प्रकृति के गूँजते शब्द


प्रकृति के गूँजते शब्द 


     कविता किसी कवि के परिवेश की अनुभूति से उपजी संवेदनाओं का शब्दांकन है। कविता कभी छोटी या बड़ी नहीं होकर उस संवेदित घटना की तीव्रता पर निर्भर करती है। यदि इसका प्रभाव गहरा है तो कविता में ज्यादा शब्दों की आवश्यकता होती है। कई बार ज्यादा शब्दों पर अनुभव और शब्दशक्ति भारी होती है मुझे इस संग्रह में ऐसा ही अहसास हुआ। 

     वर्तमान समय से जूझती हुई कविताओं का दौर जल्द सिमट जाता है क्योंकि वक्त उसी तीव्रता से करवटें लेता है। प्रकृति वाद की कविताओं को स्थायित्व मिलता है ये हर दौर की पसंद होती हैं। किसी व्यक्ति की साहित्यिक चेतना की तीव्रता उसकी कविताओं में दृष्टिगोचर होती है। 

     सुदर्शन रत्नाकर की कृति ‘प्रकृति के स्वर’ को बाँचते हुए मुझे लगा कि इनमें आज के दौर की कविता जैसा प्रकृति का सौंदर्य है, संदेश देने से बचती हुई एवं शब्द चयन में वरिष्ठता झलकती है। इनमें आशावाद और मानवीकरण का समन्वय भी है। आइए इस संग्रह की 102 कविताओं को परिवेश में झाँकने का प्रयास करें। 

     ‘अलबेला चाँद’ कविता में जीवन की लंबाई के बनिस्बत उसकी गुणों की महत्ता रेखांकित है। जिस तरह चाँद यहाँ कम समय के लिए ही उपस्थित होकर सबको मोह लेता है वैसे ही जीवन से अपेक्षा है-

प्रहरी बन देता है पहरा 

उजाला फैलाकर 

अलबेला यह चाँद 

जीवन है छोटा-सा 

फिर भी, मधु से भर देता 

अवनि और अम्बर।

     ‘वह सूरज’ कविता संभावनाओं की अभिव्यक्ति है साथ ही यह हमें प्यार में झुककर ही प्राप्त करने को दर्शाता है। यहाँ आशावादी प्रवृत्ति की सुंदर झलक भी है। 

कल फिर आएगा 

कल फिर बिखेरेगा 

किरणें 

मेरे घर की मुँडेर पर 

वह सूरज जो रोज़ आता है 

चिड़ियाँ चहचहाएँगी 

स्वागत में 

मंगल गीत गाएँगी 

सूरजमुखी खिलेगा 

वशीभूत हो प्यार में 

सिर झुकाएगा।

     ‘अरुणोदय’ कविता में भोर की सुंदरता का मानवीकरण है, हमारे जीवन में ऊर्जा का संचरण भी करता है। कर्म का संदेश इसमें निहित है कि जीवन है तो उगना और अस्त होना लगा ही रहेगा। 

हो रहा हैं अरुणोदय 

भोर ने आँचल समेटा 

पाँवों में लगा महावर 

उषा दुल्हन बन आई है 

माथे पर सूरज टीका 

किरणों ने चूड़ियाँ छनकाई हैं 

रथ पर होकर सवार 

दिनकर बाहर आए हैं 

आलस्य छोड़, पक्षियों ने 

मंगल गीत गाए हैं।

     ‘जल परियाँ’ कविता बारिश के सौंदर्य का मानवीकरण है। इस दृश्य को कवि की कल्पना का आलम्बन मिला है, अनुभूति यहाँ प्रकट हुई है। 

उतर रहीं आसमान से 

पहन पैंजनिया 

सखियों संग मिल 

तीज गातीं 

छपक-छपककर 

झूम-झूमकर धरती को नहलातीं 

पेड़ों से छनकर, 

उतर रहीं

जल बूँदें, मनभावन बूँदें।

     ‘साँझ की वर्षा’ में बूँदों का संगीत के साथ ही विरहिणी की सिसकी से तपस्वी को अंतर्ज्ञान प्राप्ति का अभिलेख है। ‘लहरों के रंग’ में लहरों को आपने सहेलियाँ की स्पर्धा और उनकी क्रीड़ा का अद्भुत वर्णन किया है। ‘भोर की समीर’ कविता में भोर का साहित्यिक दृश्य है। वायु का शिशुरुप और प्रभात योगिनी का ध्यानमग्न होना हम सबके मन को आनंदित करने के लिए पर्याप्त है। 

प्रभात की वह योगिनी लगती, 

ध्यानमग्न हो मंद समाए 

कस्तूरी-सी छुअन लिये वह, 

हर कोना महकाने आए।

सांसों में रच जाए चुपचाप, 

कुछ कहे न, बस मन हुलसाए।

     ‘रंगों की दुल्हन’ में ऋतुराज बसंत की छटाएँ बिखरी हुई हैं जिसका प्रकृति के साथ हम सबको प्रतीक्षा होती है। फूलों के महकने से लेकर भौरों के इतराने तक मदनोत्सव सबको अपने रंग में सराबोर कर लेता है। 

आई रंगों की दुल्हन !

झूम उठे बाग-बगीचे 

हर शाख है लहराई 

बजी प्रेम की बांसुरी 

मन में मस्ती है छाई।

भीनी-भीनी-सी मादकता 

हर दिल को है भायी 

देख सौन्दर्य धरा मुस्काई 

ऋतु वसंत है आई।

     ऐसे ही भाव लिए कविता ‘प्रकृति का रंगोत्सव’ का प्रेम पाश मधु रस लुटाने आया है। पहाड़ भी इस उत्सव में शामिल होने से अपने आपको नहीं रोक पाए। 

पर्वत के उत्तंग शिखर पर 

सूर्य ने किरणों का 

जाल फैलाया है 

रंगरेज ने 

बांध लिया प्रेम पाश में 

चहूँ ओर सोना बिखराया है 

पहन पीताम्बर 

पर्वत भी इठलाया है।

     ‘सर्दी की धूप’ सबको सुहाती है इसकी तुलना नई दुल्हन से हुआ है जो गपशप करती हुई पेड़ों की फुनगी पर जाकर साँझ को दस्तक देती है। 

सर्दी की धूप 

छुई मुई-सी थोड़ी देर बैठी 

मुँडेर पर, फिर 

उतरी धीरे-धीरे, लजाती हुई।

छुए धरा के पाँव 

थपथपाया, दुलार से तपाया 

ढकी छाँव-धूप ने आँचल से।

     ‘आशावादी’ और जीवन के पहलुओं को रेखांकित करती हुई कविता ‘संहार और सर्जन’ में कवि ने संहार को सर्जन की जन्मदात्री कहा है। 

वृक्षों ने पीले वस्त्र उतार दिए हैं 

नई कोंपलों ने किया है 

उसका स्वागत।

पक्षी चहचहाने लगे हैं, 

पीली दूब ने सिर उठाना शुरु 

कर दिया है

कह रही हों जैसे-

हर चुनौती को स्वीकार करो 

संहार है तो सर्जन भी है 

मिटने के बाद ही कुछ 

प्रतिलिपित होता है!

     ‘प्रकृति के स्वर’ से शब्दों की यह यात्रा इसके दृश्यों को पाठकों तक पहुँचाने में सफल रही है। क्लिष्टता एवं बनावटीपन से दूर विशुद्ध प्राकृतिक सकारात्मक बिम्बयुक्त कविताएँ सबको पढ़नी चाहिए। इस संग्रह की कविताओं  में सहजता देखी जा सकती है। ये कविताएँ किसी प्रकार का कोई उपदेश नहीं देती, भाषा सहज और सरल है। 


रमेश कुमार सोनी

रायपुर, छत्तीसगढ़

……

प्रकृति के स्वर, कविता संग्रह- सुदर्शन रत्नाकर 

ISBN: 978-93-6423-538-9

अयन प्रकाशन-नई दिल्ली, 2025

मूल्य-340/-₹, पृष्ठ-116

…..




No comments:

Post a Comment