Showing posts with label छत्तीसगढ़ी. Show all posts
Showing posts with label छत्तीसगढ़ी. Show all posts
फुलेरा की पावन महक 
     जापानी साहित्य की विधाओं में हाइकु, लोकप्रियता में अग्रणी है, ताँका एवं सेदोका इसके पीछे चलते हैं। इन विधाओं का अब पूर्णतः भारतीयकरण हो चुका है एवं हिंदी साहित्य की अन्य विधाओं की तरह इनकी साधना,लेखन, पठन… आदि प्रचलन में है। 
      सेदोका 5,7,7,5,7,7 यानि 38 वर्ण की छह पंक्तियों की पूर्ण कविता है। यह दो अपूर्ण कतौता से मिलकर ही पूर्ण मानी गयी है। वर्तमान में इसे सोशल मीडिया के विविध प्लेटफॉर्म पर पढ़ा जा सकता है; इसके साधक देश-विदेश में अपनी साधना में लगे हुए हैं। प्रमुख सेदोकाकार इस प्रकार हैं-डॉ. सुधा गुप्ता, डॉ. उर्मिला अग्रवाल, डॉ. रामनिवास मानव, रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’, डॉ. भावना कुँवर, देवेन्द्र नारायण दास, डॉ. हरदीप कौर संधू, डॉ. कृष्णा वर्मा, डॉ. सुदर्शन रत्नाकर, विभा रानी श्रीवास्तव एवं प्रदीप दाश ‘दीपक’ जिनके मार्गदर्शन में सेदोका साँसे ले रही है। ‘त्रिवेणी’ ब्लॉग में सेदोका से संबंधित जानकारी एवं प्रकाशन प्रशंसनीय रुप से लगातार जारी है। 
     श्रेष्ठ साहित्य की रचना किसी कठिन साधना से कम नहीं है। समीक्षित कृति ‘फुलेरा’ रमेश कुमार सोनी की सद्य प्रकाशित छत्तीसगढ़ी सेदोका संग्रह है जो विश्व की प्रथम छत्तीसगढ़ी सेदोका संग्रह है। इसे छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग रायपुर ने प्रकाशित किया है इसलिए अब यह छत्तीसगढ़ी साहित्य की थाती बन चुकी है। 
        समर्थ रचनाकार रमेश कुमार सोनी ने साहित्य रुपी शिव को साधने पार्वती सा साधना में लीन रहकर ‘फुलेरा’ को रचा है। आपने हिंदी एवं छत्तीसगढ़ी में समान रूप से लेखन किया है जो अनुकरणीय है। इसके पहले आपने छतीसगढी़ में हाइकु संग्रह, प्रथम छत्तीसगढ़ी ताँका संग्रह (हरियर मड़वा) द्वारा छतीसगढी़ साहित्य के विकास की संभावना को मुक्ताकाश दिया है। यहाँ परिपक्व मानवीय संवेदनाओं में बौद्धिकता है एवं  रचनात्मकता निखरकर प्रस्तुत हुई है। ऐसे ही आपके द्वारा रचित 'फुलेरा' सेदोका संग्रह शीर्षक से लेकर अंतिम सेदोका तक छतीसगढी़ के रंग में रंगी हुई है। 
      ‘फुलेरा’ सबके दिलों में सावनी तीज के शृंगार की महक व पावनता का संचार करता हुआ प्रस्तुत हुआ है। छत्तीसगढ़ में तीजा-पोरा का त्यौहार विशेष मायने रखता है इस दिन बहुएँ अपने मायके में आकर पति की लंबी उम्र की कामना का निर्जला व्रत करती हैं। मायके आना और मनचाही भेंट प्राप्त करना ख़ुशी में चौतरफा वृद्धि करती है। इस पर्व के प्रमुख पकवानों में ठेठरी-खुरमी प्रसिद्ध हैं जिसका स्वाद वर्ष भर तक बने रहता है। पोला में मिट्टी के बैल और रसोई के खिलौने बच्चों को भाते हैं। 
*तीजा-लुगरा/माहुर ल रचाए/मइके म हे नोनी/गाँव माहके/सहेली संग हाँसे/काय बोलथव ओ?
      स्वर्णिम रश्मियों से रंगी भोर को आपने सोनहा बिहान कहा है। इसके सेदोका की उजास और स्फूर्ति से यह खंड भरा हुआ है। प्रकृति और मौसम इसके केंद्रीय भाव में हैं। बसंत, सावन, पतझड़, चाँद, नदी, वन…..,पहाड़ का सौंदर्य के भाव से सेदोका पगे हुए हैं। सोनहा बिहान प्रतीक है खुशहाली का इन सेदोका में एक साथ कई बिम्ब और प्रतीक हैं। 
*मोहनी डारे/हाँसथे जी गुलाब/ममहागे बियारा/ताके बइठे/कोन घर जाबे जी?/बिजरावत हस।
*बादर बेर्रा/टार्च मारके देखे/कहाँ बरसना हे/भादो के पूरा/घर-दुआर बुड़े/बचा ले भगवान!
   नवा बिहान में चिरई संग माँ का  जागना किसी भी प्रकृति प्रेमी को जीवंत कर देगा। ये पँक्तियाँ छत्तीसगढ़ी संस्कृति और परम्परा को सुघड़ता से प्रस्तुत कर रही हैं-
*पैजेब बाजे/बिहनिया होवथे/कमइलीन दाई/बुता चिन्हथे/बिहान के चिरई/सुकवा के अँजोर।
     मौसम की बेरुखी और मानवों के लोभ को प्रकृति सहन नहीं कर पा रही है। आपने पेड़ नहीं काटा बल्कि काटी है छाँह, हवा,नमी, औषधी, फल-फूल और पक्षियों का बसेरा अब इसी के लिए आप तरस रहे हैं। प्रदूषण सर्वत्र हाहाकार मचाया हुआ है। गौ माता की सेवा से मुख मोड़ते इस समाज में वे अपने चारे के लिए भटकते हुए प्लास्टिक को आहार बनाने लगे हैं इन्ही भावों को इन सेदोका में देखिए-
*रुख के छाँव/पइसा मं बिसोय/साँस बर घलो दे/ठाढ़ होय के/पइसा गन बाबू/काबर काटे रुख।
*घुरुवा होगे/गाय के पेट घलो/प्लास्टिक निकलथे!/ चारा नंदागे/दूध नकली होगे/गोठान सुन्ना परे।
      आरुग मया-शीर्षक पढ़कर ही मन को पावनता का अहसास होने लगता है।आरुग शब्द की पावनता को कोई भक्त ही समझ सकता है। अपने ईश्वर को आरुग भाव से अर्पित करने की चाह भक्तों को जिज्ञासु व खोजी बना देता है।  छतीसगढ़ महतारी को आरुग मया समर्पित करने की आपकी इच्छा ही नही जुनून भी है,जो ‘फुलेरा’ के रूप में समर्पित हुई हैं। आरुग मया के प्रत्येक सेदोका हृदय की प्रेम तान छेड़ते लग रहे हैं। पढ़कर मन में गुदगुदी होने लगती है। मया-पिरित के छतीसगढ़ी उपादान करौंदा के समान चटकारें लगाने को मजबूर कर देता है। प्रेम के भरे इन सेदोका में बहुत कुछ समेटा हुआ है-
*मन हिरना/तोरेच्च पारा जाथे/मया कर ले कर/सुरता भारी/खोइला होगे जीव/मया बरसा देते। 
*हिरनी चाल/कनिहा म घघरी/मऊहा कस नशा/मया बगरे/ददरिया सुनाथे/तोर सांटी मयारु।
*सँझा के दीया/मोर जँवारा बारे/झुँझकुर चुँदी मं/गँवागे मन/चँदा कस चेहरा/दीया ह लजावथे।
     रिश्ता-नता के झाँपी- छतीसगढ़ की संस्कृति रिश्ता-नता के खज़ाना से  सदैव खनकती रही है। प्रभु श्रीराम के ननिहाल होने का गौरव प्राप्त यह भूमि आज भी अपने भाँचा को प्रभु श्रीराम मानकर चरण पखारता है। संबंधों का निर्वाह करने के लिए अपना सर्वस्व लुटा देने की क्षमता यहाँ है जिसे आपने यहाँ रेखांकित किया है। नववधू के स्वागत में घर का कोना-कोना महक जाता है। 
*बहू के आती/पुरखा के कुंदरा/मंदिर कस होगे/चऊँक पुरे/अँगना ले रँधनी/नवा खुशी बगरे।
  माँ की ममता, बहनों का विश्वास और पिता के स्नेह को नापा नहीं जा सकता और इसे निभने के क्षण अनमोल हैं जो जीवन को महकाते रहते हैं-
*मया नापबे?/अथाह समुंदर/दाई-अँचरा कस/बाबू के छाँव/बहिनी-राखी कस/भाई के विश्वास हे।
छत्तीसगढ़ भी अब आधुनिकता की चपेट में आने लगा है जिसका विपरीत परिणाम रिश्तों में आना स्वाभाविक ही है। रिश्तों में अब आत्मीयता की तलाश बेमानी है बल्कि कृतघ्नता अवश्य दिखाई देती है। हर कोई अपेक्षाओं की बेल पकड़े ऊँचाई पर जाना चाहता है ऐसे ही भाव लिए हुए हैं ये सेदोका-  
*कोन काखर/मतलब के गोठ/खा-पी के खसकथें /बखत बेरा/चिन्हबे नइ करे/तैं कोन की मैं कोन? 
      पहुना शीर्षक में सोनी जी ने जीवन की आसारता ओर मया -मोह का वर्णन किया है। इस खंड में उन्होनें जग की रीति को उजागर किया है। उन्होनें कहा है ये दुनिया किराया के मकान के समान है चार दिन यहाँ रहकर माटी में मिल  जाना है इसलिए इस नश्वर देह का अभिमान कैसा? 
*किराया खोली/मनखे हे पहुना/मायाजाल अरझे/ मोहिनी डारे/जदुहा हे रुपिया/दुनिया हे भोरहा।
सच-झूठ और सुख-दुःख दोनों समय के पहलू हैं जो हर किसी की ज़िंदगी से होकर अवश्य ही गुजरते हैं। जिनसे बचना कठिन होता है बल्कि इसे निभाना आसान होता है। 
सच और झूठ की तराजू में यहाँ झूठ के कई दोस्त और गवाह मिलते हैं जबकि सच को अकेले संघर्ष करना पड़ता है। खुशी का वक़्त जल्दी बीत जाता है जबकि दुःख का समय बहुत भारी और लम्बा लगता है। ऐसे ही भावों में मलाई रुपी सुख को चाँटने मुनु बिलाई को दुःख का प्रतीक बनाया है-
*खुशी के देखे/जम्मो बइहा जाथें/दुःख भुलवारथे/ झाँकत ठाढ़े/खुशी ल चाँटे बर/मुनु-बिलाई कस।
     मेला मड़ई छतीसगढ़ को मेला-मड़ई का प्रदेश कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। छतीसगढ़ की संस्कृति को सूक्ष्मता से सेदोको में पिरोकर कवि ने छतीसगढ़ के प्रति अपने प्रेम को उजागर किया है। यहाँ का किसान जाँगर तोड़ कमाता है और वैसे ही उत्सव भी दिल खोलकर मनाता है। इस हेतु गाँवों में विविध प्रकार के मेला-मड़ई निरंतर आयोजित होते रहता है।
*मेला-मड़ई/नाचा-गम्मत धरे/पीरा-भूलवारथें/रागी बजाथे/पंडवानी देखैया/अँजोर बगरथे।
पूरा गाँव छेरछेरा पुन्नी में माँदर की थाप  में झूमते रहता है। हरेली की पूजा, शबरी की भक्ति,सुआ नृत्य,रामनामी, भोजली बदना,बसदेवा का गीत, हरबोलवा की गूँज, पालो चढ़ाना, पंडवानी में रागी का हव, फुगड़ी, सोहाई-बरवाही, राउत नाचा….एवं खुमरी-भंदई। ये सब अपनी-अपनी पहचानों के साथ समवेत रुप से छत्तीसगढ़ को बनाते हैं-धान का कटोरा और यहाँ के लोगों को- छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया। 
*गाँव मताय/छेरछेरा-तिहार/दान दे के उछाह/बाँटे ले बाढ़े/खुशी,अन्न,पइसा/असीस झोंक बाबू।
छत्तीसगढ़ी ग्रामीण संस्कृति अब भी इसकी गॉंवों में साँसे लेती है जिसकी धमक सत्ता और समय दोनों को चुनौती देते रहती है। युवा पीढ़ी का दायित्व है कि वो अपनी धरोहरों पर गर्व करना सीखें तथा इसे संवारें। 
*गोदना वाली/हिरदे मं गोद दे/सीता-राम के नांव/मन रंगाही/फागुन रंग नवा/मया सुआ नाचही।
     संसो के घाम-इस खंड के के केंद्र में किसान और गाँव है। किसानों की दुर्दशा है, कर्ज़ और मौसम की मार है। सभी उपायों से हताश लोगों के लिए शोषण के खिलाफ आवाज़ उठाने की ललकार है। बँटवारे का दर्द है, अधिया प्रथा से उपजी समस्या के मूल में जाँगर ना चलाना है। मोबाइल के साइड इफेक्ट्स का भी उल्लेख है। कुल मिलाकर आपने सेदोका साहित्य के द्वारा समस्याओं को पहचाना है तथा इससे बचने के उपायों को रेखांकित किया है-
*करजा बाढ़े/किसानी संसो माढ़े/बादर ह भगागे
/करा गिरीस/किरा मन झंपागे/का ला बदँव जोड़ी?
*बन बघवा/अपन धोंध बर/परदेशी लीलथे/ बइठांगुर/उदाली झन मार/कुआँ-मेचका कस।
शराब/मांसाहार द्वारा गाँव को निगलते जाना यहाँ एक बड़ी समस्या है। यहाँ न्याय के नाम पर हो रही शराबियों की गोलबंदी को भी आपने अपने निशाने पर लिया है-
*नवा फैसला/नियांव करे बर/मंदहा सकलागें!/ जुर्माना होही/कुछु गलती होय/कुकरी भात खाहीं।
     रिंगी चिंगी-वर्तमान समय विविधताओं और विसंगतियों के साथ तालमेल बिठाने का है। आप जो देखना चाहें वही आपको दिखेगा इसलिए अच्छा हो कि आप अपनी राह चलिए और अपनी करुणा, दया, संवेदनशीलता  जैसे आभूषणों को यथासमय ही धारण कीजिए। 
*पानी बेचाथे/लहू के कीमत मं/कोन पोंछही आँसू/ नवा बेमारी/दया-धरम कहाँ/ईमान बेचावथे।
*भूखाय पेट/हँड़िया कस तीपे/चुरथे आश्वासन/तात पसीना/सुरुज ह लजाय/भभकथे करेजा।
आधुनिक युग पूरी तरह बाज़ार की गिरफ़्त में है उसे ज़ेब की गर्मी उतारने का हुनर आता है इसलिए अब वह सबसे अमीर है। इसी बाजार के कारण अनियंत्रित इच्छाओं की पूर्ति से उपजी घूस की समस्या सर्वत्र विद्यमान है जिसके चलते चाय-पानी बदनाम हुए हैं। सशक्त शब्दों का चयन इनके गुरुत्व को बढ़ाते दिख रहे हैं-
*जेब गरु हे!/बजार हरु करे/गर्मी उतार देथे/झन इतरा/इहाँ जम्मो गरीब/बजारेच्च अमीर। 
*घूस 'फेमस'/'ऑफिस' के 'फाईल'/पैसा गोड़ बनाथे
/उही रेंगाथे/चाहा-पानी बिचारा/बदनाम होगे जी।
शहर एवं गाँव की अघोषित जंग में गाँव शहर होना चाहता है और शहर चाहकर भी गाँव नहीं हो पा रहा। 
*शहरी गोठ/मतलबी रिश्ता हे/बखत बेरा यार/फुर्सत कहाँ/चक्का बाँधे ढुलथें/मोबाइल ज़माना।
      ‘फुलेरा’ छत्तीसगढ़ी सेदोका संग्रह में आपने छत्तीसगढ़ प्रदेश की परंपराओं एवं संस्कृति की महक को रेखांकित किया है। इस संग्रह के सेदोका के भाव सशक्त हैं बिम्ब एवं प्रतीकों का यथास्थान सुंदर उपयोग आपने किया है। शिल्प पक्ष कसा हुआ है तथा विचारों में सकारात्मकता एवं गहराई है-
*मुड़ी उठाव/रेंगव छाती ठोंक/कन्हार माटी देथे/ बासी सजोर/मयारु हवै भाँचा/उही पार लगाही।
     इस संग्रह के लिए मेरी हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ। आपने इसके द्वारा सेदोका की नई राह सुझाई है जो शोधार्थियों के लिए अनुकरणीय होगी। आशा है यह संग्रह पाठकों को अवश्य ही पसंद आएगी। 

डॉ. सीमा रानी प्रधान
सहायक प्राध्यापक
महाप्रभु वल्लभाचार्य शास.स्नातकोत्तर महाविद्यालय
महासमुंद, छत्तीसगढ़
…..
फुलेरा-छत्तीसगढ़ी सेदोका संग्रह
रमेश कुमार सोनी
प्रकाशक-राजभाषा आयोग,छत्तीसगढ़-रायपुर 2024
पृष्ठ-81,मूल्य-00/-₹
……



'फुलेरा' विमोचित


        विश्व के प्रथम छत्तीसगढ़ी सेदोका संग्रह 'फुलेरा' का विमोचन 14.08.2024 को गुरु घासीदास संग्रहालय स्थित संस्कृति भवन में राजभाषा आयोग छत्तीसगढ़, रायपुर के द्वारा आयोजित एक गरिमामयी साहित्यिक कार्यक्रम में हुआ। 'फुलेरा' का विमोचन डॉ. रमेन्द्रनाथ मिश्र पूर्व कार्यकारी अध्यक्ष एवं वर्तमान के सचिव डॉ. अभिलाषा बेहार के करकमलों से हुआ। इस अवसर पर आपको राजभाषा की ओर से स्मृति चिन्ह भेंट कर सम्मानित भी किया गया। 




       इस कार्यक्रम का शुभारंभ श्री पुरंदर मिश्रा-विधायक, रायपुर उत्तर ने किया एवं समापन श्री बृजमोहन अग्रवाल-सांसद रायपुर ने किया। इस अवसर पर सर्वश्री डॉ. पीसीलाल यादव, देवधर महंत, महेंद्र ठाकुर, रामनाथ साहू, सुशील भोले एवं......कुमार लोरिश सहित छत्तीसगढ़ी साहित्य के अनेक साहित्यकार उपस्थित रहे। अनेकों की।शुभकामनाएँ मुझे मिलीं-सभी विद्वतजनों का हार्दिक आभार। 


रमेश कुमार सोनी
बसना, रायपुर



Fulera


फुलेरा 
          (विश्व का प्रथम छत्तीसगढ़ी सेदोका संग्रह- रमेश कुमार सोनी)
 अब तक किसी अन्य बोली में भी सेदोका प्रकाशित नहीं हुआ है इसलिए छत्तीसगढ़ी बोली में इस संग्रह के प्रकाशित होने से छत्तीसगढ़ी समृद्ध होगी। 
आगामी दिनों में छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग-रायपुर से यह संग्रह- 'फुलेरा' प्रकाशित होने जा रहा है जो विगत वर्ष से लंबित था। यह मेरे लिए गर्व का विषय है। इस तरह जापानी साहित्य की तीनों विधाओं में मैंने अपना संग्रह प्रकाशित करते हुए अपनी साहित्यिक जिम्मेदारी निभायी है, जो इस प्रकार हैं-
1
हरियर मड़वा- विश्व का प्रथम छत्तीसगढ़ी ताँका संग्रह। 
2
गुरतुर मया- छत्तीसगढ़ी की सर्वाधिक संख्या वाला हाइकु संग्रह। 
3
फुलेरा- विश्व का प्रथम छत्तीसगढ़ी सेदोका संग्रह। 
       फुलेरा के सेदोका एवं उसमें संगृहित उपखंड का विवरण ऊपर दिया गया है। 

रमेश कुमार सोनी 

           छत्तीसगढ़ी राजभाखा दिवस मं जम्मो संगवारी मन ला गाड़ा-गाड़ा बधाई। छत्तीसगढ़ी ला असल के राजभाखा बने के उम्मीद करन अउ संगे -संग एखर प्रचार-प्रसार करके एला पोट्ठ बनाई। एखर साहित्य ल घलो विकसित करना हे इही बर मोर ए नानकुन जोरन प्रस्तुत हे-
1 हरियर मड़वा-
     छत्तीसगढ़ी के विश्व मं पहिली ताँका संग्रह
2 गुरतुर मया-
     छत्तीसगढ़ी के अब तक ले सबसे ज्यादा हाइकु वाले  
     संग्रह। 
          ए दुनो संग्रह ल आप मन के आशीर्वाद के अगोरा हे।
जय छत्तीसगढ़-जय छत्तीसगढ़ी।
   जोहार। 
रमेश कुमार सोनी
रायपुर,छत्तीसगढ़

समीक्षा-गुरतुर मया


हाइकु बर छत्तीसगढ़ी के गुरतुर मया 
      हाइकु हर जापानी साहित्य के एक ठन विधा होथे तउन ला हिंदी हर घलो अपनाए हे। हाइकु ल 5,7,5 यानि कुल 17 वर्ण के तीन डांड़ म लिखे जाथे। एखर मुख्य विषय प्रकृति हवय फेर अब लोकजीवन के जम्मो विषय ल हाइकु हर रपोट डारे हवय। हाइकु ह निचट कविता आय,एमा कविता के जम्मो गुण होना चाहि; इही उदिम ल अब छत्तीसगढ़िया मन बने सुग्घर मन ले लिखथें ताकि हमर भाखा ह झन पिछुवाय। हाइकु ल कतको अनजान मन अइसने गलत लिखथें-हाईकू, हाईकु,हाइकू; एला सुधार के लिखना हे-हाइकु। 
      छत्तीसगढ़ म हाइकु के ज्यादा सोर नई हे फेर ए दारी ले हिंदी हाइकु के देखा-देखी नवा जुन्ना लेखक मन लिखे के कोसिस करथें। ए दृष्टि ले ‘गुरतुर मया’ हर जम्मो झन ल रद्दा देखाहि  कि हाइकु ल कइसे रचे जाय; खाली तीन डांड़ म कुछु लिख देले ओहर हाइकु नइ हो जाय। ‘गुरतुर मया’ हर रमेश कुमार सोनी बसना वाले के पहिली छत्तीसगढ़ी हाइकु संगरह आय। आप मन छत्तीसगढ़ म हिंदी के पहिली हाइकुकार होथें अउ आपके पुस्तक-‘रोली अक्षत’ हर छत्तीसगढ़ के पहिली हिंदी हाइकु संगरह होथे।
      छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग-रायपुर के सहयोग ले प्रकाशित हाइकु संगरह ‘गुरतुर मया’ मोला पढ़े बर मिलिस; ए संगरह म 368 छत्तीसगढ़ी हाइकु हवय जउन हर ए सात भाग म खंड़ाय हे-1 सोनहा बिहान, 2 धान के कटोरा, 3 मोर मयारू, 4 रिस्ता-नता के झाँपी, 5 हमर चिन्हारी, 6 माटी के कुरिया अउ 7 मिंझराहा। पहिली बेर अइसन हाइकु छत्तीसगढ़ी म रचाए हे जेखर शैली ह उत्कृष्ट हे, भाव पक्ष परघट दिखथे अउ काव्य शैली ह हमर छत्तीसगढ़ के जम्मो चिन्हारी ल सकेले हें।
        हाइकु विधा के अंतस म प्रकृति के वर्णन ह ममहात रहिथे काबर की हमर जिनगी के डोर उहेंच्च बंधाय हवय। प्रकृति के कतको रूप हर हमर मन ल मथके मया के करमा-ददरिया सुनाथे, हमर उछाह अउ जिनगी जीये के तैयारी म रंग घलो भरथे। हमन प्रकृति ले अलग होय के सोच नई सकन फेर हमर लालच हर हमर बर जीव के काल होगे हे। आपके हाइकु ह प्रकृति के सुग्घर रूप ल निहारत खड़े हवय जईसे कि पुस के हवा अँगना म छरा देवथे,सावन के बादर ह कोंवर कँवरिहा हे,जाड़ म कोलिहा के भुर्री खोजई...अउ नवा बिहान के पहिली किरन ह लईका कस होथे भुईयाँ म रेंगे ल सीखत गिरथे त दूबी ह ओला झोंकथे वाह अद्भुत दृश्यांकन हे-    
हवा गरु हे/कोंवर कँवरिहा/करा बोहे हे।
ओस के छरा/बिहान बेरा देथे/पुस के हवा।
पोटारे बर/रुख-ढेखरा होगे!/कोंवर नार। 
पुस के जाड़ /गोरसी के मितानी/ठट्ठा सुनथें।      नवा बिहान/घाम रेंगे सीखथे/दूबी झोंकथे।         
      कोनो रचनाकार ल चाहि की ओखर रचना म अतेक दम होय कि ओहर बिना कोनो ले डेर्राय बेवस्था के खिलाफ प्रश्न पूछ सकय। प्रस्तुत हाइकु ह इहाँ वर्तमान समय के समाज में फैले विसंगति ल फ़रिया के केहे बर नई लजाथे। ए हाइकु मन नोनी के संसो, दाईज के पीरा, डोकरी दाई के चिंता,......अउ बैपारी के बनाय समाज में, हिंसा के आघु म छाती उघारे प्रश्न पूछत खड़े हे। जिनगी ह कईसनो तो चलबेच्च करही फेर मर -मर के जियई ह ए हाइकु ल नई सुहावय-     
करा गिरीस/करजा ह जामही/जम्मो के खेत।
माँ-लिखथे जी/बिन दाई के नोनी/सिल्हेट रोथे।
नून नापथे/खोईला ले महुआ/बड़े बैपारी।
गोला-बंदूक/बस्तरिहा काँपय/लहू बोहाथे।

      आपके हाइकु ह नवा ज़माना के हवा ले बाँचे नई पाए हे तेखरे सेती आप मन ए बात ल जम्मो समाज के आघु म दर्पन कस फरिया के रख दे हवव। सबे जानथें कि मोबाइल ह काम बुता के सउत हो गेहे, ऊपर ले चिरहा पहिर के खेत ल अधिया म देना अउ बोनस ल पूरा डकार देना ए जम्मो बेमारी ह हमन ल कहाँ ले जाहि ठिकाना नई हे। आवव ए हाइकु ल गुनन-
मुड़ी गड़ाव/मोबाइल के बुता/खेत परिया।
खेत-अधिया/आधा पेट खाबे का?/बोनस पूरा!
नवा बेमारी/चिरहा पहिरना/काय लुकाबे?

        आपके ये हाइकु ह आपके रचनाकार मन डाहर ले स्वाभाविक रूप ले उपजे हे काबर कि एहर समाज ल दिशा देखाय बर जरुरी घलो होथे कि सुझाव दे जाए। जाने बर सब जानथें कि माटी ल नई लेसना हे फेर बारथें, पहिलांवत लइका कोनो होय स्वीकारना चाहि तभे नोनी बर मया रइही अउ दुःख के बेरा कब आही कोनो नई जानंय एखर बर कनिहा कस के रहना चाहि। शब्द ल आप मन बड़े जतन ले बुने हवव अउ एला बीने म सावधानी के संगे-संग अपन अनुभूति ल विस्तार दे हवव इही ह ए हाइकु ल पोठ बनाए हे।       
माटी भूँजाथे/पैरा झन बारव/कोरा लेसाही।
नवा बिहाती/कोख झन उजार/खुसी जन्मही।

      आप मन के हाइकु ह बीच-बीच म चेतावत घलो रेंगथे कि ए ज़माना ह कईसे बिगड़े हे, दृश्य ल चिन्ह के अउ छाँट के हाइकु के पंगत म बइठारे हवंय। जइसे फूल म काँटा के पहरा होथे तइसने नवा नोनी मन ल घलो दुइज के चंदा बरोबर हँसिया होना चाही अउ रेंगत बेरी अपन सांटी ल बजात रेंगय। ए हाइकु ह जम्मो ल सावचेत करथे इही एखर सुन्दरता हे-  
दुइज-चन्दा/हँसिया धरे आथे/कोन छेड़ही।
फूल-गुलाब/भौंरा-छुए डेराथे/काँटा-पहरा।
रद्दा टेड़गा/साँटी बजात रेंग/जम्मो बइरी।

      जापानी साहित्य के विधा हाइकु म पहिली बेर हमन अपन छत्तीसगढ़ के लोक संस्कृति की महक,  संस्कृति ,कर्म के महात्म ल पढ़े बर मिलिस। छत्तीसगढ़ी के कतको अन्य विधा म ए सब हर सकलाय हे फेर अतेक नानचुन रूप ह मन ल मोहथे। छत्तीसगढ़ के रात ह चाँदी अउ दिन ह सोनहा हे, अक्ति के बिहाव, धान रोपत दाई महतारी के सोहर गाना.....अउ माँझा खोल के कका के ढेरा आँटना; ए सब हमर रोजी-रोजगार ले जुड़े हे। जब तक कोनो साहित्य ह अपन जिनगी ले नई जुड़ही तब तक ओला चिन्हारी नई मिलय, आवव ए हाइकु संग हमु मन अपन जिनगी ल आँट लन-
धान रोपथें/रिंगी-चिंगी लुगरा/अँजोर होही। 
जरई फूटे/सोहर गाथे काकी/खेत बाढ़य। 
रात हे चाँदी/बिहान सोनहा हे/जाँगर घर। 
ढेरा घुमथे/माची गाँथही कका/जिनगी आँटे ।

      हाइकु काव्य म मानवीयकरण ल बने माने जाथे, आपके ए हाइकु म एहर देखे बर कई जगह मिलथे। संझौती ल मयारू के झुँझकुर चुँदी कहना, चिरई ल खेत के सीला बिनाइया लइका कहना अउ  सड़क के रुख-राई  के डोलना ल समधी भेंट कहना...... ए सब वर्णन ह एखर सुन्दरता आय। जब तक प्रकृति ल हमन अपन आप ले नई जोड़थन तब तक हमन ओखर ले दुरिहा रहिथन। हमर प्रकृति हर हमर बर नंगत ले कष्ट सहिथे तभे तो हमन एला अपन रिश्ता-नता कस घलो मानथन। 
मोर संझौती/झुँझकुर चुँदी हे/दिया-अँजोर।      लुआई देखे/चिरैया मन आथें/सीला बीनथें। 
छीन के पेड़/गौंटिया-अकड़े हे!/छैंहा भूला जा!
पत्ता झरगे/नागा बाबा खड़े हे/माला जपत।                 
      आपके ए हाइकु म अंतस के पीरा हे अउ सवाल करथे, चिंता घलो करथें कि गाय के पेट ल घुरुवा कोन बनाइस?, हमर बारी के जाँगर ल रउंदे बर बेंदरा काबर आथे? अउ हमर गाँव ल कोन ह नसेड़ी बनावथे? अइसने कतको अकन संसो ह जम्मो झन ल जोरे के अगोरा म ठाड़े हे। ए हाइकु ह अपन जगह म पोठ भाव ल पोगरी करे हें,आवव एला हमन गुनन-    
गाय के पेट/प्लास्टिक के कचरा/घुरुवा होगे।
हाथी-बेंदरा/जाँगर रउँदथें/बारी-बखरी।
कोन बोईस?/गाँव मं गाँजा-भाँग/बंदूक आथे।

        छत्तीसगढ़ के हर गाँव-मोहल्ला म रिस्ता गूँजथे, डाहर चलती एखरे अनुसार पैलगी अउ आशीर्वाद बोहात रहिथे रिस्ता के सुघ्घरता ह घर ल घर बनाथे अउ कोन्हों उत्सव के बेरा ल नंगत के कहिनी घलो बना देथे, ननंद अउ भउजी कोन जानि काय बोलथें कोनो नई जान सकंय, काजर आँजें के बेरा म फुफु हर नेंग बर रिसाबेच्च करथे, नवा बहु जब घर आथे तब घरो घर बैना घलो बँटथे अउ बिहाव नाचे के बेरा म ढेंड़हा ह आघु होथे काबर की ओहर नेंग म सोन के मुंदरी पाहि। ए जम्मो हाइकु ह हमर रिस्ता म नकारात्मकता ले बचाए के उदिम ल देखावथे-  
काला हाँसथें?/ननंद ‘औ’ भउजी/अबूझ बोली।
कोरा हाँसथे/काजर आँजें फुफु/नेंग रिसाय।
बैना बँटथे/घर अँजोर होगे/बहू के सोर।
ढेंड़हा खुस/नेंग के मुंदरी मं/नाच बेंदरा।

         छत्तीसगढ़ के सभ्यता-संस्कृति ह धान के कटोरा म बगबग ले दिखथे चाहे ओहर तीजा-पोरा के ठेठरी-खुरमी के संग बहिनी-बेटी के अगोरा होय, हरबोलावा के उठ बिहाने भजन गाना होय, जय गंगान के धुन सुनाना होय, हरेली के खुसी म गेड़ी रेंगाना होय, अपन गोसांई/भगवान के गोदना गोदवाना होय, फुगड़ी के मस्ती होय, दफड़ा-मोहरी के बाजे ले गाँठ जोरई होय, ठेठवार घर बरवाही के अगोरा होय, कबीर पंथ के उज्जर चौका माढ़े होय चाहे शबरी के विस्वास होय ए जम्मो ल एके संग म अपन हाइकु में आपमन लिखके अमर बना दे हवव। भुलौती बात ल बचाय के गोहार हमर निसानी मन ल सुग्घर बुता ले संघराय के संदेस देवथें। ए विधा के द्वारा अब दुनिया हमर छत्तीसगढ़ ल चिन्ह्ही अउ हमर सोर हर दुनिया म ममहाही। आवव अइसने भाव वाले ए हाइकु के सुन्दरता ल बाँचन-
बादर लाथे/तिजहा के लुगरा/भुइयाँ जामे।
मया के गीत/चिरईय्या-बिहान/जय गंगान। 
हरेली पूजे/बियासी के नांगर/गाँव मताय।
कबीर चोला/का तोर,का मोर हे?/इँहें छूटही।
फुगड़ी खेले/बहुरिया मताय/सऊँक जीते।
ठट्ठा-दिल्लगी/दफड़ा-मोहरी के/गाँठ जोरही।

        छत्तीसगढ़ म सुख-दुःख के गोठ-बात ह मनखेपन के निसानी आय, ए हर हमर मनके रग-रग म बसे हे तभे हमन जम्मो के सुख म खुसी मनाथन अउ दुःख म संगे-संग ठाड़े रहिथन। ए बात ह चलतेच रहिथे चाहे रेंगत बुलत होंय, परछी म बइठे होंय, काम बुता के बेरा होय के तरिया के घाट-घटौंदा होय। चार दिन के जिनगी में सुख-दुःख ह लगेच्च रहिथे एला बने करके बउरे बर चाही काबर कि सुख हर मड़ई कस एक दिन म उसल जाथे फेर दुःख हर काई बरोबर माढ़ जाथे। ए हाइकु म इही बात ह चमचम ले बगरे हे हाइकुकार रमेश सोनी हर हमर परंपरा ल पुन्नी के चंदा अईसन बगरा देहें। आपमन इहाँ जउन दृश्य ल रचे हव ओहर परघट ले हमर अंतस ले हो के रेंगथे; आवव ए हाइकु के भाव अउ इनखर शब्द के महिमा ल अपन जिनगी के कोला-बारी म झाँक के देख लन-
जग के मेला/खुसी के फुटु फरे/दुःख बिसोही!
सुख बरोड़ा/तुरते नाहकथे/दुःख जामथे।
चढ़े-उतरे/सुख-दुःख निसैनी/जिनगी नापे।
सुख के नार/दुःख-ढेखरा हाँसे/खुसी फरही। 

      मया-दुलार के अँजोर चारों मुड़ा म बगरे हे जउन म रिस्ता-नता के डोरी ह अरझे हे जइसे कोनो ओला ढेरा म बाँध के आँट देहे,जउन हर कभू ले नइ छतराय फेर बिपत बेरा म संगे-संग ठाढ़े रहिथें। मया के रिस्ता के इहाँ कतको नांव हवय-जंवारा, महापरसाद, सहीनांव, जोही, गियाँ,...अउ भोजली जउन हर कोनो संस्कृति म देखउल नइ हे, एखरे सेती कोनो होय इहाँ के मया ल पा लेथें। मया के ददरिया सुनत मयारु ह जब अपन फुंदरा ल घुमात रेंहचुली झुलही तब मया के बंरोड़ा म अइसने हाइकु के सिरजन होथे-      
जोही रेंगय/अंधरौटी हो जाथे/मया बंरोड़ा।
तोर मुंदरी/ददरिया सुनाथे/मया सुरता।
छत मं गियां/चन्दा सहीं दिखथे/उज्जर मया।
जदुहा आँखी/मउहा कस नसा/उतारा कहाँ?
रेंहचुली हे/मयारु के फुंदरा/मया घुमाथे।
होत संझौती/आगि माँगे जँवारा/आगि लगाके।  

      रमेश कुमार सोनी के हाइकु में कविता के जम्मो गुण ह गुरतुरहा जनाथे, शब्द हर पोठ गुँथाय हे अउ भाव के चासनी म लपटाय हे। ए हाइकु के दृश्य ह पाठक के आघु म खुलथे अउ उनखर अंतस ल दही अइसन बिलो देथे। आपके हाइकु में भाव के सघनता हे अउ संवेदना के प्रकटीकरण हर एक ठन उदहारण बने हे।
‘गुरतुर मया’ बर मोर डाहर ले आप मन ला गाड़ा-गाड़ा बधाई हे, ए संगरह के मया ह चारों मुड़ा म बगरत रहय। नवा लेखक मन बर संदेस हे कि ए शोध ग्रन्थ ल अधार मानके बनेच्च सोरिया के लिखयँ ताकि हमर छत्तीसगढ़ी भाखा ह अउ पोठ हो सकय। 
 समीक्षक-
डॉ. लोकेश्वर प्रसाद सिन्हा
(सहायक प्राध्यापक)
दुर्गा महाविद्यालय-रायपुर 
........................... 
गुरतुर मया’-छत्तीसगढ़ी हाइकु संगरह ; हाइकुकार-रमेश कुमार सोनी
श्वेतांशु प्रकाशन दिल्ली , सन-2021, मूल्य- 250/-रु.  ISBN: 978-93-91437-42-8
भूमिका-डॉ.चंद्रशेखर सिंह, विभागाध्यक्ष शास.महाविद्यालय -मुंगेली (छ.ग.)
...........................

ताँका-आलेख

ताँका साहित्य के विश्व में प्रथम संग्रह-

          हिंदी ताँका का अपना प्राचीन इतिहास रहा है यद्यपि इन दिनों उचित प्रोत्साहन के अभाव में इस विधा का उतना प्रसार नहीं हुआ जितना कि हाइकु का हो रहा है। मेरे अनुसार इस क्षेत्र में अभी बहुत से कार्य बाकी हैं जैसे- ताँका विधा पर केन्द्रित पत्रिकाओं का प्रकाशन, स्थानीय बोली भाषा में ताँका का एकल संग्रह तथा इसका विविध भाषाओं में अनुवाद।           

         मुझसे होकर गुजरे निन्मलिखित पुस्तकों ने अपनी महत्ता को अंतर्राष्ट्रीय साहित्य के भाल पर प्रतिबिंबित किया है क्योंकि ये अपनी तरह के विश्व में प्रथम(इ पुस्तक) हिंदी ताँका संग्रह हैं। मैं इसलिए भी इनसे गौरवान्वित हूँ कि ये मेरी ही भूमि-बसना से रचे गए हैं। बसना जैसे छोटे से अंचल से इस विधा को विस्तार के लिए सोचना और कर दिखाना वाकई प्रशंसनीय कार्य है, हिंदी साहित्य की श्री वृद्धि के लिए अब ये दोनों संग्रह पाठकों तक उपलब्ध हैं। इन ताँका संग्रह का परिचय इस प्रकार है-  

1 झूला झूले फुलवा– ताँका ‘इ’ संग्रह-रमेश कुमार सोनी

भूमिका- रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’,  प्रकाशक-अक्षर लीला प्रकाशन, कबीर नगर, रायपुर

छत्तीसगढ़, पिन-492099, सन-2020,  पृष्ठ-114, मूल्य- 200/-रु.

उपलब्धता-किंडल अमेज़न साइट पर

………………………….......

        ‘झूला झूले फुलवा’, यह संग्रह  विश्व की पहली हिंदी ताँका ‘ई बुक’ है,आपका यह कार्य आज के डिजिटल युग में हिंदी साहित्य के लिए गर्व का विषय है। ‘झूला झूले फुलवा’ संग्रह के ग्यारह विविध खंडों में –1 झूला झूले फुलवा, 2 पिया साँवरे, 3 तराशने का दर्द, 4 माटी का पुतला, 5 रिश्तेदारियाँ, 6 प्रेम- रंग भिगोए, 7 कोरोना का खौफ, 8 हमर छत्तीसगढ़, 9 आँसू सूखे हैं 10 यादें छेड़तीं और 11 नई दुनिया, कुल -344 ताँका हैं। आपकी सच्ची एवं सहज अनुभूतियाँ प्रेम,करुणा,प्रकृति तथा स्मृति से मानवीय रिश्तों का जीवंत लोक रचती हैं। आपके शालीन शिल्प तथा शब्दों की सार्थकता आपकी अनुभव जन्य सम्पदा है; आपने इसमें नये प्रतीक एवं बिम्ब की एक नयी रेखा खिंची है।

          रमेश सोनी ने प्रकृति के मिज़ाज़ के लगभग हर रंग -ढंग को अपने ताँका संग्रह में बखूबी समेटा है। विविध अनुभूतियों से दमकती यह ई पुस्तक पाठकों को मंत्रमुग्ध कर देगी, कुछ ताँका प्रकृति के कोमल हृदय की झाँकी प्रस्तुत करते हैं। छत्तीसगढ़ के गौरव का गुणगान करते ताँका कवि का अपनी माटी के प्रति पावन प्रेम को भी दर्शा रहे हैं। कोरोना के उग्र रूप को भी आपने ताँका में उतारा है जिससे सम्पूर्ण विश्व आतंकित रहा यह आपकी समकालीन संवेदना की अद्भुत अभिव्यक्ति है।

रक्षक काँटें /महारानी -सी बैठी /ओस गुलाबी /पालकी बैठ चली /महारानी सजाने।


.............  

2 ‘हरियर मड़वा’-रमेश कुमार सोनी

वैभव प्रकाशन-रायपुर, 2019, मूल्य-200/-, पृष्ठ-88, ISBN: 978-93-88867-47-4

भूमिका-डॉ. सुधीर शर्मा-रायपुर

..........................................

           यह संग्रह  छत्तीसगढ़ी का विश्व में प्रथम 'ताँका संग्रह ' है, यह अब तक का विश्व में किसी भी बोली में लिखा गया प्रथम संग्रह है।  इससे छत्तीसगढ़ी पुष्ट होकर साहित्य की अग्रणी पंक्ति में खड़ी हो गयी है  यह छत्तीसगढ़ की साहित्यिक समृद्धि और उसके सांस्कृतिक विस्तार के लिए महत्वपूर्ण पुस्तक है। इस संग्रह में 466 ताँका हैं जो आज तक के किसी भी भाषा में रचे और प्रकाशित हुए एकल संग्रह से भी ज्यादा हैं, यह भी अपने आपमें एक रिकॉर्ड है।


         'हरियर मड़वा' में विषय वैविध्य के साथ साथ लोक-संस्कारों का चित्रण है जो पाठकों को छत्तीसगढ़ को गहराई से समझने में सहायता करते हैं। छत्तीसगढ़ की महक इस संग्रह में सर्वत्र बगरी हुई है जो अंतस तक महसूस की जा सकती है। आपके ताँका की शब्दों की कोख से उपजे गंभीर अर्थ आपकी आत्मा की गूँज है जिसकी चिंतन धारा विशुद्ध छत्तीसगढ़ी है। किसी भी बोली में रचा गया यह अब तक का सबसे पहला संग्रह है इसमें आपके शब्दों का स्थापत्य जीवंत है और इसके ताँका साहित्यिक धरातल पर ठोस है।  इस संग्रह के ताँका कलात्मक सुषमाई के निकष पर अद्वितीय हैं; ये ताँका अपने वक्त की कालजयी रचना है  इनसे ही नयी पीढ़ी को सीखना है। यह एक शोध ग्रन्थ के रूप में सभी का मार्गदर्शन करेगी-

खुसी के बेरा / बरवाही कस हे / पाबे त जान/ जल्दी सिरा जाथे जी / जोर-जोर के रख । 

............


देवेन्द्र नारायण दास

बसना, छत्तीसगढ़ 493554

मो. 6265458531

 


छत्तीसगढ़ी राजभाषा दिवस के बधाई ..

छत्तीसगढ़ी साहित्य ल मोर नानकुन सहयोग-
1
 विश्व का प्रथम छत्तीसगढ़ी ताँका संगरह-
हरियर मड़वा-2019
2
छत्तीसगढ़ी म अब तक के सबसे ज्यादा संख्या वाला अउ पोट्ठ संगरह-
गुरतुर मया-2021
जम्मो पढ़ईया मन ला अउ रचनाकार मन ला जोहार। जम्मो झन ला राजभाषा दिवस (28 नवम्बर) के गाड़ा-गाड़ा बधाई। 

रमेश कुमार सोनी
रायपुर,छत्तीसगढ़