। इसकी तुलना वर्तमान के ब्यूटी पार्लर से करना नवीन बिम्ब है। 

निखर उठी/वसंत पार्लर में/प्रकृति सखी।

उजळ झाली/पार्लरी वसंताच्या/निसर्ग सखी।(13)

     हाइकु के इस अनुवाद संग्रह के माध्यम से दो भाषाओं  की खाई कम हुई है और मराठी एवं हाइकु साहित्य समृद्ध हुआ है। जितने शिद्दत से हाइकु रचा गया है उतनी ही शिद्दत से भावानुवाद किया गया है। भाषा परिवर्तन की व्यापक चुनौतियों से बखूबी जूझा गया है। मराठी में हाइकु पढ़ना नई अनुभूति देता है। आप द्वय का कार्य साहित्यिक क्षेत्र में मील का पत्थर है। आप दोनों को मेरी शुभेच्छा।  


रमेश कुमार सोनी, रायपुर, छत्तीसगढ़ 

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सुनो आकाश (ऐक रे नभा) (मराठी में अनूदित हाइकु -संग्रह)

रचनाकार-डॉ. सुरंगमा यादव, अनुवाद-तुकाराम पुंडलिक खिल्लारे, परभणी, शुभकामनाएँ-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ 

अयन प्रकाशन-दिल्ली, 2026

ISBN:978-93-6423-466-4

मूल्य-320/-₹,  पृष्ठ-104

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अक्षरलीला-समीक्षा

हाइकु के इंद्रधनुषी रंग-अक्षरलीला


     चिरकाल से अनश्वर परमपिता परमेश्वर की दिव्य लीला साहित्यकारों का वर्ण्य-विषय रही है। वेदों से लौकिक साहित्य तक मनोरम प्रकृति ने कवियों ,साहित्यकारों के मन को आकर्षित किया और हरे-भरे वन, वृक्ष, लताएं, पुष्प, पर्वत, नदी-नद, सागर, खेत-खलिहान कविताओं, लेखों में आ विराजे। मानवीय प्रकृति की प्रेम, दया, करुणा आदि संवेदनाओं ने भी साहित्य में प्रचुर रस-वर्षण किया है। ऐसी ही परम्परा का निर्वहन करते हुए इस अक्षरलीला को अपनी काव्य-कृति 'अक्षरलीला' में अपनी हाइकु रचनाओं के माध्यम से प्रसिद्ध हाइकुकार श्री रमेश कुमार सोनी जी ने उपस्थित किया है। 'रोली अक्षत' ,और 'पेड़ बुलाते मेघ' के उपरान्त हिन्दी में यह कवि का तीसरा हाइकु-संग्रह है। छत्तीसगढ़ी में 'गुरतुर मया' हाइकु-संग्रह' भी प्रकाशित हो चुका है ।

     प्रकृति हाइकु की प्राण है। अनेक वर्षों से हाइकु-साधना में रत कवि का वर्ण्य-संसार व्यापक है। यदि विवेच्य 'अक्षरलीला' की बात करें तो विषयवार-14 उपशीर्षकों में विभक्त पुस्तक में कवि ने 'पाखी का सरगम' सुनाते-सुनाते भोर, साँझ, सूरज, हिम से ढकी पर्वत शृँखलायें, नदी, झील आदि के बहुत सुन्दर दृश्य उकेरे हैं। ग्राम्य-जीवन को तो जैसे साकार ही कर दिया है। कुछ उदाहरण द्रष्टव्य हैं- 

भोर-साँझ में /रश्मियाँ फाग खेलें/ नभ रँगते।पृ.17

खेत गा उठे/ बैलों की घंटी-संग/ किसान राग।पृ.17

भोर में घाट/ घर-घर के किस्से/ बड़े बातूनी।।पृ.19

     ठंडी झील से डरा बाल सूरज है। हिमकिरीट पर हीरे जड़ती रश्मियाँ, उजालों का प्रहरी दीप, खड़फड़ी बजाती बरदी, चाँद को देखता चाँद अपने अनुपम सौन्दर्य के साथ उपस्थित हैं। इनसे भी परे कविमन की राष्ट्रभक्ति धारा में हमारा राष्ट्रीय ध्वज कुछ ऐसे दिखाई पड़ता है- 

भोर केसरी / नदी की श्वेत धारा/ हरी वसुधा।पृ.18

      सचमुच माँ भारती की इस छटा पर मन बलिहार। नदी, झील, गुलाब, भ्रमर, तितली, पुरवा, भित्ति टँगे उपले और माँ के डैनों में छिपे बच्चों के दृश्यों के बीच भारतीय-दर्शन का दिग्दर्शन कराते हाइकु उल्लेखनीय हैं। जीवन की साँझ कैसी होनी चाहिए  और जीव जीवन की क्षणभंगुरता जानते हुए भी कैसा आचरण करता है-

झरी पत्तियाँ /मोक्ष की राह चलीं/ भजन गाती ।पृ.25

तारों पे पाखी/धूप सेंकने बैठे/ताके शिकारी।पृ.22

     'खरगोश फुदके' तथा 'धूप का स्वाद' वन्य-जीवों और फलों, सब्जियों की आकृति-प्रकृति का मोहक, मनरंजक वर्णन करती हाइकु रचनाओं से सज्जित है- 

गाजर खाने/ खरगोश फुदके/ दाँत दिखाके ।पृ.29

धूप ने चूमे/ टमाटर के गाल/गुस्से में लाल।पृ.37

     यूँ तो वर्षा का सौन्दर्य शब्दातीत है किन्तु कवि की लेखनी ने 'अक्षरलीला' में पहली वर्षा की सुगंध, वर्षा में नहाते पक्षियों की मस्ती, मेघ के छौने,तड़ित, जोगन नदी के जीवन्त दृश्यों के साथ कुछ ऐसा कहा कि मन अहा!अहा! भी कह उठा और आह भी - 

रश्मियाँ हँसी/ मेघों के पीछे खड़ी/ इन्द्रधनुष।पृ.42

 मेघ सावनी/पायल बजा झूली/ झूमती घाटी।पृ.43  तथा 

किसी की देह/ सावन भिगोता है/ किसी के नैन।पृ.42

     'धुंध की माया' के व्याज से शीत ऋतु के सुन्दर दृश्य दृष्टिगोचर होते हैं-

वन सुन्दरी/ कोहरे में सजती/ओस नहाती।पृ.51

     दूसरी ओर ग्रीष्म भी कुछ कम नहीं, पूरी प्रखरता के साथ विद्यमान है-

नौतपा धूप/ प्रचंड गर्मी वेश/ जेठ की माया।पृ.52

     प्रकृति के प्रति प्रेम से भरी,उसके सौन्दर्य में रमी कवि की दृष्टि से 'प्रदूषण का दर्द' भी छिपा नहीं है। वह साहित्यकार ही क्या जो अपने परिवेश के प्रति संवेदनशील न हो। सजग कवि कहते हैं-

जलते खेत/ मिट्टी, हवा पूछते/ कैसे बचोगे ? पृ.59

     कटते वन, पॉलीथीन, जलती पराली, तेज ध्वनि में संगीत बजाते डीजे, यहाँ तक कि हत्यारा मांझा कुछ भी कवि की दृष्टि से अगोचर नहीं है। 'पेड़ की बात' में कवि अपने मन का तंज कुछ इस तरह कहते हैं कि पेड़ निस्पृह भाव से पत्थरों के बदले भी फल-फूल देते हैं, छाया देते हैं लेकिन अपने साथी के कटने पर मौन क्यों रहते हैं-

पेड़ स्वार्थी हैं/साथी के कटने से / चुप रहते।पृ.64

     'प्रेम नगर की स्मृतियाँ' तो प्रेम के रंग में कुछ ऐसे रँगी हैं कि सहृदय पाठक का मन भी सतरंगी हो जाए। प्रेम ही तो है जो मन को वासंती कर देता है या रच जाता है हाथों पर मेहंदी बनकर-

पत्र उनका/ वासंती हुआ मन/ महकी बेला।पृ.71

मन की बातें/ मेहंदी बन रचीं/ प्रीत महकी।पृ.72

   और तो और प्रेम की गली जाकर तो वक्त भी ठहर जाता  है-

तुम्हें जो देखा/ वक्त ठहर गया/प्रेम नि: शब्द।पृ.72

     कवि का मन प्रकृति में रमा तो रमा ही रह गया ऐसा भी नहीं है। पुस्तक में समाज की संवेदनाओं से स्पंदित रचनाएँ भी प्रचुरता से उपलब्ध होती हैं । कवि की सजग लेखनी ने अपने चारों ओर घटती घटनाएँ देखीं और उनके आनन्द तथा पीड़ा को अपने हाइकुओं के माध्यम से अभिव्यक्त किया। कुछ दृश्य देखिए-

बच्चे शर्माते/टूटे दाँत छिपाते/ चिढ़ते-रोते।पृ.77

मां परोसती/ भोजन संग प्यार/ढाबे में बिल। पृ.78

मुस्काते बँटी/ प्रतीक्षा की कुनैन/ वृद्धाश्रम में। पृ.82

     पुस्तक में पिता पर बहुत सुन्दर, मनभावन हाइकु हैं। सामान्य रूप से समाज में स्त्री की दशा और दिशा पर विचार करें तो विगत की अपेक्षा चित्र कुछ सुधरता प्रतीत होता है। शिक्षा, खेल, विज्ञान, कला, साहित्य प्राय: सभी क्षेत्रों में आज की स्त्री नए कीर्तिमान स्थापित कर रही है। लेकिन कवि की दृष्टि केवल यहीं नहीं रुकी, उन्होने देखा आज भी-

मायके लौटी/प्रश्न उछल पड़े/घर सहमा।पृ.80

   पुस्तक में समाज का रंग-बदरंग चेहरा, जाति-धर्मगत वैमनस्य, युद्ध और भूख की विभीषिका, भ्रष्ट सिस्टम की पर्त उधेड़ती सशक्त हाइकु रचनाएँ हैं तो उत्सवधर्मी भारत के त्योहारों के सरस, सुन्दर, मनभावन रंग भी हैं। निराशा कवि का मन्तव्य नहीं। उन्हें विश्वास है कि दर्द भी महकेगा। नन्हें जुगनू अपनी दीप्ति से मंजिल तलाश ही लेंगे -

काँटों के बीच/ दर्द महक उठा/ खिला गुलाब।पृ.110

मशाल लिए/ जुगनू दल खोजते/ घर अपना।पृ.110


     अधिक क्या कहूँ  'अक्षरलीला' का सम्पूर्ण रसास्वादन तो पढ़कर ही किया जा सकता है। निश्चय ही पुस्तक सुधी सहृदयजनों के बीच प्रचुर स्नेह और सम्मान प्राप्त करेगी। 

मंगलकामनाएँ !

                              

डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा 

वापी, गुजरात

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अक्षरलीला (हाइकु-संग्रह)- रमेश कुमार सोनी

भूमिका-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ 

पृष्ठ-112, मूल्य-340/-₹ 

ISBN: 978-93-6423-264-7

अयन प्रकाशन-नई दिल्ली 2025

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