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अक्षरलीला

‘अक्षरलीला’- जग की लीलाओं को समेटते सत्रह अक्षर

 ऋता शेखर ‘मधु’

     ‘अक्षरलीला’ रमेश कुमार सोनी का सद्य प्रकाशित हाइकु संग्रह है। हाइकु जगत में रमेश कुमार सोनी जी का स्थान उल्लेखनीय है। विविध विषयों पर हाइकु लिखना उनकी क्रियाशीलता एवं अनुभव के वृहद संसार का परिचायक है। क्षण विशेष को सत्रह वर्णों में समाहित करके दृश्यमान कर देना हाइकुकार की विशेषता होती है। पूर्व में दो हाइकु-संग्रह प्रकाशित करवाने के बाद यही विशेषता तीसरे हाइकु-संग्रह ‘अक्षरलीला’ में पाठकों के समक्ष आयी है। सर्वप्रथम  पुस्तक का नाम  ही आकर्षित करने वाला है। अक्षरों की लीला कभी रामलीला, कभी कृष्णलीला की तरह मनोहारी दृश्य उत्पन्न करती हैं और कभी प्रकृतिलीला की तरह आक्रामक भी हो सकती हैं। पुस्तक हार्डकवर के साथ सुसज्जित है। पृष्ठों की गुणवत्ता बहुत अच्छी है। 


     पुस्तक माता-पिता को श्रद्धापूर्वक समर्पित की गई है। हाइकु को चौदह विषयों में विभाजित किया गया है। पुस्तक को जाने-माने वरिष्ठ हाइकुकार रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ जी का आशीर्वचन प्राप्त है। पुस्तक में 14 विषय लिए गए हैं जिनमें प्रकृति, जीवन दर्शन एवं सामाजिक रिश्ते शामिल हैं।

     ‘पाखी की सरगम’ विषय में कुल 84 हाइकु में जहाँ अपने गाँव की मिट्टी पर गर्व प्रदशित किया गया है वहीं सेमल बीज की यात्रा एक दृश्य उत्पन्न करती है जो बचपन में कुतूहल का विषय हुआ करता था। समाज में कम कपड़ों से बने आधुनिक परिधान को लक्ष्य करके लिखा गया हाइकु विचारणीय है।

गुरूर देती/ चंदन जैसी शोभा/ गाँव की मिट्टी।

सेमल बीज/ हवाई यात्रा करे/ पैराशूट में।

तन ढकने/ नोची गयी कपास/ तन उघरे।

     पशु-पक्षी-कीटों को आधार बनाकर रचे गए 56 हाइकु ‘खरगोश फुदके’ विषय में सम्मिलित हैं। अत्यधिक गर्मी से मनुष्य या अन्य जीव भले भी परेशान होते हों मगर ऊँट को वही गर्मी भली लगती है। मौसम की विविधता का प्रभाव सभी के लिए एक जैसे हों, यह आवश्यक नहीं। चौपायों से सड़कों पर जो अफरातफरी होती है उसपर भी सटीक हाइकु का सृजन हुआ है।

तपती रेत/ऊँट-गर्मी न कोसे/लू को दौड़ाते।

रास्ते में सांड/ट्रैफिक सत्यानाश/मर्जी चलाते।

     सब्जी और फलों ने ‘धूप का स्वाद’ में 28 अद्भुत रंग बिखेरे हैं। एक ओर पक्षी और पौधे के विशेष खेल को  चित्रित किया गया है तो दूसरी ओर सब्जियों को रहस्यमयी भी बताया गया है।

मक्के के खेत/ खो-खो खेलते तोते/ प्रेम पकता।

पत्तों में पत्ते/ जाने क्या छिपाती हैं?/ गोभी-पत्तियाँ।

    ‘ठुमकती बूँदों’ ने 35 हाइकु के जरिये कई जीवनदायिनी रूप का प्रदर्शन किया है।

शिला जी उठी/ घास मुकुट शोभे/ वर्षा मुस्काती।

     ‘धुंध की माया’ में 42 मायावी हाइकु ठंड और धुंधलापन समेटे नटखट भी हुए हैं। साथ ही धुंध को एक कुशल खिलाड़ी के रूप में देखने की क्षमता हाइकुकार की कल्पनाशीलता को अलग ऊँचाई प्रदान कर रहा है।

बुझी-अँगीठी/पूस काटके भागी/ ठंडी चिकोटी।

धूप का स्पिन/ओस वाली पिच में/धुंध का छक्का।

     ‘लू का चाबुक’ के 49 हाइकु बरबस ही लू के प्रचंड रूप से चाबुक जैसी चोट महसूस करवाने में सफल हैं।

लू महारानी/ गश्त पर निकली/ फैला सन्नाटा।

भैंस बेफ़िक्र/तालाब में बैठक/धूप भी हारी।

     वर्तमान समय की प्रदूषण समस्या को ‘प्रदूषण का दर्द’ के 35 हाइकु में बखूबी समेटा गया है।

डंप ग्राउंड/धुआँ घेरे शहर/मास्क बिकते।

पेड़ जो कटे/कटे कटे हैं लोग/भीड़-अकेली।

पेड़ है तो सृष्टि है, पेड़ है तो जीवन है। यह सब ‘पेड़ की बातें’ शीर्षक के 35 हाइकु कह रहे।

शुल्क ना माँगे/ रास्ते के बड़े पेड़/ मुफ़्त विश्राम।

पेड़ की छाँव/रोटी प्याज का लंच/सुस्ताते बैल।

     जीवन पथ पर स्मृतियों का विशेष स्थान है। ये स्मृतियाँ प्रेम की हों तो और सुखद हो जाती हैं।  ‘प्रेमनगर की 56 स्मृतियाँ’ प्रेम की गहराई को समझाने में सफल हैं।

डाब में स्ट्रॉ-दो/ लहरें मचली हैं/प्यार का ‘बीच’।

प्रतीक्षा बैठी/ यादों के दालान में/रंगोली डाले।

     ‘घर संसार की बातें’, 77 हाइकु में हजारों बातों के साथ भ्रमित युवा वर्ग की बातें भी लेकर आई हैं।

बच्चे बनाते/लालटेन का चित्र/ झूमर नीचे।

नए युग में/बटोही भटके हैं/लिव इन में।

    ‘त्योहार की खुशियाँ’, 42 में  28 हाइकु होली को समर्पित है। बाकी में रक्षाबंधन, कुम्भ एवं करवाचौथ पर आधारित हैं। ‘सच-झूठ की माया’ में सभी 21 हाइकु जीवन के सुख-दुःख, उतार- चढ़ाव, सच-झूठ पर आधारित प्रभावपूर्ण हैं।

झूठ का मेला/सच,बचके लौटा/‘एंटीक पीस।

     ‘युद्ध और भूख’ के 35 हाइकु युद्ध की विभीषिका, युद्ध से हानि, भूख के रंग पर आधारित हैं।

लाश किसकी/जीत की या हार की/दावा गायब।

भूखे किसान/खेतों में उगे मुद्दे/नारे चीखते।

     ‘आजकल की चर्चा’ के 70 हाइकु में वर्तमान समाज के विचारणीय मुद्दों को उठाया गया है।

लोकतंत्र जी/रिसॉर्ट में रहते/‘हॉर्स ट्रेंडिंग’।

चीखती नारी/मर्द का पशु जिंदा/‘न्यूज़’ भी ‘न्यूड’।

तोतली आँखे/माँ को ढूँढती फिरे/रोती ‘मर्चुरी’।

    रमेश सोनी जी ने अपने हाइकु में अंग्रेज़ी शब्दों का प्रयोग करके हाइकु विधा के लिये नया रास्ता खोला है। अंग्रेज़ी मिश्रित हिन्दी के आधुनिक प्रचलन में ये पाठकों द्वारा पसन्द किया जाएगा। रमेश सोनी जी आगे भी हाइकु जगत को समृद्ध करते रहें, इसके लिए हार्दिक शुभकामनाएँ!

ऋता शेखर ‘मधु’

बंगलुरू 

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‘अक्षरलीला’ हाइकु संग्रह- रमेश कुमार सोनी

भूमिका-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

ISBN:978-93-6423-264-7

पृष्ठ संख्या - 111, मूल्य - 340/-₹

अयन प्रकाशन-नई दिल्ली

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हाइकु-समीक्षा


      व्यापक जीवन अनुभवों की 'अक्षर लीला'

                       

         समीक्षक-डॉ. शिवजी श्रीवास्तव 

 


      'अक्षर लीला' श्री रमेश कुमार सोनी का नवीन हाइकु-संग्रह है, इसके पूर्व उनके दो हाइकु- संग्रह- 'रोली अक्षत' और 'पेड़ बुलाते मेघ' प्रकाश में आ चुके हैं। श्री सोनी हिंदी साहित्य की अनेक विधाओं में सृजनरत तो हैं ही साथ ही वे पर्यावरणविद भी हैं,पर्यावरण संरक्षण हेतु किए गए कार्यो के लिए उन्हें राज्य स्तर पर कई बार सम्मानित भी किया गया है। कवि स्वभावतः संवेदनशील होते हैं, प्रकृति के प्रति अनुराग भी व्यक्ति की संवेदना को सघन करता है,स्वाभाविक ही है कि श्री सोनी जी के हृदय में संवेदना एवं भावाकुलता  अत्यंत सघन है। भावों की यह सघनता उनकी रचनाओं में अनेक रूपों में देखी जा सकती है। उनके समस्त रचना-संसार में उनकी यह प्रवृत्ति  ही विविध रूपों में प्रतिबिम्बित  देखी जा सकती है, उनका यह नवीन हाइकु -संग्रह उसी भावाकुल प्रवृत्ति की एक कड़ी है। इस संग्रह के प्रारम्भ में प्रसिद्ध साहित्यकार श्री रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' जी द्वारा 'रमेश कुमार सोनी का अनुभव संसार' शीर्षक से लिखा हुआ परिचयात्मक आलेख संग्रह की विशिष्टता को सिद्ध करता है।

       'अक्षर लीला' के समस्त हाइकुओं को कवि ने चौदह शीर्षकों में विभाजित किया है। इनमें प्रकृति है, घर -परिवार हैं, तीज-त्यौहार हैं, समसामयिक समस्याएँ हैं और जीवन -जगत के दार्शनिक प्रश्न हैं।  प्रकृति के प्रति स्वाभाविक अनुराग संग्रह के  हाइकुओं में सहज रूप में अभिव्यक्त हुआ है।हाइकु अपनी प्रकृति से ही  प्रकृति की  कविता है अतः सोनी जी के हाइकुओं में उनके प्रकृति प्रेम को स्वाभाविक रूप से अभिव्यक्ति के अनेक अवसर मिले हैं।'अक्षर लीला' में प्रकृति अपने विविध रूपों के साथ उपस्थित है। हिंदी कविता में प्रकृति चित्रण के जितने रूप मिलते हैं सोनी जी के हाइकुओं में भी प्रकृति के लगभग समस्त रूप चित्रित हैं, उनमें प्रकृति का यथातथ्य चित्रण हैं, उसके अलंकारिक, उपदेशक और मानवीकरण-रूप भी विद्यमान हैं। रमेश सोनी जी प्रकृति के जिस रूप का चयन करते हैं,उसका अत्यंत सहज  बिम्ब उपस्थित करते हैं। उदाहरण के लिए नदी तट पर पेड़ के नीचे पानी पीते हुई एक चीते का एक स्वाभाविक चित्र दृष्टव्य है -

नदी का तट / पानी पी रहा चीता / पेड़ की छाँव।

       ठीक इसी प्रकार एक और सहज चित्र देखा जा सकता है -

झूमे सैलानी / बर्फबारी जो हुई /बाज़ार गर्म।

       यद्यपि प्रकृति के सहज और स्वाभाविक सौंदर्य को को कवि ने अनेक हाइकुओं में अत्यंत सहज रूप में चित्रित किया है, पर उसमें साथ-साथ वे आलंकारिकता और कलात्मकता का स्पर्श भी देते चले हैं। वर्षा का एक बिम्ब है, जब वर्षा की प्रथम फुहार धरा को भिगोती है तो मिट्टी से जो सोंधी महक उठती है उसे कवि ने विलक्षण उपमा प्रदान की है -

पहली वर्षा / खुली इत्र की शीशी / महकी मिट्टी।

     वर्षा होने पर इत्र की शीशी खुलने की उपमा सर्वथा अनूठी और मौलिक है, ऐसे और भी अनेक बिम्ब हैं जहाँ कवि ने प्रकृति के उपादानों को नवीन उपमाओं से सुसज्जित किया है, यथा -

तीखी है मिर्च / कौन सौतन तेरी?/ जलन बड़ी।

भोर का मौन/ पाखी ने मंत्र पढ़ा / दुनिया जागी।

सन्यासी वृक्ष/ पतझड़ की ऋतु / केश लुंचन। 

    तीखी मिर्च की सौतन ढूँढना, भोर में पक्षियों का मंत्र उच्चारण करना और पतझड़ की केश लुंचन से तुलनाएँ सर्वथा नवीन हैं । इस प्रकार की नवीन उपमाओ के लिए वे लोक जीवन में व्याप्त प्रतीकों को चुनते हैं जैसे पृथ्वी द्वारा मेघ -पत्रों को बाँचना और धुंध द्वारा धूप से नेग माँगना, ये लोक जीवन के प्रचलित उदाहरण हैं किन्तु इन्होने हाइकुओं में एक अद्भुत सौंदर्य की सृष्टि कर दी है।                     

मेघों का पत्र/ बाँचती रही पृथ्वी/हरित भाषा।

धूप के द्वारे/धुंध हठीली खड़ी/  नेग माँगती।

    प्रकृति के माध्यम से विविध मानवीय मनोभावों की अभिव्यक्ति भी सोनी जी के हाइकुओं में अत्यंत स्वाभाविक रूप में व्यक्त हुई हैं। यथा-

धूप ने चूमे /टमाटर के गाल/गुस्से में लाल।

 लू महारानी/ गश्त पर निकली / सन्नाटा फैला।

     विषयों की भाँति रमेश सोनी जी के हाइकुओं की भाषा में भी विविधता है,भाषा में व्यंजना है, प्रतीकात्मकता है आलंकारिकता है, इसके साथ ही लोक जीवन में प्रचलित अंग्रेजी शब्दों के प्रयोग हैं। इस वैविध्य ने संग्रह के हाइकुओं को जीवंत बनाते हुई लोक मन के निकट स्थित कर दिया है। मुहावरों और लोकोक्तियों के सार्थक प्रयोग भी उनकी भाषा में विद्यमान है। कुछ हाइकु दृष्टव्य हैं -

शेखी बघारे/काँटों बीच गुलाब/जेड प्लस में। 

पेड़ों के पंछी / ऑर्केस्ट्रा सुनाते हैं / भोर -साँझ में 

बेटी विदाई/साथ ले जाती घर /मकान बाकी।

धर्म जो लड़े /जातियाँ उग आयीं/सत्ता की भाषा।

मेघों का स्कूल/ बूंदो की पूरी छुट्टी/सावन हँसे।

गाँव के मेले/पीपल पंखा झेले/ खुश बटोही।

       कवि एक पर्यावरणविद भी है अतः स्वाभाविक रूप से पर्यावरण की चिंता भी उनके हाइकुओं में विद्यमान है। संग्रह के चौदह भागों में 'प्रदूषण का दर्द' शीर्षक से एक भाग है जिसमें पर्यावरण संबंधी हाइकु ही हैं। इसमें विकास के नाम पर कटते जंगल , बढ़ते पॉलीथिन के प्रयोग, पराली का जलना, पटाखों के प्रयोग इत्यादि से बढ़ते प्रदूषण की पीड़ा और चिंता साफ देखी जा सकती है-

वन जो कटे  / ग्लेशियर भी टूटे /धरा उबली।

वन डरते / विकास की कुल्हाड़ी / गर्दन काटे।

प्लास्टिक-कूड़ा / हरियाली निगले / धरा कूकर।

खतरे बड़े / पॉलीथिन कचरा /कभी न सड़े।

विकास पथ /यात्री को छाँव कहाँ /ठूँठ बाकी हैं।

    इन सब चिंताओं के मध्य कवि निराश नहीं है उसे नई पीढ़ी से उम्मीद है, उसे उम्मीद है कि बच्चे ही प्रकृति को बचाएँगे-

 धरती खुश/ बच्चे पौधा रोपते/उम्मीद जिन्दा। 

    पर्यावरण की चिंता के साथ ही अनेक सामाजिक /सांस्कृतिक चिंताओं से भी कवि मन व्याकुल है। वर्तमान में झूठ का साम्राज्य फल-फूल रहा है, सत्य एकाकी एवं उपेक्षित सा है इस तथ्य को कवि ने हाइकुओं में अत्यंत गंभीरता से चित्रित किया है 

सच संत सा / झूठ रंगीला बड़ा / चले तनके।

झूठ का मेला / सच, बचके लौटा / एंटीक पीस।

       युद्धों की विभीषिका भी वर्तमान का बड़ा अभिशाप है।युद्ध का परिणाम सदैव विनाशक ही होता है,युद्ध स्वयं में गूंगा-बहरा होता है वह किसी प्रश्न के उत्तर नहीं देता। आश्चर्य तो यह है कि युद्धों की आवश्यकता का कारण लोग शांति की स्थापना बताया करते हैं। मानवता के आधार स्तंभ विद्यालय, अस्पताल भी जब युद्ध में नष्ट होते हैं तो गम्भीर संकट उपस्थित होता है, इसके दुष्परिणामों को कोई नहीं बताता,ऐसी अनेक  चिंताओं के हाइकु भी संग्रह में विद्यमान हैं-

कसूर पूछे / स्कूल अस्पताल भी /युद्ध गूंगा है। 

लाशों के ढेर / शांति वार्ता बेमानी / जिंदगी हारी।

       इन सबके साथ ही घर -परिवार, रिश्ते नाते, मेले बाज़ार, सभी उनके हाइकु के विषय हैं। उदाहरण के लिए पिता और माँ के इन हाइकुओं में सहजता, आत्मीयता और परिवार के स्नेह के अत्यंत स्वाभाविक चरित्र को देखा जा सकता है।

 बच्चों की जिद / घोड़ा बनते पिता / घर चहके।

 माँ परोसती / भोजन संग प्यार / ढाबे में 'बिल'।

         प्रकृति से लेकर जीवन -जगत और घर -परिवार तक की दुनिया के जितने हाइकु 'अक्षर लीला' में संकलित है वे कोरी कल्पना की उपज नहीं है वे सभी हाइकु कवि के जीवन अनुभवो से निःसृत हैं, उनमें कल्पना उतनी ही है जितनी काव्य सौंदर्य हेतु अनिवार्य है। अतः यह कहना समीचीन होगा कि यह संग्रह कवि के अनुभव संसार की 'अक्षर लीला' है।

डॉ. शिवजी श्रीवास्तव-गौतम बुद्ध नगर, उ.प्र.

Email-   shivji.sri@gmail.com

Mobile-   9557518552

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हाइकु-संग्रह ‘अक्षर लीला’-रमेश कुमार सोनी 

भूमिका-रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

अयन प्रकाशन दिल्ली, संस्करण - प्रथम, 2025

पृष्ठ-112,मूल्य-340/-₹

ISBN: 978-93-6423-264-7

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अक्षरलीला-समीक्षा

हाइकु के इंद्रधनुषी रंग-अक्षरलीला


     चिरकाल से अनश्वर परमपिता परमेश्वर की दिव्य लीला साहित्यकारों का वर्ण्य-विषय रही है। वेदों से लौकिक साहित्य तक मनोरम प्रकृति ने कवियों ,साहित्यकारों के मन को आकर्षित किया और हरे-भरे वन, वृक्ष, लताएं, पुष्प, पर्वत, नदी-नद, सागर, खेत-खलिहान कविताओं, लेखों में आ विराजे। मानवीय प्रकृति की प्रेम, दया, करुणा आदि संवेदनाओं ने भी साहित्य में प्रचुर रस-वर्षण किया है। ऐसी ही परम्परा का निर्वहन करते हुए इस अक्षरलीला को अपनी काव्य-कृति 'अक्षरलीला' में अपनी हाइकु रचनाओं के माध्यम से प्रसिद्ध हाइकुकार श्री रमेश कुमार सोनी जी ने उपस्थित किया है। 'रोली अक्षत' ,और 'पेड़ बुलाते मेघ' के उपरान्त हिन्दी में यह कवि का तीसरा हाइकु-संग्रह है। छत्तीसगढ़ी में 'गुरतुर मया' हाइकु-संग्रह' भी प्रकाशित हो चुका है ।

     प्रकृति हाइकु की प्राण है। अनेक वर्षों से हाइकु-साधना में रत कवि का वर्ण्य-संसार व्यापक है। यदि विवेच्य 'अक्षरलीला' की बात करें तो विषयवार-14 उपशीर्षकों में विभक्त पुस्तक में कवि ने 'पाखी का सरगम' सुनाते-सुनाते भोर, साँझ, सूरज, हिम से ढकी पर्वत शृँखलायें, नदी, झील आदि के बहुत सुन्दर दृश्य उकेरे हैं। ग्राम्य-जीवन को तो जैसे साकार ही कर दिया है। कुछ उदाहरण द्रष्टव्य हैं- 

भोर-साँझ में /रश्मियाँ फाग खेलें/ नभ रँगते।पृ.17

खेत गा उठे/ बैलों की घंटी-संग/ किसान राग।पृ.17

भोर में घाट/ घर-घर के किस्से/ बड़े बातूनी।।पृ.19

     ठंडी झील से डरा बाल सूरज है। हिमकिरीट पर हीरे जड़ती रश्मियाँ, उजालों का प्रहरी दीप, खड़फड़ी बजाती बरदी, चाँद को देखता चाँद अपने अनुपम सौन्दर्य के साथ उपस्थित हैं। इनसे भी परे कविमन की राष्ट्रभक्ति धारा में हमारा राष्ट्रीय ध्वज कुछ ऐसे दिखाई पड़ता है- 

भोर केसरी / नदी की श्वेत धारा/ हरी वसुधा।पृ.18

      सचमुच माँ भारती की इस छटा पर मन बलिहार। नदी, झील, गुलाब, भ्रमर, तितली, पुरवा, भित्ति टँगे उपले और माँ के डैनों में छिपे बच्चों के दृश्यों के बीच भारतीय-दर्शन का दिग्दर्शन कराते हाइकु उल्लेखनीय हैं। जीवन की साँझ कैसी होनी चाहिए  और जीव जीवन की क्षणभंगुरता जानते हुए भी कैसा आचरण करता है-

झरी पत्तियाँ /मोक्ष की राह चलीं/ भजन गाती ।पृ.25

तारों पे पाखी/धूप सेंकने बैठे/ताके शिकारी।पृ.22

     'खरगोश फुदके' तथा 'धूप का स्वाद' वन्य-जीवों और फलों, सब्जियों की आकृति-प्रकृति का मोहक, मनरंजक वर्णन करती हाइकु रचनाओं से सज्जित है- 

गाजर खाने/ खरगोश फुदके/ दाँत दिखाके ।पृ.29

धूप ने चूमे/ टमाटर के गाल/गुस्से में लाल।पृ.37

     यूँ तो वर्षा का सौन्दर्य शब्दातीत है किन्तु कवि की लेखनी ने 'अक्षरलीला' में पहली वर्षा की सुगंध, वर्षा में नहाते पक्षियों की मस्ती, मेघ के छौने,तड़ित, जोगन नदी के जीवन्त दृश्यों के साथ कुछ ऐसा कहा कि मन अहा!अहा! भी कह उठा और आह भी - 

रश्मियाँ हँसी/ मेघों के पीछे खड़ी/ इन्द्रधनुष।पृ.42

 मेघ सावनी/पायल बजा झूली/ झूमती घाटी।पृ.43  तथा 

किसी की देह/ सावन भिगोता है/ किसी के नैन।पृ.42

     'धुंध की माया' के व्याज से शीत ऋतु के सुन्दर दृश्य दृष्टिगोचर होते हैं-

वन सुन्दरी/ कोहरे में सजती/ओस नहाती।पृ.51

     दूसरी ओर ग्रीष्म भी कुछ कम नहीं, पूरी प्रखरता के साथ विद्यमान है-

नौतपा धूप/ प्रचंड गर्मी वेश/ जेठ की माया।पृ.52

     प्रकृति के प्रति प्रेम से भरी,उसके सौन्दर्य में रमी कवि की दृष्टि से 'प्रदूषण का दर्द' भी छिपा नहीं है। वह साहित्यकार ही क्या जो अपने परिवेश के प्रति संवेदनशील न हो। सजग कवि कहते हैं-

जलते खेत/ मिट्टी, हवा पूछते/ कैसे बचोगे ? पृ.59

     कटते वन, पॉलीथीन, जलती पराली, तेज ध्वनि में संगीत बजाते डीजे, यहाँ तक कि हत्यारा मांझा कुछ भी कवि की दृष्टि से अगोचर नहीं है। 'पेड़ की बात' में कवि अपने मन का तंज कुछ इस तरह कहते हैं कि पेड़ निस्पृह भाव से पत्थरों के बदले भी फल-फूल देते हैं, छाया देते हैं लेकिन अपने साथी के कटने पर मौन क्यों रहते हैं-

पेड़ स्वार्थी हैं/साथी के कटने से / चुप रहते।पृ.64

     'प्रेम नगर की स्मृतियाँ' तो प्रेम के रंग में कुछ ऐसे रँगी हैं कि सहृदय पाठक का मन भी सतरंगी हो जाए। प्रेम ही तो है जो मन को वासंती कर देता है या रच जाता है हाथों पर मेहंदी बनकर-

पत्र उनका/ वासंती हुआ मन/ महकी बेला।पृ.71

मन की बातें/ मेहंदी बन रचीं/ प्रीत महकी।पृ.72

   और तो और प्रेम की गली जाकर तो वक्त भी ठहर जाता  है-

तुम्हें जो देखा/ वक्त ठहर गया/प्रेम नि: शब्द।पृ.72

     कवि का मन प्रकृति में रमा तो रमा ही रह गया ऐसा भी नहीं है। पुस्तक में समाज की संवेदनाओं से स्पंदित रचनाएँ भी प्रचुरता से उपलब्ध होती हैं । कवि की सजग लेखनी ने अपने चारों ओर घटती घटनाएँ देखीं और उनके आनन्द तथा पीड़ा को अपने हाइकुओं के माध्यम से अभिव्यक्त किया। कुछ दृश्य देखिए-

बच्चे शर्माते/टूटे दाँत छिपाते/ चिढ़ते-रोते।पृ.77

मां परोसती/ भोजन संग प्यार/ढाबे में बिल। पृ.78

मुस्काते बँटी/ प्रतीक्षा की कुनैन/ वृद्धाश्रम में। पृ.82

     पुस्तक में पिता पर बहुत सुन्दर, मनभावन हाइकु हैं। सामान्य रूप से समाज में स्त्री की दशा और दिशा पर विचार करें तो विगत की अपेक्षा चित्र कुछ सुधरता प्रतीत होता है। शिक्षा, खेल, विज्ञान, कला, साहित्य प्राय: सभी क्षेत्रों में आज की स्त्री नए कीर्तिमान स्थापित कर रही है। लेकिन कवि की दृष्टि केवल यहीं नहीं रुकी, उन्होने देखा आज भी-

मायके लौटी/प्रश्न उछल पड़े/घर सहमा।पृ.80

   पुस्तक में समाज का रंग-बदरंग चेहरा, जाति-धर्मगत वैमनस्य, युद्ध और भूख की विभीषिका, भ्रष्ट सिस्टम की पर्त उधेड़ती सशक्त हाइकु रचनाएँ हैं तो उत्सवधर्मी भारत के त्योहारों के सरस, सुन्दर, मनभावन रंग भी हैं। निराशा कवि का मन्तव्य नहीं। उन्हें विश्वास है कि दर्द भी महकेगा। नन्हें जुगनू अपनी दीप्ति से मंजिल तलाश ही लेंगे -

काँटों के बीच/ दर्द महक उठा/ खिला गुलाब।पृ.110

मशाल लिए/ जुगनू दल खोजते/ घर अपना।पृ.110


     अधिक क्या कहूँ  'अक्षरलीला' का सम्पूर्ण रसास्वादन तो पढ़कर ही किया जा सकता है। निश्चय ही पुस्तक सुधी सहृदयजनों के बीच प्रचुर स्नेह और सम्मान प्राप्त करेगी। 

मंगलकामनाएँ !

                              

डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा 

वापी, गुजरात

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अक्षरलीला (हाइकु-संग्रह)- रमेश कुमार सोनी

भूमिका-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ 

पृष्ठ-112, मूल्य-340/-₹ 

ISBN: 978-93-6423-264-7

अयन प्रकाशन-नई दिल्ली 2025

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प्रकृति के गूँजते शब्द


प्रकृति के गूँजते शब्द 


     कविता किसी कवि के परिवेश की अनुभूति से उपजी संवेदनाओं का शब्दांकन है। कविता कभी छोटी या बड़ी नहीं होकर उस संवेदित घटना की तीव्रता पर निर्भर करती है। यदि इसका प्रभाव गहरा है तो कविता में ज्यादा शब्दों की आवश्यकता होती है। कई बार ज्यादा शब्दों पर अनुभव और शब्दशक्ति भारी होती है मुझे इस संग्रह में ऐसा ही अहसास हुआ। 

     वर्तमान समय से जूझती हुई कविताओं का दौर जल्द सिमट जाता है क्योंकि वक्त उसी तीव्रता से करवटें लेता है। प्रकृति वाद की कविताओं को स्थायित्व मिलता है ये हर दौर की पसंद होती हैं। किसी व्यक्ति की साहित्यिक चेतना की तीव्रता उसकी कविताओं में दृष्टिगोचर होती है। 

     सुदर्शन रत्नाकर की कृति ‘प्रकृति के स्वर’ को बाँचते हुए मुझे लगा कि इनमें आज के दौर की कविता जैसा प्रकृति का सौंदर्य है, संदेश देने से बचती हुई एवं शब्द चयन में वरिष्ठता झलकती है। इनमें आशावाद और मानवीकरण का समन्वय भी है। आइए इस संग्रह की 102 कविताओं को परिवेश में झाँकने का प्रयास करें। 

     ‘अलबेला चाँद’ कविता में जीवन की लंबाई के बनिस्बत उसकी गुणों की महत्ता रेखांकित है। जिस तरह चाँद यहाँ कम समय के लिए ही उपस्थित होकर सबको मोह लेता है वैसे ही जीवन से अपेक्षा है-

प्रहरी बन देता है पहरा 

उजाला फैलाकर 

अलबेला यह चाँद 

जीवन है छोटा-सा 

फिर भी, मधु से भर देता 

अवनि और अम्बर।

     ‘वह सूरज’ कविता संभावनाओं की अभिव्यक्ति है साथ ही यह हमें प्यार में झुककर ही प्राप्त करने को दर्शाता है। यहाँ आशावादी प्रवृत्ति की सुंदर झलक भी है। 

कल फिर आएगा 

कल फिर बिखेरेगा 

किरणें 

मेरे घर की मुँडेर पर 

वह सूरज जो रोज़ आता है 

चिड़ियाँ चहचहाएँगी 

स्वागत में 

मंगल गीत गाएँगी 

सूरजमुखी खिलेगा 

वशीभूत हो प्यार में 

सिर झुकाएगा।

     ‘अरुणोदय’ कविता में भोर की सुंदरता का मानवीकरण है, हमारे जीवन में ऊर्जा का संचरण भी करता है। कर्म का संदेश इसमें निहित है कि जीवन है तो उगना और अस्त होना लगा ही रहेगा। 

हो रहा हैं अरुणोदय 

भोर ने आँचल समेटा 

पाँवों में लगा महावर 

उषा दुल्हन बन आई है 

माथे पर सूरज टीका 

किरणों ने चूड़ियाँ छनकाई हैं 

रथ पर होकर सवार 

दिनकर बाहर आए हैं 

आलस्य छोड़, पक्षियों ने 

मंगल गीत गाए हैं।

     ‘जल परियाँ’ कविता बारिश के सौंदर्य का मानवीकरण है। इस दृश्य को कवि की कल्पना का आलम्बन मिला है, अनुभूति यहाँ प्रकट हुई है। 

उतर रहीं आसमान से 

पहन पैंजनिया 

सखियों संग मिल 

तीज गातीं 

छपक-छपककर 

झूम-झूमकर धरती को नहलातीं 

पेड़ों से छनकर, 

उतर रहीं

जल बूँदें, मनभावन बूँदें।

     ‘साँझ की वर्षा’ में बूँदों का संगीत के साथ ही विरहिणी की सिसकी से तपस्वी को अंतर्ज्ञान प्राप्ति का अभिलेख है। ‘लहरों के रंग’ में लहरों को आपने सहेलियाँ की स्पर्धा और उनकी क्रीड़ा का अद्भुत वर्णन किया है। ‘भोर की समीर’ कविता में भोर का साहित्यिक दृश्य है। वायु का शिशुरुप और प्रभात योगिनी का ध्यानमग्न होना हम सबके मन को आनंदित करने के लिए पर्याप्त है। 

प्रभात की वह योगिनी लगती, 

ध्यानमग्न हो मंद समाए 

कस्तूरी-सी छुअन लिये वह, 

हर कोना महकाने आए।

सांसों में रच जाए चुपचाप, 

कुछ कहे न, बस मन हुलसाए।

     ‘रंगों की दुल्हन’ में ऋतुराज बसंत की छटाएँ बिखरी हुई हैं जिसका प्रकृति के साथ हम सबको प्रतीक्षा होती है। फूलों के महकने से लेकर भौरों के इतराने तक मदनोत्सव सबको अपने रंग में सराबोर कर लेता है। 

आई रंगों की दुल्हन !

झूम उठे बाग-बगीचे 

हर शाख है लहराई 

बजी प्रेम की बांसुरी 

मन में मस्ती है छाई।

भीनी-भीनी-सी मादकता 

हर दिल को है भायी 

देख सौन्दर्य धरा मुस्काई 

ऋतु वसंत है आई।

     ऐसे ही भाव लिए कविता ‘प्रकृति का रंगोत्सव’ का प्रेम पाश मधु रस लुटाने आया है। पहाड़ भी इस उत्सव में शामिल होने से अपने आपको नहीं रोक पाए। 

पर्वत के उत्तंग शिखर पर 

सूर्य ने किरणों का 

जाल फैलाया है 

रंगरेज ने 

बांध लिया प्रेम पाश में 

चहूँ ओर सोना बिखराया है 

पहन पीताम्बर 

पर्वत भी इठलाया है।

     ‘सर्दी की धूप’ सबको सुहाती है इसकी तुलना नई दुल्हन से हुआ है जो गपशप करती हुई पेड़ों की फुनगी पर जाकर साँझ को दस्तक देती है। 

सर्दी की धूप 

छुई मुई-सी थोड़ी देर बैठी 

मुँडेर पर, फिर 

उतरी धीरे-धीरे, लजाती हुई।

छुए धरा के पाँव 

थपथपाया, दुलार से तपाया 

ढकी छाँव-धूप ने आँचल से।

     ‘आशावादी’ और जीवन के पहलुओं को रेखांकित करती हुई कविता ‘संहार और सर्जन’ में कवि ने संहार को सर्जन की जन्मदात्री कहा है। 

वृक्षों ने पीले वस्त्र उतार दिए हैं 

नई कोंपलों ने किया है 

उसका स्वागत।

पक्षी चहचहाने लगे हैं, 

पीली दूब ने सिर उठाना शुरु 

कर दिया है

कह रही हों जैसे-

हर चुनौती को स्वीकार करो 

संहार है तो सर्जन भी है 

मिटने के बाद ही कुछ 

प्रतिलिपित होता है!

     ‘प्रकृति के स्वर’ से शब्दों की यह यात्रा इसके दृश्यों को पाठकों तक पहुँचाने में सफल रही है। क्लिष्टता एवं बनावटीपन से दूर विशुद्ध प्राकृतिक सकारात्मक बिम्बयुक्त कविताएँ सबको पढ़नी चाहिए। इस संग्रह की कविताओं  में सहजता देखी जा सकती है। ये कविताएँ किसी प्रकार का कोई उपदेश नहीं देती, भाषा सहज और सरल है। 


रमेश कुमार सोनी

रायपुर, छत्तीसगढ़

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प्रकृति के स्वर, कविता संग्रह- सुदर्शन रत्नाकर 

ISBN: 978-93-6423-538-9

अयन प्रकाशन-नई दिल्ली, 2025

मूल्य-340/-₹, पृष्ठ-116

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रोली अक्षत 2004


      रोली अक्षत मेरा प्रथम हिंदी हाइकु-संग्रह है जो सन 2004 में प्रकाशित हुआ था। यह छत्तीसगढ़ का भी प्रथम हिंदी हाइकु-संग्रह है। 
      इसकी समीक्षाएँ यथासमय प्रिंट मीडिया में प्रकाशित हुई हैं ऐसी ही दो समीक्षा को डिजिटलाइज करते हुए आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ। 
     इसके साथ ही मैं हाइकु समीक्षक द्वय को इसके माध्यम से धन्यवाद सहित अपनी श्रद्धाजंलि अर्पित करता हूँ-

1
देखन में छोटे लगे
(बिजनौर टाइम्स उ.प्र.)

     प्रमुख हिन्दी कवि बिहारी द्वारा रचित दोहों के बारे में यह उक्ति प्रसिद्ध हैं-

सत सैया के दोहरे ज्यों नावक के तीर।

देखन में छोटे लगे, घाव करें गंभीर ॥

     बिहारी के एक-एक दोहे में जो अर्थ कूट-कूटकर भरा है, उसे प्रगट करने के लिए साधारण कवियों को कई पंक्तियाँ लिखनी पड़ेंगी, तब भी वह प्रभाव नहीं आ पाएगा।

     हिन्दी के जाने माने कवि कहानीकार एवं स्तंभलेखक रमेश कुमार सोनी का एक हाइकु संग्रह ‘रोली अक्षत’ मेरे सामने है। इसका प्रकाशन वैभव प्रकाशन, रायपुर छत्तीसगढ़ द्वारा सन-2004 में किया गया था। वैसे लेखक ने पुस्तक की एक प्रति उसी वर्ष मुझे भेज दी थी तो भी अब तक मैं उसकी समीक्षा नहीं लिख पाया। हाइकु एक सरल छंद है, जिसके केवल तीन चरण होते हैं। पहले और तीसरे चरण में पाँच-पाँच अक्षर दूसरे चरण में सात अक्षर। कुल सतरह अक्षर। यद्यपि हाइकु का आकार इतना छोटा है तो भी सफल रचनाकार उसके माध्यम से अपने अनुभूत यथार्थ की सशक्त अभिव्यक्ति अत्यंत सुंदर ढँग से कर सकता है। बिहारी के दोहों के समान। उसमें लोकमंगल की भावना भी आ जाए तो सोने में सुगंध ।

     वैसे तो हाइकु मुक्तक छंद है। अतः एक-एक हाइकु का अपना स्वतंत्रता अस्तित्व है पर कोई-कोई हाइकुकार हाइकु रचनाओं में प्रबंधात्मकता का भी थोड़ा बहुत निर्वाह करते हैं। रमेश कुमार सोनी ने अलोच्य संग्रह को कई शीर्षकों के अंतर्गत बाँटा है। एक-एक शीर्षक के अंतर्गत आने वाले हाइकु पदों में हल्का संबंध भी जुड़ गया है। एक-एक भाव को अधिक पूर्णता प्रदान करने में यह रीति सहायक हुई है। लोरी कहानी खंड की रचनाओं में नारी के पुत्री, पत्नी, माँ तीनों रूपों को वंदनीय मानते हुए लिखा है-

ना दूध कर्ज/ना लोरी, ना कहानी/कैसे चुकाए।

     ममतमयी माता अपनी संतान को दूध पिलाकर लोरी गाकर, कहानी सुनाकर बड़े प्रेम व वात्सल्य के साथ पालती पोसती है पर क्या संतानें इसका कर्ज चुकाती हैं? जो संतान पढ़ लिखकर जितना उच्च पद पाती है, वह माता से उतनी ही दूसरी पर बस जाती है। माता यदि विधवा भी बन गयी तो?

विधवा हुई/मौत की परछाई/जीने न पाई।

     लेकिन फैशन के नाम पर जिस्म की जो नुमाइश होती है, उससे कवि समझौता नहीं कर पाते।

कैसी साजिश/जिस्म की नुमाइश/तेरी ख्वाहिश।

     आज हम देखते हैं जाति, धर्म और राजनीति, भाषावाद और प्रांतवाद आदि के नाम पर जनसमूहों में विद्वेष पनप रहा है। दुनिया के विभिन्न भागों में बम विस्फोट हो रहे हैं। बच्चों, महिलाओं सहित निरपराध जनों की हत्याएँ हो रही हैं। कवि का आह्वान है-

मन का मोल/चले रेलम पेल/बिना सिग्नल।

     इसमें शब्दालंकार और अर्थालंकार का कैसा अच्छा संयोग हुआ है। दहेज की कुप्रथा कैसे लड़कों को भी संकट में डालती है इस पर कहते हैं-

दूल्हा बेचारा/शादी के बाजार में/लाचार मर्द।

और नई दुल्हन की स्थिति देखिए-

नई दुल्हन/बड़ी है उलझन/केंद्रीय जेल।

     समाज में व्याप्त घने अंधकार के चंगुल से उसे कैसा नेतृत्व मुक्त कर सकेगा? इस पर उनका हाइकु है-

शूल से यारी/पौरूष और यौवन/ज्योतिर्गमय।

     नेतृत्व करने वाले ऐसे युवा है, जिनमें समाज के लिए कष्ट सहन करे और प्राण तक न्यौछावर करने का साहस हो। हमारे देश की यह हालत है। नब्बे वर्ष पार कर जाने पर भी विधानसभा और संसद की कुर्सी का मोह छूटता नहीं, फिर साहसी, निस्वार्थ युवक कैसे आगे आएँ? हमारी अंधेर नगरी का हाल देखिए-

सब लुटेरे/किससे लड़ें-बचें/सभी अपने।

     जब ये पंक्तियाँ लिखी गईं, तब 2जी स्पेक्ट्रम, कॉमनवेल्थ गेम्स, आदर्श सोसायटी घोटाला जैसे पदबंध सुर्खियों में नहीं थे। कहते हैं, अधिकार दिए नहीं जाते लिए जाते हैं,कवि का आह्वान है-

छीन लीजिए/निज हिस्से की रोटी,/ऐसे ना मिले।

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के.जी.बालकृष्ण पिल्लै-तिरुवनंतपुरम 

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2

जीवन में सुख-दुःख का एहसास कराता हुआ हाइकु संग्रह "रोली अक्षत"     

     "रोली अक्षत" श्री रमेश कुमार सोनी का प्रथम हाइकु संग्रह है। इस हाइकु संग्रह के प्राक्कथन में कवि ने वर्तमान जीवन की अवदशा तथा उस संदर्भ में अपनी मानसिकता को व्यक्त करने के लिए अपने हृदय के मार्मिक उद्‌गारों को "रोली अक्षत" हाइकु संग्रह में व्यक्त किया है। "रोली अक्षत-हाइकु जगत में रहे अक्षत" शीर्षक के अंतर्गत शंभूशरण द्विवेदी "बन्धु" ने सोनी के हाइकुओं पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। श्री द्विवेदी जी को इस हाइकुकार से आशा है, अतः स्पष्टतः कहा है -"हाइकुकार के रूप में  रमेश कुमार सोनी का यह हाइकु संग्रह हिन्दी जगत में अपना विशिष्ट स्थान भी बनाने में समर्थ होगा। इसकी इंद्रधनुषी छटा पाठकों को आकर्षित करेगी।" "अर्चना की थाली में सजे रोली अक्षत शीर्षक अंतर्गत डॉ. सुधा गुप्ता ने भी सोनी की रचनाधर्मिता को सराहा है।"

      "रोली अक्षत" हाइकु संग्रह में कवि ने विविध शीर्षकों के अंतर्गत जीवन के विविध भावों को रेखांकित करने का सफल प्रयास किया है। नारी के प्रति कवि का दृष्टिकोण उदात्त रहा है, क्योकि नारी हर रूप में महान है। अतः कवि ने प्रारंभ में ही कहा है-

नारी, बहन/पुत्री, पत्नी, रूप है/वंदनीया।

     कवि जीवन में हर हाल में निराशा को भूलकर आशा भरे जीवन की कामना करता है अतः स्पष्टतया कहता है-

मन यौवन/पिघला दे पत्थर/यही पौरुष।

     अंधेरी नगरी में आज के राजनीतिक जीवन की अवदशा का चित्र प्रस्तुत करते हुए कवि ने सच ही कहा है-

चौपट राजा/अंधेर नगरी है/ भ्रष्ट शासन।

     शायद इस कारण ही देश आज अत्यंत दयाजनक स्थिति से गुजर रहा है-

ऑफिस बाबू/साहब चपरासी/आतंकवादी।

      आज की शैक्षणिक व्यवस्था पर करारा व्यंग्य करते हुए कवि ने सच ही कहा है -

गुरु महिमा / किधर है गरिमा /धन महिमा।

"एक भारती" में कवि का देशप्रेम व्यक्त हुआ है-

तुझे नमन/वतन हिन्दुस्तान/हर्षित मन।

"सियासत का खेल" का व्यंग्य देखिए -

पैसे जिनके/सरकार उनकी/हम पराये।

     इस प्रकार रोली अक्षत में श्री रमेश कुमार सोनी ने जीवन और प्रकृति के अटूट संबंध को व्यक्त करके अपने दिल की धड़कन को वाणी दी है। जब भी कोई बात दिल से निकलता है, तब वह चोट भी पहुँचाता है। अतः इन हाइकुओं में प्रभाव क्षमता की भावना बेजोड़ है।

प्रा. मुकेश रावल-आणंद 

अध्यक्ष,हिन्दी विभाग-आणंद आर्ट्स कॉलेज, 

आणंद, गुजरात 

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रोली अक्षत, हाइकु संग्रह, रमेश कुमार सोनी, 

प्रकाशक-वैभव प्रकाशन, रायपुर (छ.ग.), 2004

मूल्य 100/- रुपये

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(साहित्य वैभव अंक 3 मई-जुलाई 2005 रायपुर में प्रकाशित पृष्ठ-50)







हिन्दी हाइकु-संग्रह, अक्षरलीला

अक्षरलीला— लघु छंद में विराट अनुभूति

     साहित्यकार रमेश कुमार सोनी की लेखनी ने छत्तीसगढ़ी व हिंदी में लेखन के क्षेत्र में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। रोली अक्षत (2004) तथा पेड़ बुलाते मेघ (2018) के बाद उनका तीसरा हाइकु संग्रह- ‘अक्षरलीला’ मेरे हाथ में है।

      रमेश कुमार सोनी हिंदी और छत्तीसगढ़ी भाषा में हाइकु, ताँका, सेदोका छंद को लोकप्रिय बनाने में अग्रणी रहे हैं। हिंदी हाइकु को पारंपरिक ढाँचे से बाहर निकालकर उसे छत्तीसगढ़ी भाषा और लोकसंस्कृति से जोड़ने वाले वे पहले रचनाकार हैं। ‘गुरतुर मया’ उनका छत्तीसगढ़ी हाइकु संग्रह है। उनकी कविताएँ जीवन, प्रकृति, समाज, पर्यावरण जैसे मुद्दों पर संवेदना व्यक्त करती हैं।

     रमेश कुमार सोनी की रचनाओं में लघु छंदों के माध्यम से प्रकृति और समाज के साथ ही पारंपरिक और लोकभाषा संगम की अनूठी भूमिका देखने को मिलती है। वे भाषा और शैली में नवाचार लाते हुए विविध भावनात्मक पक्षों को हाइकु की मर्यादा में समेटने में सक्षम रहे हैं। 

     14 उपशीर्षकों में विभाजित 'अक्षरलीलालघु छंद में विराट अनुभूति का संग्रह है। सोनी जी का अनुभव संसार कितना व्यापक है, प्रतिष्ठित साहित्यकार रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ की सूक्ष्म अंतर्दृष्टि से पता चलता है।

     रमेश कुमार सोनी का हाइकु संग्रह ‘अक्षरलीला’ विषयवस्तु की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध और विविधता से भरा हुआ है। इस संग्रह में जीवन के अनेक रूपों की सूक्ष्म झलकियाँ है, जो तीन पंक्तियों में हाइकुकार के पूरे अनुभव संसार को समेटने की कला को दर्शाती हैं। लेखक ने गाँव की सादगी और शहर की चहल-पहल, दोनों को संवेदनशील दृष्टि से देखा है—कहीं खेत की हरियाली है, तो कहीं शहरी भीड़ में खोती संवेदना।

     प्रकृति, ऋतुएँ, पेड़-पौधे, पक्षी, बारिश, धूप—इन सबको हाइकु के माध्यम से चित्रित करते हुए, सोनी जीवन के हर उस क्षण को पकड़ते हैं जो अक्सर हमारी व्यस्तता में अनदेखा रह जाता है। उनके हाइकु में मौसम की करवटें सिर्फ जलवायु परिवर्तन नहीं, बल्कि मन की अवस्था का रूप भी बन जाती हैं।

     इन हाइकुओं में जीवन के छोटे-छोटे दृश्य हैं—चूल्हे की आँच, नदी के किनारे की चुप्पी, स्कूली बच्चों की आवाज़, पतझड़ में झरते पत्तों की साँसें—जो पाठक को सीधे अनुभव के केंद्र में ले जाते हैं। ‘अक्षरलीला’ के हाइकु सिर्फ पढ़े नहीं जाते, वे महसूस किए जाते हैं।

     इनकी विशेषता यह है कि हर हाइकु एक चित्र है। वह चित्र जीवन की एक पूरी कथा को अपने भीतर समेटे होता है। गाँव से शहर, ऋतु से मनोदशा, और प्रकृति से आत्मा तक की यह यात्रा,अक्षरलीला’ को केवल एक हाइकु संग्रह नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन की लघु लेखनी बना देती है।

भोर का मौन/ पाखी ने मंत्र पढ़ा/ दुनिया जागी (1)

     पहला हाइकु ही प्रकृति के माध्यम से प्रात:कालीन जागरण की एक सूक्ष्म, भावपूर्ण छवि रचता है। पहली पंक्ति एक शांत क्षण की स्थापना करती है। भोर का मौन चेतना के जागरण से ठीक पहले का ठहराव है—जहाँ सारा जगत अभी नींद और जागरण के संधि-काल में है। यह मौन बहुत कुछ कहता है। यहाँ ‘पाखी’ प्रकृति का पहला पुजारी बन जाता है। उसकी चहचहाहट को कवि ने “मंत्र” कहा है, जिससे पक्षी का स्वर एक पवित्र, जाग्रत करने वाला अनुष्ठान बन जाता है। अंतिम पंक्ति में क्रिया और परिणाम आता है। पक्षी के मंत्र की गूँज से दुनिया जागती है। यह संवेदना और चेतना के स्तर पर भी एक जागरण है।

     यह हाइकु प्रकृति और मानव जीवन के अंतर्संबंध को अत्यंत सूक्ष्म, सौंदर्यपूर्ण और प्रतीकात्मक ढंग से प्रस्तुत करता है। तीन पंक्तियों में एक पूरा दृश्य, एक चेतना और एक संदेश समाहित है। यह कविता पाठक को न केवल सुबह का दृश्य दिखाती है, बल्कि उसे भीतर से जागृत भी करती है।

खेत गा उठे/ बैलों की घंटी संग/ किसान— राग। (5)     

     खेत गा उठे यह मानवीकरण है, जिससे खेत मानो किसान के श्रम के साथ स्वयं संगीत रचने लगते हैं। यहाँ ध्वनि का बिंब अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। बैलों के गले में बँधी घंटियाँ केवल संगीत का स्रोत नहीं, बल्कि श्रम के आरंभ की पुकार हैं। यह ध्वनि परिश्रम की पहचान है, एक लोक-ध्वनि, जो केवल कानों में नहीं, मन में गूँजती है। यह खेत, बैल और किसान के बीच की त्रयी को जोड़ती है।

     तीसरी पंक्ति इस हाइकु को एक संगीतात्मक और सांस्कृतिक ऊँचाई पर ले जाती है। ‘किसान-राग’ कोई स्थापित शास्त्रीय राग नहीं, बल्कि किसान के श्रम, पसीने, संघर्ष और आशा का राग है। यह राग प्रकृति से उपजता है—जिसमें मिट्टी की सोंधी गंध, बैलों की चाल, और मानवीय श्रम की तपिश शामिल है।

     रमेश कुमार सोनी ने अपने संग्रह में नवीन प्रयोग भी किए हैं—

शेखी बघारे/ काँटों बीच गुलाब/ जेड प्लस में। (53)

 काँटों के बीच गुलाब ऐसा है, जैसे उसे जेड प्लस सुरक्षा मिली है। 

तितली उड़ी/ ग्लोबल सिटीजन/ प्रकृति जाने। (81)

 तितली को कवि ने ग्लोबल सिटीजन कहा है।

कवि ने मृगी को ट्रेनर माना है—

छौने उछले/ मृगी चौकस खड़ी/ ट्रेनर अच्छी। (7)

 कवि ने बाज को पैराग्लाइड करते देखा है—

नभ में बाज/ पैराग्लाइड करे/ योग में मग्न। (18)

 दर्पण के सामने गौरैया का बच्चों सा ठुमकने का दृश्य मनभावन है—

दर्पण देख/ गौरैया ठुमकती/ बच्चों के जैसी। (46)

 आज के युग की भयावह तस्वीर दिखाता यह हाइकु है— 

फ्रिज सहमा/ चालीस टुकड़ों का/ गवाह बना। (70)

     सोनी के इस हाइकु संग्रह के सभी हाइकु भाव भाषा से समृद्ध हाइकु हैं। जीवन, समाज, प्रकृति का कोई भी रंग उनकी लेखनी से छूटा नहीं है। आशा है पाठक को यह संग्रह पसंद आएगा।

रश्मि विभा त्रिपाठी

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अक्षरलीला (हाइकु-संग्रह): रमेश कुमार सोनी, पृष्ठ: 112, मूल्य: 340 रुपये, ISBN: 978-93-6423-264-7, प्रथम संस्करण: 2025, प्रकाशक: अयन प्रकाशन, जे- 19/39, राजापुरी, उत्तम नगर, नई दिल्ली— 110059

समीक्षा


चिरैया की ख़ुशी में चहकते हाइकु

     जापानी साहित्य की विधा हाइकु, अनुभूतियों के शब्दांकन की सघनता का काव्य है जो-5,7,5 यानि 17 वर्णों की तीन पंक्तियों में लिखी जाती है। यह एक सम्पूर्ण कविता है। काव्यसौन्दर्य की परिपूर्णता के साथ ही शिल्पगत अनुशासन किसी हाइकु के प्राण है। इसके संकेतों में रचे गए दृश्य पाठकों के समक्ष स्पष्ट रुप से खुलते हैं। किसी क्षण विशेष के अहसास को साहित्य की इस विधा में रचना कड़ी साधना की अपेक्षा रखता है। 

     अपनी संवेदनाओं को हाइकु में रचने, विषय की कोई बाध्यता नहीं है यह लोकजीवन की किसी भी अन्तर्सम्बन्धों में रचा जाता है जिसमें प्रकृति प्रमुख है। इस संग्रह में हाइकु की कुल संख्या-345 है जो 20 विविध उपखण्ड में वर्णित हैं। ये हाइकु उमेश महादोषी द्वारा मार्च 2020 के पूर्व के लिखे हुए हैं जो रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ की प्रेरणा एवं मार्गदर्शन से प्रेरित हैं। परिवेशगत परिस्थितियों से आपमें उपजी आत्मचेतना की वैचारिक फसल ‘चूँ चूँ चिरैया’ के रुप में प्रस्तुत हुआ है। साहित्य की विविध विधाओं में रचने और संपादकीय दायित्व निभाने के बाद आपका यह पहला हाइकु संग्रह आया है। 

      रिश्तों में सबसे बड़ा स्थान माँ का होता है और इसका कर्ज़ कोई कभी नहीं चुका सकता। मॉं, आज के परिवेश में भी सर्वोपरि है। माँ पर साहित्य में बहुत कुछ लिखा जा चुका है इसमें हाइकु भी पीछे नहीं है। माँ की ममता सभी योनियों में एक समान सी है। इन दो हाइकु में माता की महत्ता को सुंदरता से रेखांकित किया गया है-

बैठी गौरैया/मुँडेर पे ताकती/चोंच में धागा।

माँ की चुप में/कविता-सा कुछ है/मानो सच में।

     उम्मीद आज के दौर में सबसे अहम है इसके दो रुप इन हाइकु में देखने को मिलता है। कागज़ की नाव का पार होने की उम्मीद (प्रतीक) मेहनत की बैशाखी पर निर्भर है वहीं नीम के नीचे धूप का सरपंच की तरह बैठने की चाहत, धूप की सरपंची ज़िद है-

हो न हो आज/कागज की नाव भी/होगी ही पार !

नीम तले, रे!/धूप चाहे बैठना/ज्यों सरपंच !

     राजनीति में आज सब जायज़ माना जाने लगा है धीरे-धीरे तमाम ऐब इसमें स्वीकार होने लगे हैं। शुचिता और उम्मीद क्रमशः क्षीण होने लगे हैं ऐसे में ये हाइकु बहुत कुछ अर्थ लिए प्रस्तुत हुए हैं-

तीनो बन्दर/हो गये एकाकार/कुर्सी पै बैठ !

नशे में तख्त/भींचती आवाम है?मुट्ठियाँ सख्त !

     हाइकुकार की कल्पना में उसका गाँव हाइकु विधा में उतर आया है जहाँ सब आदर्श है। नीम की छाँव(सुख) दोनों स्थानों यानि आम और बबूल के गाँव में है जो उसकी समतामूलक दृष्टि को प्रदर्शित करती है-

नीम की छाँव/आम और बबूल/दोनों के गाँव!

     डॉक्टर इस कलियुग में भगवान के जैसे माने जाते हैं जिसे उन्होंने कोरोना काल में दिखाया भी है। आज  ई.एम.आई. के दौर में जब कर्ज़ हावी है हॉस्पीटल और उपकरण क्रय करने में; तब उसके चुकारा के लिए मरीजों की जेब की ओर निहारा जाने लगा है जो इस व्यवस्था को कलंकित करता है। ऐसी ही नकरात्मता के भाव को दर्शाता हुआ ये हाइकु दृष्टव्य है-

काँटे-सी चुभे/जेब पै दृष्टि तेरी/पीर क्यों घटे !

इन्द्र बेचता/दधीच की हड्डियाँ..../डॉलर पाता !

     यादें हर किसी की अमानत हैं जो हमें अनायास ही अपनी दुनिया में खींचकर सुख-दुःख का अहसास ज़िंदा कर देती हैं। यादें,अकेलेपन की दोस्त हैं जो हमारी धरोहर होती हैं। हाइकु में यादों के भाव को पिरोना यानि इसे सहेजना ही है-

कभी तुम थे/आज तुम्हारी यादें/स्वप्न हमारे !

आग बरसी /झुलसी कल्पनाएँ/बचीं वो यादें !

     प्रकृति के पास सौंदर्य का अकूत खज़ाना है उसे अनुभूत करने और शब्दांकित करने का माद्दा सभी विधाओं में मौजूद है लेकिन हाइकु की लघुता उसमें चार चाँद लगा देती है। आपके हाइकु में मानवीयकरण है तथा इसके बिम्ब का चयन सर्वथा नवीन है-

ताल-तलैया/वर्षा की मार खा-खा/उफने भैया !

गुलाब खिला/आँगन में सूरज/ठुमुक रहा।

खिले चाँदनी/गमलों में नभ के/बिहँसे घनी !

घूमता शीत/ले हाथ में बन्दूक/काँपती धूप !

सूरज झुका/अँजुरी भर पानी/नदी का पिया।

      प्रदूषण से संपूर्ण विश्व त्राहिमाम कर तो रहा है लेकिन इससे बचने के लिए वह आधुनिक विकास का चोला पहने हुए है। प्रकृति के पास बदला लेने के अलावा कोई विकल्प शेष नहीं है। प्रदूषण विविध रुपों में हमें हानि पहुँचा रही है लेकिन इंसान इससे बचने की सोचता कहाँ है? प्रदूषणों के हाहाकार को दर्शाते हुए ये हाइकु अच्छे हैं-

वर्षा के हाथ/तेजाब भरा ज़ाम/पौधों के नाम।

वन की आग !/बुझाने आये इसे/जल कहाँ से !

रेत ही रेत /और एक नदी है?स्वप्न या सच !

     डर का बाज़ारीकरण और इस हेतु तैयार उत्पादों के विज्ञापन में फँसा व्यक्ति इससे उबरने की जुगत में कितना सफल और कितना असफल होता है  यह उसकी अपनी कूबत होती है। डर सदैव से खौफ़नाक रहा है और इसकी आड़ में जीवन का संघर्ष और सत्ता की बुनियाद रखी जाती रही है। वर्तमान समय में डर सर्वत्र विद्यमान है तब ये हाइकु समीचीन लगते हैं-

फूल भी जब/बम-सा है दिखता/जग हिलता।

आँखों में भरा/झरता रहा डर/कितना सहा।

     युद्ध के वैश्वीकरण और सीमाओं तथा व्यापार के अंधे लोभ ने ना तो बस्ती देखी ना जंगल, बच्चे देखे ना मानवता सब नष्ट करके विजेता जैसा सत्ता सुख भोगने की चाह को बलवती बना दिया है। युद्ध का कोई नतीजा नहीं होता बल्कि यह बदले की बीज बोकर एक और युद्ध को पालता-पोषता है ऐसे ही भावों को पुष्ट करते हैं ये हाइकु-

आग तू जला/और हवा भी बहा/नतीजा बता !

बोयी जाती है /बीज में आग जब/होता है युद्ध !

           विषय वैविध्य और अनुपम बिम्ब का प्रयोग आपके हाइकु को स्थापित करते हैं। यह आपका प्रथम हाइकु संग्रह है जो आपकी संभावनाओं को दर्ज़ करती हैं। यह हाइकु आपके भीतर की समतामूलक भाव को व्यक्त करती है कि किसी भी स्थिति में प्रेम का दामन नहीं छोड़ना चाहिए-

प्रेम न सही/प्रेमियों की तरह/मिलो तो कहीं !

मेरी शुभकामनाएँ


रमेश कुमार सोनी

रायपुर, छत्तीसगढ़

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चूँ चूँ चिरैया-हाइकु संग्रह, उमेश महादोषी

ISBN:978-93-341-0141-6 

प्रकाशन-स्वयं 2024, मूल्य-100₹, पृष्ठ-88




समीक्षा

पीपल वाला घर’ बहुत मायने रखता है


     आदरणीय रमेश कुमार सोनी का कविता- संग्रह ‘पीपल वाला घर’ मिला। पर्यावरणीय जागरण और प्राकृतिक संरक्षण के प्रति गहन संवेदना से ओत- प्रोत कविताएँ पढ़ीं। कवि का प्रकृति के प्रति लगाव भी इन कविताओं में रचा-बसा है।

     संग्रह का शीर्षक ‘पीपल वाला घर’ बहुत मायने रखता है। यह भारतीय संस्कृति में पीपल का महत्त्व तो बताता ही है, प्रतीक रूप में प्रकृति की जीवनदायी शक्ति का आभास भी कराता है। पीपल का वृक्ष वह शरण स्थली है, जहाँ जीवन का संचार होता है, तो सोचिए जिसने पीपल को शरण दी है, वह पीपल वाला घर अर्थात् प्रकृति क्या मायने रखती है?

     जापानी साहित्य विधाओं को छह संग्रह समर्पित कर चुके साहित्यकार रमेश कुमार सोनी छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मण्डल व अन्य संस्थाओं के साथ मिलकर पर्यावरण संरक्षण हेतु प्रयास किए हैं, जिसके लिए उन्हें राज्य स्तर पर कई सम्मान प्राप्त हुए हैं। अपने इस प्रथम काव्य- संग्रह में विगत 20 वर्षों की अपने पर्यावरणीय जागृति अभियानों के दौरान हुई अनुभूतियाँ पाठक को उन्होंने इस उद्देश्य के साथ  सौंपी हैं कि उनमें चेतना जगा सकें। कवि का कथन है कि पर्यावरणीय असाक्षरता ने हमें भारी सजा दी है। केवल चर्चा- वार्ता से कुछ नहीं होगा, हमें व्यावहारिक होना होगा, तभी हम बरी हो पाएँगे। हमें प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण जीवन जीने की कला सीखनी ही होगी।

     डॉ. अनिता सावंत (छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मण्डल) ने इस संग्रह की भूमिका में कवि के साहित्यिक धर्म के साथ प्रकृति के प्रति उनके धर्म से भी हमारा परिचय कराया है कि वे कागज पर अपनी कलम चलाते हुए केवल पर्यावरणीय समस्याओं पर बात ही नहीं करते हैं, बल्कि उनके समाधान के लिए धरातल पर सक्रिय रूप से कार्य- व्यवहार भी करते हैं। वे साहित्य को पर्यावरण की दिशा में एक प्रेरक बल के रूप में उपयोग कर पाठकों में संचेतना और सक्रियता बढ़ाते हैं।

     आज पर्यावरणीय संकट दुनिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। मानवजनित गतिविधियाँ पर्यावरण संतुलन को बिगाड़ रही हैं। इस असंतुलन के परिणामस्वरूप पृथ्वी पर जीवन संकट में आ गया है। संग्रह की 51 कविताएँ न केवल इस संकट को व्यक्त करती हैं, बल्कि प्रकृति की ओर लौटकर उस संकट से बचने का उपाय भी बताती हैं।

     संग्रह की पहली ही कविता ‘खुशियाँ रोप लें’ जीवन में प्रकृति का महत्त्व बताती है। प्राकृतिक चक्र में बँधे प्रकृति के शांतिपूर्ण वातावरण में जीते पशु- पक्षी प्राकृतिक चक्र से छूटे मनुष्य की स्थिति बताते हैं—

पक्षियों का झुंड/ शाम ढले ही लौट आया है... / गाय लौट रही है गोधूलि बेला में/ रोज की तरह रंभाते हुए/ क्या आपने कभी इनका विराम देखा?.../

कुछ लोग नहीं लौटे हैं/ अस्पताल से वापस,

इस स्थिति में मनुष्य को मनुष्य ने ही पहुँचाया है प्रकृति का हद दर्जे का शोषण करके—

हवा-पानी बिक रहा है/ नदियों के ठेके हुए हैं.../ साँसों की कालाबाजारी में—/ ऑक्सीजन का मोल महँगा हुआ है। (पृष्ठ 15)

     मनुष्य के किए की कीमत मनुष्य को ही चुकानी पड़ रही है। जीने के लिए सबसे जरूरी है— हवा-पानी। उसे भी बेचा जा रहा है, ऐसे में कैसे जिन्दा रहा जाए? परन्तु प्रकृति के इस हद दर्जे के शोषण के बाद भी—

आज भी लोग/ कटते हुए पेड़ों पर चुप हैं/ प्लास्टिक के फूल बेचकर खुश हैं/ बहुत से बचे-खुचे हुए लोग/ मोबाइल में पक्षियों की रिंगटोन्स से। (पृष्ठ 16)

     असली फूल, पेड़-पौधे, पंछी यानी प्रकृति को बचाने की चिंता किसी को नहीं, जबकि इन्हीं से जीवन खिलता, महकता, चहकता है। कवि इन्हीं खुशियों को रोपने का सभी से आग्रह करते हैं। कवि धरती माँ की दशा पर दुखी हैं कि जो कल सोने की चिड़िया थी, रत्नगर्भा थी, आज—

     आज मुझे वो मिली है-/ जहरीली हवाओं की दमघोंटू साँस/ और अम्लीय वर्षा की चिंता लिए/ सीना छलनी हुआ/ बोरवेल से छिद्रित आँचल का दर्द लिए/ पानी के घूँट को तरसती/ सीने में ज्वाला धधकाती/ ओजोन की फटी छतरी ओढ़े/ विषैले कचरों का बोझा ढोए (पृष्ठ 19)

     मनुष्य ने धरती को जिस दशा में पहुँचाया है, इससे धरती कुपित है और मनुष्य उसे मनाने के लिए वैश्विक चर्चा कर रहा है। और कवि—

इन सबसे दूर/ मैं पेड़ लगाते हुए/ अकेले बुला रहा हूँ/ लौटे हुए परिंदों को... / इस उम्मीद के साथ कि/ एक दिन कारवाँ जरूर बनेगा/ एक दिन जरुर ये नादान लोग/ शिकायत नहीं रहने देंगे कि—/ धरा: कौन जाने दर्द तेरा। (पृष्ठ 21)

     ऊँची उड़ान भरती एक छोटी— सी चिड़िया हमारे सपनों में पंख लगा देती है। यह सब देखना कितना सुखद है मगर आज मुश्किल से कोई पक्षी भूले- भटके आसमान में उड़ता दिखाई देता है। कवि को विलुप्त हो रहे इन्हीं पंछियों की चिंता है—

इन दिनों सुन रहा हूँ/ आखिरी उड़ान का गीत/ ‘चल उड़ जा रे पंछी कि—/ अब ये देश हुआ बेगाना...’/ और इसी तरह एक दिन/ पूरा खाली हो जाएगा मेरा आसमान। (पृष्ठ 29)

     कवि बाजारवाद की चपेट में आई नदी की दशा देखकर व्यथित हैं—

नदियों ने बसाईं सभ्यताएँ/ सभ्यताओं से उपजे बाज़ार/ और बाज़ार की वस्तुएँ हो गईं—/ एक-एक कर सारी नदियाँ। (पृष्ठ 36)

वे नदी को बचाने का अनुरोध करते हैं—

हम सबको बचाना होगा—/ अपने भीतर की नदी को/ तभी बच पाएगी— कोई नदी/ हमारी विलुप्तता से पहले। (पृष्ठ 37)

     अगली कविता प्रगति और उपभोक्तावादी संस्कृति की आलोचना करती है—

लोग बोतलबंद आम आर्डर कर रहे हैं

     प्रगति आम के बगीचों वाली दुनिया से बहुत दूर ले गई और उपभोक्तावाद ने आम के बगीचों में बाजार खोल दिया। प्रकृति जो सबकुछ हमें मुफ्त में देती थी, अब उन सब वस्तुओं की बाजार बोली लगा रहा है।

     अमेजन और फ्लिपकार्ट मुस्कुरा रहे हैं/ यही एक दिन बेचेंगे भाड़े में हमें—/ छाया, आसरा, घोंसला, सुकून और.../ जैसे बिक रही है हवा और पानी बोतलों में!/ कितना पैसा है आपके पास इसे खरीदने को?

     अपने जीवन का खोया हुआ वास्तविक सुख भी क्या आज हम खरीद पाएँगे? जो कभी हमें निःशुल्क मिलता था। कवि खोए हुए उसी वास्तविक सुख का पता बताते हैं—

आइए लौट चलें प्रकृति की ओर कोई/ प्रतीक्षा में है आपके ही गाँव में। (पृष्ठ 86)

     अगली कविता में कवि का पीपल के साथ आत्मिक जुड़ाव है—

सोचता हूँ कि यदि यह पीपल न होता तो/ कैसे आते अतिथि/ कैसे आतीं मुझ तक चिट्ठियाँ...

     पहले ये पेड़ हमारी पहचान थे, आज खुद ही गुमनाम हैं। लेखक का ‘पीपल- सा विश्वास’ इस पहचान को बनाए रखना चाहता है। उसे भावी पीढ़ियों के लिए बचाकर रखना चाहता है।

कुछ बरगद और कुछ पीपल/ ताकि इसकी निडर छाया में फिर लौट सकें—/ कुछ गौरैया और बगुले जैसे बच्चों की बरदी; (पृष्ठ 109)

     अगली कविता में प्रकृति से दूर हुए शहरी लोगों की मनःस्थिति का चित्रण है जो पहले तो प्रकृति के स्वाभाविक रूप को नियंत्रित कर जीवन में अप्राकृतिक अव्यवस्था बनाते हैं और फिर अपनी यंत्रवत् दिनचर्या से तंग आकर प्राकृतिक शांति और स्वाभाविक सुख ढूँढने निकलते हैं—

आखिरकार एक दिन/ शहर ने सुना ही दिया कि-/ इनकी सेवा-सुश्रुषा करो/ आब-ओ-हवा बदल दो, दुआएँ करो/

अब ये प्लास्टिक के पहाड़ जैसे लोग/ गाँव में अपना घर ढूँढ रहे हैं— / नदी किनारे, जंगल के पास (पृष्ठ 126)

     संग्रह की सभी कविताएँ समकालीन समाज के लिए एक चेतावनी हैं। आज जब पर्यावरणीय संकट हमारे समाज को विकट परिस्थितियों की ओर ले जा रहा है, ऐसे में हमें चेताते हुए पर्यावरण रक्षार्थ सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता का एहसास कराता यह संग्रह प्रासंगिक है। पर्यावरणीय चेतना को जागृत करता यह संग्रह साहित्य और समाज दोनों के लिए महत्त्वपूर्ण है।

इस संकटकाल में ‘पीपल वाला घर’ हमें याद दिलाता है कि यदि हमें भविष्य में जीवन की सुरक्षा चाहिए, तो हमें प्रकृति की शरण में जाना होगा।

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समीक्षक- रश्मि विभा त्रिपाठी

आगरा, उत्तर प्रदेश

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पीपल वाला घर’ (काव्य- संग्रह): रमेश कुमार सोनी, पृष्ठ: 129, मूल्य: 200 रुपये, ISBN: 978-81-19292-90-5, प्रथम संस्करण: 2023, प्रकाशक: जिज्ञासा प्रकाशन (ओ. पी. सी.) प्रा. लि., ई- 86, स्वर्ण जयंती पुरम, गाज़ियाबाद- 201002 (उ. प्र.)

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गॉफ के साये में


हाइकु का घनेरा साया

           हिंदी हाइकु देश की सीमाओं को लाँघते हुए वैश्विक स्तर पर अपनी लोकप्रियता का डंका पीट रहा है। कई देशों से हिंदी हाइकु के एकल संग्रहों का प्रकाशन इसका प्रमाण है। हाइकु के वामन विस्तार से हम सभी गौरवान्वित हैं। ऐसा सब सम्भव हुआ है सोशल मीडिया के प्रचार-प्रसार से, ‘हिंदी हाइकु’ इसका सशक्त पटल है। इसने कइयों को हाइकु लेखन के प्रति आकर्षित किया और उन्हें निखारा। विगत दशकों से एकल और साझा संग्रह,अनुवाद, विशेषांक एवं समीक्षा ग्रंथ से होते हुए हाइकु ने विश्वविद्यालयों के शोध एवं पाठ्यक्रम में अपना दखल सुनिश्चित किया है। हिंदी हाइकु अपने निर्धारित फ्रेम-5,7,5 यानि 17 वर्ण में तीन पंक्तियों की पूर्ण कविता है। यह क्षण मात्र की अनुभूतियों को सृजित करने की मुश्किल विधा है जिसमें भाव एवं विचारों की अभिव्यक्ति होती है। इस जापानी विधा का पूर्णतः हिन्दीकरण हो चुका है अतः अब यह अपनी विषय सीमाओं को लाँघकर मानवीय संवेदनाओं पर भी केंद्रित हो रही है। 

      समीक्षित कृति ‘ग़ाफ़ के साये में’ -डॉ. नितीन उपाध्ये (UAE) का सद्यः प्रकाशित हाइकु संग्रह है। आप पेशे से मेकेनिकल इंजीनियर हैं आप लिखते हैं- 

जमा रहा हूँ/पीपल जैसी जड़ें/परदेस में। 

दूर करता/एक-एक डॉलर/मातृभूमि से। 

आप पर कई साहित्यिक विद्वानों की संगत का प्रभाव पड़ा जिसने आपकी आनुभूतिक चक्षुओं को प्रखर किया। भूमिका में डॉ. जगदीश व्योम लिखते हैं कि- ‘कविता लिखने के लिए शब्दों का जोड़-तोड़ ही नहीं, कुछ और भी जरूरी है। यद्धपि 'कुछ और' को परिभाषित कर पाना सबसे कठिन है। …..'कुछ और' की पूँजी जिस रचनाकार के पास जितनी अधिक होगी, कविता का फलक भी उतना ही विस्तृत होता चला जाएगा। 'कुछ और' में- लोक जीवन से जुड़ाव, प्रकृति के प्रति सहचार्य का भाव, वस्तुओं को देखने की सूक्ष्म और वैज्ञानिक दृष्टि, मनोविज्ञान की समझ आदि-आदि न जाने कितना कुछ समाया हुआ है।’ 

      बढ़ती हुई दुनिया में सिमटते परिवारों की व्यथा किसी से छिपी नहीं है। अपेक्षाओं के बोझ तले सिसकते रिश्तों की आवाज़ दूर तक सुनाई देती है। खून के रिश्तों की गर्माहट को कम आँकते हुए बढ़ते वृद्धाश्रम एवं अनाथालय काफ़ी कुछ कहते हैं। सोशल मीडिया के इस बुरे दौर में रिश्तों के पास अपनों के लिए समय नहीं है यह घोर चिंताजनक है। आपके ज्यादातर हाइकु माँ और पिताजी की स्मृतियों तथा संघर्ष पर केंद्रित हैं। 

घर दफ़्तर/यही पिता की यात्रा/चार धाम की। 

उठा है बच्चा/अब वक़्त कटेगा/दादा-दादी का।

खुली खिड़की/आने लगी घर में/दुनिया सारी। 

द्वारे रंगोली/तुलसी पर दीया/घर में है माँ। 

     इन दिनों बढ़ते व्यभिचार से तमाम लोग हलाकान हैं व्यवस्था की पोल खोलते हुए अपराध और नैतिकता को अपने ठेंगे पर रखे अपराधियों पर ये हाइकु कड़ी चोट करते हुए प्रस्तुत हुए हैं- 

काली निगाहें/कपड़ों के भीतर/रेंगती रही। 

हजारों गिद्ध/लाखों चमगादड़/एक चिड़िया। 

     हमारी प्रकृति हम सब की पालनहार है इसका सौंदर्य प्रत्येक ऋतु में निखरते रहता है। इन ऋतुओं के अपने अलग त्यौहार हैं जो उमंग फैलाते हुए जीवन को नयी आशावादी दृष्टिकोण से ऊर्जान्वित करते हैं। प्रत्येक मौसम की अपनी कहानी है जिसमें ख़ुशी की चहलकदमी है। इन हाइकु में मानवीयकरण के साथ बिम्ब और प्रतीकों का सुंदर तालमेल है-हिंडोला झूला रही पंछियों को हवा, पंछियों की पूरी छुट्टी होने,गंगा नहाके तैयार नाव एवं वसुधा का स्वर्ण लेपन करती रश्मियों की छटा निराली है-

गोदती हवा/आकाश के तन पर/मेघों के टैटू। 

छुट्टी की घंटी/चहचहाते पंक्षी/फुर्र से उड़ें। 

जलाभिषेक/करते धरा पर/मेघ-कलश। 

स्वर्ण लेपती/गंगा के तन पर/रवि रश्मियाँ। 

भोर होते ही/तैयार हुईं नावें/गंगा नहा के। 

    वैश्विक आधुनिकता की आँधी के कारण वसुधा की अकूत संपदा और सौदर्य ने इंसानों को लोभी और भोगी बनाया है। पहले हम इसके संरक्षक होते थे, हमारे बदले आहार से हमारे विचार पहले प्रदूषित हुए और फिर प्रदूषणों की सुरसा का मुँह खुल गया।  आज हमारे पास इन समस्याओं का कोई समाधान नहीं हैं- ग्लोबल वार्मिंग, ग्रीनहाउस प्रभाव, अम्लीय वर्षा, सूखा-बाढ़, प्लास्टिक, भूस्खलन, कटते वन,घटते वन्यजीव और सिसकती मृदा। पर्यटकों के बोझ से थके पहाड़, तेज़ाब की वर्षा, नदी की लाश, प्रकृति रक्षा के पैम्पलेट का कूड़ा में पाया जाना जैसे दृश्य अब विचलित करते हैं। आम जनजागरण हेतु ये हाइकु मशाल लिए निकले हैं-

आया शिकारी/जाल में फँसे छौने/चीखा जंगल। 

झुलसा गई/तेज़ाबी बरसात/कोख धरा की। 

बहती रही/शहर में आकर/नदी की लाश। 

प्रकृति रक्षा/कल छपे पोस्टर/आज कूड़े में। 

     आज के युग में मानवीय मूल्यों के ह्रास को हर अख़बारी पन्ने पर पढ़ा जा सकता है। इसकी चिंता सबको है लेकिन समाधान सिर्फ कहने-सलाह देने तक ही सीमित है। तमाम समस्याओं के साथ सत्ता की जुगलबंदी से निकले आश्वासन अपना भरोसा खो चुके हैं। बाजार की सत्ता घरों से होते हुए जेब पर डाका डालने बैठी है और लोग हैं कि किसी भी कीमत पर बिकने को तैयार हैं ऐसे ही हाइकु के अंदाज़ देखिए-

खाली बगीचे/भरे चिकित्सालय/खाली मैदान। 

हम सामान/हम ख़रीददार/हमीं बाजार।

     आपके हाइकु में भाव एवं विचारों की स्पष्टता है। शिल्प का पालन किया गया और संवेदनाओं को पिरोया गया है। प्रेम, ईश्वर की सबसे बड़ी देन है जिसपर ये दुनिया टिकी हुई है। प्रेम जब किसी को होता है तो उसके अलावा सारी दुनिया को पहले पता चल जाता है। प्रेम-प्यार का गुड़ और तिल-तिल ज़िन्दगी मीठी ही मीठी लगती है, चाय की चुस्कियाँ अधूरी हैं तथा इसमें दो ज़िस्म एक जान होकर एकाकार हो जाते हैं-ये है इस दुनिया की बात। भारत की भक्ति परंपरा में त्याग और समर्पण को उच्च स्थान प्राप्त है जिसमें पाना यानि मोक्ष की कामना है, देह नहीं। इस प्रेम पर जितना लिखा जाए कम ही है फिर भी प्रेम के ये लिफ़ाफे खोलिए जिसे लौटाने की बात इस हाइकु में है, शायद वो आपके लिए हों-

दमक उठा/मन का कोना-कोना/तेरे जिक्र से। 

मैं,मैं न रहा/तुम-तुम न रहे/एक हो गए। 

लौटा आया हूँ/भेंट के लिफ़ाफ़े में/ उसके ख़त। 

हर सुबह/चाय की दो प्यालियाँ/तुम और मैं। 

    इस संग्रह में कुल 501 हाइकु विविध विषयों में यत्र-तत्र बिखरे हुए हैं जिनमें उपविषयों के अनुसार अलग नहीं रखा गया है जिससे पाठकों की दृष्टि बार-बार बदलते रहती है, पढ़ने की एकाग्रता टूट जाती है। ग़ाफ़ का वृक्ष UAE का राष्ट्रीय पेड़ है जिसे भारत में खेजड़ी के नाम से जाना जाता है। रचनात्मकता पूर्णतः ग्रहणशीलता पर आश्रित होती है। प्रत्येक हाइकुकार की अपनी सृजन भूमि होती है, पृथक शब्दावलियों की बगिया होती है जहाँ से उस अनुभूत दृश्य को शब्दों में पिरोने हर बार वह स्वयं को व्यक्त करता है। आपने जो कुछ विदेश में अनुभूत किया उसका सुंदर मानवीयकरण इन हाइकु में दृष्टव्य है। आप लिखते हैं- प्यासी हवाएँ मिलों ढूँढती हैं पानी, हवा को काटते उड़ते हैं रेत के कण, गॉफ के वृक्ष का भागते हुए मेघ को देखना…

गर्म रेत पे/भटके नंगे पाँव/अकेला दिन। 

नदी के बिना/समंदर कुँवारा/खाड़ी देश में। 

पके खजूर/महक दूर-दूर/दौड़ी चीटियाँ। 

     इस जीवन में सर्वत्र विसंगतियाँ ही विसंगतियाँ हैं यदि आपकी दृष्टि ही वैसी हो लेकिन ऐसा मानकर चुप भी बैठा नहीं रहा जा सकता। साहित्य को चाहिए कि वह समाज को आईना दिखाए इन हाइकु में आपने वही किया है-विद्या मंदिर की भब्यता देखकर माता शारदा का डरना जैसी टिप्पणी हमारी खोखली होती शिक्षा व्यवस्था पर करारी चोट है-

जब भी जली/राजनीति की भट्टी/भुनी जनता। 

पर्दे पे पर्दा/चेहरे पे चेहरा/सबको पता। 

राजा ने ओढ़ी/रेशम पे खद्दर/रँगा सियार। 

     चार दिन की इस ज़िन्दगी में शिकवा-शिकायत से हमें फुर्सत निकालकर इसे सँवारने में लगाना चाहिए क्योंकि ज़िन्दगी शतरंज की बाज़ी सी होती जा रही है इसमें हमें मोहरों की तरह चुनना होगा आँसू या मुस्कान। हमें अपना गिरेबाँ अपना मूल्यांकन और अपने व्यवहार कभी नहीं दिखते ऐसे ही भावों को मानवता बनाए रखने के लिए आप लिख रहे हैं-

एक अकेला/जोड़कर निन्नावे/बन जाता सौ। 

कब देखोगे/खुद का व्यवहार/मेरी दृष्टि से। 

कहते हैं जो/अपना नहीं कोई/वो किसके हैं। 

मेरी आपकी हाइकु लेखन की संभावनाओं को शुभकामनाएँ और इस संग्रह के लिए हार्दिक बधाई। 


रमेश कुमार सोनी

रायपुर, छत्तीसगढ़

मो.-7049355476

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ग़ाफ़ के साये में-हाइकु संग्रह, डॉ. नितीन उपाध्ये

सृजन बिम्ब प्रकाशन-नागपुर 2024

ISBN:978-93-91817-54-1

मूल्य-200/-₹, पृष्ठ- 128

भूमिका-डॉ. जगदीश व्योम एवं कमलेश भट्ट कमल

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मन की उड़ान

मन की उड़ान का लेखा-जोखा

      मन के विविध विचारों को केन्द्रित करते हुए शब्द देना एक बड़ी तपस्या की माँग करती है जिसे आपने इस संग्रह में बख़ूबी किया है। मन जो अति चंचल है जिसकी गति नापी नहीं जा सकती और जो विस्तृत एवं अथाह है को हाइकु जैसी सूक्ष्म विधा में रचने के लिए एक वरिष्ठ हाइकुकार की सिद्धहस्त कलम आवश्यक है। यह आपका तृतीय हाइकु संग्रह है जिसमें आपने मन विषय पर केन्द्रित विविध भावों को 1260 हाइकु में पिरोया है। यद्यपि इससे पूर्व भी मन पर लिखा जा चुका है लेकिन यह उनसे पूर्णतया भिन्न है।   

         हिंदी हाइकु का फलक अब इतना विस्तृत हो चुका है कि अब ये किसी परिचय की मोहताज नहीं है। इसका वैश्विक प्रसार भी इसके बेहतर भविष्य की ओर संकेत करता है। सत्रह वर्णों में लिखी जाने वाली यह सूक्ष्म रचना अपने आपमें पूर्ण कविता होती है, तीन पंक्तियों में यह किसी दृश्य को पाठकों के समक्ष पूर्णतया खोलती है। हाइकु अपने प्रारंभ से ही प्रकृति को मुख्य विषय मानती है तथापि इन दिनों इसे कई विषयों पर लिखा जा रहा है। मेरे अनुसार इससे लोकजीवन की विडम्बनाओं को बेहतर तरीके से उकेरा जा सकता है तभी यह साहित्य आम पाठकों में लोकप्रिय होगा।

    इन दिनों इस पर कई पत्र-पत्रिकाओं ने अपने विशेषांक निकाले हैं तथा हाइकु को अपने सामान्य अंक में भी स्थान मिल रहा है। हाइकु संग्रह अब स्थानीय बोली-भाषाओं में प्रकाशित हो चुकी है, इस पर शोध कार्य भी हुए हैं और इसके विविध भाषाओं में अनुवाद भी हो रहे हैं। प्रायः सभी हाइकुकार अपनी-अपनी कोशिशों से इसे समृद्ध बनाने में गिलहरी जैसा योगदान दे रहे हैं जो प्रशंसनीय है इन सबके केंद्र में है-‘हिंदी हाइकु का ब्लॉग’।    

        प्रत्येक हाइकुकार अपने अनुभव संसार से गुज़रते हुए जिन पंक्तियों को शब्दांकित करता है उसमें उसके परिवेश के दृश्य सशक्त रुप से परिलक्षित होते हैं। यही पंक्तियाँ आपकी संवेदनशीलता को पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करती है। प्रकृति  के सौन्दर्य का वर्णन इन हाइकु में अपने परिवेश से लेकर आसमान की ऊँचाई तक फैला हुआ है जिसमें आपके मन की उड़ान प्रतिबिंबित हुई है। भोर,साँझ,ऋतुएँ,चाँद-तारे सभी का सुन्दर चित्रांकन इन हाइकु को विशिष्ट बना रहा है। चन्दा के गाँव में चाँदनी का मुसकाना,बर्फ़ और रश्मियों का झिंगोला बुनना,पनिहारी के घूँघट पर भोर का लटकना और कूकी की कूक हमें वर्णित दृश्यों से जोड़ने में सफल रही है।    

पनिहारी के /घूँघटपट पर /लटकी भोर। 1143

बर्फ़ से सटी /बुन रही रश्मियाँ /रंगी झिंगोला। 1140

बिजुरी-पग /जो बजी पैंजनिया /नाचीं बूँदियाँ। 1152

कुंज कूकते /कोकिल किसलय /पुष्प फाग में। 1165

कूकी की कूक /दिशा-दिशा मथती /लगे क्यों हुक। 1186

चन्दा के गाँव /चाँदनी मुसकाए /तारों की छाँव। 1198

   यादें हमारी अनमोल पूँजी है जो न तो चुरायी जा सकती और ना ही खर्च की जा सकती है यह तो सिर्फ बाँटी जाती है। जब ये अच्छी हो तो मन हिरणी सी कुलाँचे भरती है और जब दुःख देने वाली हों तो हमें सबसे अकेले कर देती हैं। यह ख़ुशी और ग़म का एक ऐसा सकोरा है जिस पर मन की प्यासी चिड़िया हर फ़ुर्सत में आकर पानी पी जाती है और इस मन की बातें करते हुए हमें, उससे अनायास ही जोड़ देती है तब हम  किसी के पूछने पर कभी हँसकर टाल देते हैं तो कभी कुछ नहीं बोलकर ख़ामोश हो जाते हैं। स्मृतियाँ हमें कभी अकेले नहीं छोड़तीं यद्यपि इसका कोई भौतिक वजूद नहीं फिर भी यह मन के रथ पर सवार होकर वैश्विक दुनिया की यात्रा कर लेती है। अपनी ऐसी ही दृश्यानुभूत सुधियों को आपने सशक्त शब्दों के साथ हमारे साथ साझा किया है।    

लाँघे न जाएँ /यादों के गलियारे /अटके पाँव। 8

सुधि के गाँव /रुके मन की नाव /स्मृति के घाट। 17

यादों के घन /नयन चेरापूंजी /मन निर्जल। 19

उमर मरी /सुधियों की केतकी /हरी की हरी। 45

यादें खंगाली /खुशियों के घर में /छाई कंगाली। 85

    प्रेम का भाव मन में विशिष्ट होता है इसी के सहारे ये दुनिया चलती है। प्रेम जहाँ है वहाँ सर्वत्र शांति और विकास है लेकिन इसके दुसरे हिस्से का प्रभाव बड़ा भारी होता है जिसे वियोग कहते हैं। वैसे प्रेम की परंपरा त्याग और भक्ति के साथ जुड़कर यहाँ पवित्र हो जाती है वहीं पाश्चात्य संस्कृति में यह भोग पर समाप्त होती  है। आप लिखती हैं-मुहब्बत में डूबना इसका पहला शगुन है तथा प्रेम के अलाव में हथेलियाँ जलती है ये विरोधाभास ही प्रेम है। प्रेम में सब कुछ खोकर जीतने का सौभाग्य किसी-किसी को ही नसीब होता है। प्रेम के ऐसे ही यहाँ पर विविध भाव इन्द्रधनुषी रंगों की तरह बिखरे हुए हैं आइए इसका आनंद लें-

प्रीत की पीर /नैनों की देहरी पे /ख़्वाबों की भीड़। 210

प्रेम तुम्हारा /स्वाती बूँद प्रिय में /तृषित पिहू। 271

मिटी न पीर /इश्क़ तेरा ले डूबा /मन फ़कीर। 283

    रिश्तों का कोमल धागा हमें पिरोकर घर बनाता है जो हर किसी भी बात-बेबात पर नखरों के साथ टूट जाता है फिर यह जुड़े तो इसमें गाँठ पड़ जाती है। रिश्तों का आधार यहाँ भी त्याग एवं परहित पर टिका होता है जो आजकल अपेक्षा से उपजे उपेक्षा पर जाकर समाप्त हो जाता है। रिश्तों में माँ की महत्ता के साथ पिता एवं बेटी की भूमिका को बड़े ही सुन्दर तरीके से आपने यहाँ उकेरा है साथ की इसमें उग आई विद्रूपताओं को भी आपने स्थान दिया है। अब न्यूक्लियर फैमिली ने रिश्तों पर ग्रहण लगाया हुआ है जिससे कुछ रिश्ते विलुप्तता की सूची में हैं। पड़ोसी रिश्तों की अहमियत अब समाप्ति की ओर है जबकि बाज़ार का टैग है-विश्वबंधुत्व। ऐसे ही रिश्तों को सँभालने की गुहार लगाते हुए आपके हाइकु समाज को आईना दिखाने प्रस्तुत हुए हैं-

रिश्तों से युद्ध /हारो तभी पाओगे /निश्चित जीत। 320

चटकें रिश्ते /सिसकियाँ टहलें /कण्ठ की गली। 328

अम्मा ही जाने /रिश्तों की बाँसुरी में /फूंकना साँसे। 403

ऊबता नहीं /कोल्हू के बैल जैसा /जुते हैं पिता। 412

बेटी का रिश्ता /पीहर की मिट्टी में /गड़ी है नाल। 451

     स्त्रियों के सशक्त रुप को आपने  इन हाइकु में उकेरा है। वैश्विक बाज़ार इसे अपना ब्राण्ड बनाकर तमाम हाथों से इनकी भावनाओं से खिलवाड़ कर रहा है। स्त्रियों के मन की सिर्फ वही सुनती है जबकि उस पर सारे अपराध केंद्रित होते हैं ठीक ऐसे ही समय में आपने स्त्रियों को उसके परिश्रम से रेखांकित किया है। नारी का मन ब्रेल लिपि सा है जिसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है जैसे अनेकों बिम्ब लिए हाइकु इस संग्रह में विराजे हुए हैं। 

पहाड़ी नार /कदमों से नापती /सीना पहाड़। 498

पढ़ी ना जाए /बिना छुअन नारी /ब्रेल लिपि सी। 832

     इस दुनिया में वक़्त के साथ ख़ुशी और दुःख का अपना-अपना दौर है जिसकी अनेकों गाथाएँ हर किसी की ज़ेब से उछलते ही रहती है। आँसू की कोई ज़बान नहीं फिर भी वह अपने दर्द बयाँ करती है,साझी दीवारों की जुदा पीड़ाएँ,और इच्छाओं का मायाजाल जैसे पुष्ट भाव वाले हाइकु सुन्दर हैं-

खोला दिल ने /ग़मों का पुलिन्दा तो /खुद ही रोया। 528

साझी दीवारें /भले हो, घरों की हैं /जुदा पीड़ाएँ। 561

छोड़ो ये रोग /मेरे बारे में क्या-क्या /कहेंगे लोग। 678

इच्छाएँ भारी /जीवन के चौसर/साँसों की बाज़ी। 967

         आपके इस संग्रह के हाइकु में प्रायः तुकांत का सुंदर पालन किया है; काव्य कौशल सर्वत्र बिखरा हुआ है जिससे हाइकु प्रभावशाली हैं। गहन इन्द्रियबोध एवं आनुभूतिक विशिष्टता से सृजनात्मकता के रंग सर्वत्र बिखरे हुए हैं। ये हाइकु  यद्यपि कई अलंकारों से सुसज्जित हैं जिनमें से सभी का उल्लेख यहाँ संभव नहीं है फिर भी इन अलंकारों के प्रयोग का उल्लेख मुझे आवश्यक लगता है। पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार की अधिकता इस संग्रह के हाइकु में स्पष्ट रुप से दिखती है। ऐसे ही कुछ हाइकु देखिएगा-

स्मृतियाँ झरे/ रह-रह मन के/ दर्द हों हरे। 97

रिश्तों में तंज/ बूँद-बूँद आँसू में/ डूबें वचन। 305

अम्मा पहेली/ हँस-हँस के पीती/ पीड़ा अकेली। 402

 अनुप्रास अलंकारों से सुसज्जित इन हाइकु की छटा निराली है। वर्णों की आवृत्ति से इनके भाव और बिम्ब भी पुष्ट हैं-

ज़मीं न ज़र/ बंजारन ज़िन्दगी/ आँसू से तर। 428  

दूर देश से/ जोड़े जीवन-नाते/ उलझे खाते। 556

कुंज कूकते/ कोकिल किसलय/ पुष्प फाग में। 1165

इस हाइकु में दोनों अलंकार का अच्छा प्रयोग हुआ है-

कूकी की कूक/ दिशा-दिशा मथती/ लगे क्यों हूक। 1186

      इन हाइकु के भाव हमें आध्यात्मिक यात्रा पर लेकर चलते हैं चार दिन के इस जीवन का अंतिम सत्य मृत्यु है लेकिन इनके बीच पुण्य के साथ पुनर्जन्म की अवधारणा ने सबको संयमित जीवन की अग्रसर रखा है  यह सर्वमान्य सत्य है की हमें वर्तमान के साथ जीना चाहिए क्योंकि सबका अस्तित्व महज़ मुट्ठी भर राख से ज्यादा कुछ नहीं है मैं की और सब कुछ मेरा को समेट लेने से बचने का सन्देश देते हुए ये हाइकु सुन्दर हैं-  

न 'मैं' ही रहे /न 'हम' बन, पाए / धुँधले साए। 548

बन्दे की ज़ात /थैली भर अस्थियाँ /मुट्ठी भर राख। 1123

उलझा रहा /काया के गणित में /मन मनका। 646 

     आपने यहाँ एक नया प्रयोग इस हाइकु में किया है जिसकी साहित्यिक स्वीकृति की उम्मीद कम है इससे बचा जा सकता था। हाइकु की अधिक संख्या का इन दिनों चलन सा हो गया है जिसकी ज़द में आप भी आ गयीं। इसकी अधिक संख्या होने से कई अच्छे हाइकु के साथ न्याय नहीं हो पाता। विविध भावों के हाइकु यहाँ यत्र-तत्र बिखरे हैं इससे पाठक अपने आपको उनके साथ चलने में असहज महसूस करता है साथ ही समीक्षक के लिए भी यह एक चुनौती होती है।

दर्द तो सिर्फ़ /जीवन का १ रिश्ता /ज़िन्दगी नहीं। 805

     मन की संवेदनशीलता को हाइकु जैसी सूक्ष्म विधा में पिरोना बिल्कुल ऐसा है जैसे मन को किसी एक बिंदु पर एकाग्र कर लेना। आपने एक अच्छे विषय पर अपने हाइकु रचे हैं क्योंकि मन का पिटारा कभी खाली नहीं होता। भावों की सौष्ठता, के साथ शिल्प की सुन्दरता से इस अंक के हाइकु कला पक्ष को रौशनी मिली है। इस संग्रहणीय अंक के लिए मेरी हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ।

हरी उम्मीदें/ लिए बैठे परिंदे/ नंगे पेड़ों पे। 1257

रमेश कुमार सोनी

रायपुर,छत्तीसगढ़

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मन की उड़ान-हाइकु संग्रह, कृष्णा वर्मा 

अयन प्रकाशन-दिल्ली, 2021,मूल्य-300, पृष्ठ-136

ISBN: 978-93-91378-95-0, भूमिका-रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

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